देश के उपराष्ट्रपति ने क्यों किया पहली बार ये फरमान जारी

उपराष्ट्रपति ने केंद्रीय मंत्रियों से उनके काम के बारे में लेखाजोखा मांगा , ये महत्वपूर्ण इस दृष्टि से है कि अभी तक ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है और यह संवैधानिक तौर पर कितना सही है या गलत है इसको लेकर के अलग-अलग बातें कही जा रही हैं। लेकिन इसको लेकर के उपराष्ट्रपति के सेक्रेटेरिएट से एक नोटिफिकेशन जारी किया गया था और उस नोटिफिकेशन के बाद जो केंद्रीय मंत्री हैं उन्होंने अपने काम का लेखाजोखा पिछले 11 सालों में क्या-क्या किया है उन्होंने उपराष्ट्रपति को प्रस्तुत करना भी शुरू कर दिया है। अब जो उपराष्ट्रपति भवन की तरफ से जो डॉक्यूमेंट या जो इशू किया गया था जो है , द स्ट्रक्चर एंड मैंडेट ऑफ द रेस्पेक्टिव मिनिस्ट्री इसमें था कॉम्प्रहेंसिव एनालिसिस एंड अचीवमेंट पिछले 11 साल का उनका जो भी परफॉर्मेंस था उसको लेकर के और इस दौरान जो प्रमुख उपलब्धियां हैं उनके थर्ड टर्म में तीसरे टर्म में और फ्यूचर प्लांस इसको उजागर मतलब इसको बताना था और इसके इसके लिए एक बाकायदा नोडल वो किया गया है जो प्रधानमंत्री उपराष्ट्रपति के पीएस हैं चंद्रशेखर जी केरल कैडर के आईएस वो इसकी पूरी पूरा इसका कोऑर्डिनेशन का जिम्मा उनके पास है। जो लॉ मतलब लीगल डिपार्टमेंट जो है मिनिस्ट्री ऑफ लॉ या डिपार्टमेंट ऑफ लॉ उन उनके जो प्रमुख अधिकारी हैं उनका कहना है कि ये इसमें इस तरह का कोई संवैधानिक ब्रेकडाउन जैसी बात नहीं है। ये सिर्फ उपराष्ट्रपति को उन विभागों के बारे में एक समझ के लिए की गई एक्सरसाइज है। उससे ज्यादा कुछ नहीं है। लेकिन फिर भी एक्सरसाइज अपने आप में पहली बार हो रही है। इसलिए इसने लोगों के कान जरूर खड़े किए हैं।
केरल – तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल इनको क्या है परेशानी-दंगों की दी धमकी

