क्या Bihar चुनाव में इस बार Democracy को सेलिब्रेट किया गया 

वैसे बिहार  में चुनाव को लेकर जो बात होती है वो चुनाव में हिंसा को लेकर के होती है। वोटर टर्न आउट की दिक्कतों को लेकर के होती है। बिहार में माइग्रेशन एक बड़ा फैक्टर है और मतदाता ज्यादातर बाहर होता है। लेकिन इस बार का जो चुनाव है उसको बिहार के लोग सेलिब्रेट करते हुए दिख रहे हैं , वो ऐसा इसलिए है कि पहले Round में मतदाताओं की सुबह 6:00 बजे से ही लंबी कतार लगी हुई है दिखने लगी,  और महत्वपूर्ण बात यह थी कि इसमें महिलाएं ज्यादा नजर आई। सारे राजनीतिक दल और सारे राजनीतिक घटक चाहे महागठबंधन हो, चाहे एनडीए हो। वह अपने  स्तर पर अपने मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक पहुंचने के लिए प्रेरित लंबे समय तक करते रहे हैं। और जो एक बात होती रही है महागठबंधन बदलाव के लिए प्रचार करता रहा है और एनडीए एक बार फिर मौका देने के लिए उस जो विकास का डेवलपमेंट का मोमेंटम है उस मोमेंटम को और ले जाने की कोशिश करता करने की बात करता रहा है, ।

क्या  एंटी इनकंबेंसी देखने को मिली 

बिहार ने इस बार डेमोक्रेसी को सेलिब्रेट कर रहा है। उसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि  पहले फेस में दोपहर 3 बजे तक जबकि अभी दो घंटे का मतदान शेष था  बिहार में लगभग 54% मतदान हो चुका था।  पहले दो घंटे में यह मतदान जो है वह 14% के आसपास पहुंच गया था, पिछले विधानसभा के  चुनाव में कुल मतदान 57% के आसपास था,  तो साफ पता चल गया कि  इस बार सामान्य से काफी ज्यादा वोट परसेंट होने वाला है। अभी इसके मायने अलग-अलग निकाले जा रहे हैं, पहला  मतदान जो वो है बदलाव की तरफ हो रहा है,  एंटी इनकंबेंसी का  असर है।लेकिन इसका खुलासा तब हो पाएगा जब चुनाव के परिणाम 14 तारीख तक आएंगे।

Bihar का  शेर  बूढ़ा नहीं हुआ है

दूसरी तरफ  जिस तरह से लोग निकल के आए और  जिस तरह से जनता दल यू के समर्थक या नीतीश के समर्थक बोल रहे हैं उसको देख कर के भी लगता है कि अभी भी जो है वो शेर बिहार की राजनीति का शेर जो है वो बूढ़ा नहीं हुआ है। उसके सारे हेल्थ का उसके बावजूद भी अभी भी रिप्लेसेबल  नहीं लगता है और बहुत मजबूती के साथ बिहार के चुनाव में नजर आ रहा है।  इन सबके बीच कांग्रेस कुछ बेहतर कर पाएगी ये भी प्रशन है वैसे अब हाल यह हो गया है कि कांग्रेस के बारे में उनके समर्थक यह कहने लगे हैं कि कांग्रेस जो है वो जीत के मुंह से हार छीनने वाली राजनीतिक दल बन गई है। तो क्या कांग्रेस एक बार फिर बिहार में  वो रिपीट करने वाली है और महागठबंधन के किसी भी चांस को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में जिम्मेदार कांग्रेस नजर आएगी। हालांकि इस बार जो सीपीआई एमएल है वो भी बहुत मजबूत नहीं नजर आ रही है। कांग्रेस पर अभी भरोसा नहीं किया जा सकता। मुकेश साहनी की पार्टी पर भी बहुत ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता कि वो कुछ करिश्मा दिखा पाएंगे। अगर कोई राजनीतिक दल और उसका स्ट्राइक रेट बहुत अच्छा हो सकता है तो rjd से ही उम्मीदें हैं, वह  143 सीटों पर आरजेडी लड़ रही है  और क्या वो अपना पिछला  नंबर जो 70 था बाद में जो 71 था बाद में जो चार बढ़ के 74 हो गया जो एमआईएम के लोग ज्वाइन कर लिए अगर वो अपना नंबर इनक्रीस कर लेती है तो शायद उसके लिए कोई फेयर चांस होगा। लेकिन अगर वो नहीं इनक्रीस कर पाई और कांग्रेस और वीआईपी ये बहुत अच्छा परफॉर्म नहीं कर पाए तो यह निश्चित तौर पर उनके लिए महागठबंधन के लिए मुश्किल होगा और सीपीआईएम एमएल जो है वो भी कुछ बहुत मजबूती के साथ इस बार नहीं है। पिछली बार उनके पास उनका स्ट्राइक रेट जरूर बहुत बढ़िया था लेकिन वैसा इस बार उनके साथ कुछ होता हुआ नहीं नजर आ रहा है।

NDA का पलड़ा कयों है भारी 

 दूसरी तरफ एनडीए जो पिछली बार जिसके दो-तीन घटक जैसे चिराग पासवान उनके साथ अलग उनसे अलग लड़े थे। उपेंद्र कुशवाहा का मामला था। उसके अलावा जो  जीतन राम मांझी का वो इस बार मजबूती के साथ एनडीए के साथ  है। ये अलग बात है कि वीआईपी जो पिछली बार इनके साथ थी वो इस बार महागठबंधन के साथ है। तो ये एक अगर एनडीए से तीन एक माइनस हुआ है तो तीन प्लस हुए हैं और इसका उल्टा जो है वो महागठबंधन के साथ हुआ है। तो, कुल मिला करके जो यह स्थिति है, वो  निश्चित तौर पर बहुत इंटरेस्टिंग है।

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