लंबे समय से विवाद चल रहा है वो यह है कि तमिलनाडु सरकार ने एसआईआर के विरोध में सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय कर लिया है। जो पहले दौर की जो एसआईआर एक्सरसाइज थी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन वोटर लिस्ट में वो प्रक्रिया पूरी हो गई थी वो केवल बिहार के लिए थी। उसके बाद चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके 12 और राज्यों में ऐसा करने का निर्णय किया है। उसमें कुछ ऐसे राज्य हैं जिनमें तुरंत चुनाव होने वाले हैं। जैसे तमिलनाडु व पश्चिम बंगाल, केरल इस तरह के राज्य हैं। आसाम हालांकि उसमें
नहीं है। वहां भी चुनाव तुरंत होने वाल हैं। वहां पर इसलिए नहीं हो रहा है कि वहां पर एसआईआर की प्रक्रिया अभी हुई है तो एसआईआर की की लिस्ट आने वाली है। उसके बाद वहां पर कुछ इस तरह का किया जाएगा। लेकिन इसके अलावा बहुत सारे और मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी एसआईआर प्रक्रिया होने जा रही है। अ तो ये कुल मिलाकर के जो एसआईआर की प्रक्रिया है इसको लेकर के दो-तीन राज्य ज्यादा मुखर हैं। जैसे केरल जैसे तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल कि तमिलनाडु ने केरल और तमिलनाडु ने एक साथ इस मामले को उठाना शुरू किया। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने तो दंगों तक की धमकी दी थी कि अगर एसआईआर होगा। हालांकि वहां पर एसआईआर का जो किट होता है वो डिस्ट्रीब्यूशन हो गया और वहां आज से कल सारा डिस्ट्रीब्यूशन हुआ और वहां एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हो गई है और चुनाव आयोग इस मामले में पीछे हटने वाला नहीं है। उन्होंने यहां तक कहा है कि चुनाव आयोग का कहना है कि यह संवैधानिक जिम्मेदारी है उनकी और वह इसको पूरी संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरी दृढ़ता के साथ करेंगे और प्रदेश सरकार अगर इसमें अड़ंगा लगाती है या प्रदेश सरकार इसमें कोई मुश्किल करती है तो उसको संवैधानिक तरीके से निपटा जाएगा। यह मामला तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट लेकर गए हैं। लेकिन मुश्किल यह है कि तमिलनाडु की सरकार उन्हीं सारी बातों को लेकर के सुप्रीम कोर्ट में गई है। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने आगे वर्डिक्ट पहले ही वर्डिक्ट दे चुका है। शायद और इसको स्वीकार करना ही अपने आप में आश्चर्यजनक बात हो सकती है। लेकिन चूंकि विपक्ष की किसी भी बात को सुप्रीम कोर्ट बहुत उत्साह के साथ सुनता है तो यह बात सुनी जा सकती है।
बिना ट्रायल – बिना जमानत के जेल में रखा तब सब चुप क्यों

दिल्ली दंगों के अभियुक्त को लेकर के राजनीति की उनकी जमानत को लेकर के मामला सुप्रीम कोर्ट में है और लगातार चर्चा हो रही है कि उनको जमानत मिलेगी नहीं मिलेगी कब मिलेगी इसको लेकर के और जो है इसमें सरजी इमाम है और उसके बाद उमर खालिद हैं। इस तरह के चार-पांच लोग हैं जिनको जिनको लेकर के यह कहा जा रहा है कि ये 5 साल से जेल में हैं। इनको जमानत नहीं मिली है। बेल इज़ द रूल। जेल इज़ बेल इज़ द रूल और जे मतलब जेल इज़ एक्सेप्शन। ये इस तरह के डिक्टम इस तरह के आर्गुमेंट्स दिए जा रहे हैं। लेकिन शायद ग्रेविटी ऑफ द केस या ग्रेविटी ऑफ द मैटर को कोई की कोई बात नहीं करता है। और यह बात जो लोग करते हैं वो एजेंडा है वो लोग कभी हिंदू टेरर में जब प्रज्ञा ठाकुर को या कर्नल पुरोहित को या और बाकी लोगों को असीमानंद को 8 साल तक बिना ट्रायल के बिना जमानत के जेल में रखा गया 9 साल तक। उस समय इस मामले में चुप्पी रहती है और उसके अलावा जो किसान आंदोलन के दौरान अजय मिश्रा टेनी के लड़के एक मामले में जेल में हैं उनकी जमानत को लेकर के उनकी जमानत कैंसिल कराने को लेकर के यह पूरा एजेंट ग्रुप एक्टिव हो गया था। तो यह सेलेक्टिविटी है। लेकिन इस सेलेक्टिविटी पर कोई चर्चा नहीं करता। ये सेलेक्टिविटी लगातार बनी रहेगी और बात रहेगी। लेकिन दोनों तरफ से दोनों तरफ से इस बात पर घमासान है। राजनीति हो रही है कि उमर खालिद और उनके बाकी लोगों को ज मतलब उमर खालिद और सरजील इमाम जैसे लोगों को जमानत मिलनी चाहिए और जमानत क्यों नहीं मिलनी चाहिए? दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रख रहे हैं।
