सोनिया -राहुल ने ठुरकाया वरूण गांधी वापस पहुंचे Modi की शरण में 

वरुण गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की है और  लंबे समय के बाद वो सामने आए हैं, वैसे  बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं के साथ उनके संबंध और जिस तरह से वो लगातार भारतीय जनता पार्टी की आलोचना कर रहे थे। उसके बाद ऐसा लग रहा था कि पार्टी में अब वह हाशिए पर आ गए हैं और हासिए पर ही  थे,  उनको टिकट नहीं दिया गया। उनकी माताजी चुनाव लड़ी और हार गई। उनकी कांस्टीट्यूएंसी जो है वो अपनी कांस्टीट्यूएंसी से भी चुनाव जीत नहीं पाई। इन सबके बीच लगातार कृषि कानूनों की आलोचना करते हुए  वरुण गांधी को देखकर ऐसा लग रहा था कि उनको कांग्रेस में शरण
मिल जाएगी। लेकिन कांग्रेस में शरण उनको नहीं मिली। इसलिए कि सोनिया गांधी किसी भी कीमत पर वरुण गांधी या मेनका गांधी को कांग्रेस में आने देना चाह रही थी। एक फैक्टर यह हो गया। दूसरा महत्वपूर्ण बात यह है कि बावजूद इसके कि प्रियंका गांधी चाहती थी कि वरुण गांधी की वापसी कांग्रेस में हो जाए। वो हुआ नहीं।
इसलिए कि मां बेटे की जो जोड़ी है राहुल गांधी और सोनिया गांधी की वो ऐसा नहीं होने देना चाह रही थे। ये तो एक पक्ष हो गया। दूसरा इसका महत्वपूर्ण पक्ष ये है कि वरुण गांधी अब कांग्रेस जाना भी नहीं चाहते हैं। उसके पीछे कारण यह है कि जिस तरह से कांग्रेस
की पूरे देश में दुर्गति हो रही है और राहुल गांधी ने जो हाल कांग्रेस का कर दिया है। उसके बाद कांग्रेस में रह कर के राजनीतिक संभावनाएं लगभग ना के बराबर बची हैं। शायद गांधी परिवार भी अगर अमेठी और रायबरेली को छोड़कर के कहीं से चुनाव लड़ता है उत्तर प्रदेश में तो वो चुनाव नहीं जीत पाएगा। उसमें एक दो मुस्लिम कास्टट्यूएंसी पर जाकर के भी चुनाव जीत पाएंगे कि नहीं जीत पाएंगे यह बड़े मुश्किल की बात है। उन परिस्थितियों में वरुण गांधी ,  जो भारतीय जनता पार्टी से दो बार के सांसद रह चुके हैं। उनकी माताजी मेनका गांधी वाजपेई सरकार से लेकर के मोदी सरकार तक मंत्री रह चुकी हैं। तो कह उन परिस्थिति में   वरुण गांधी का  कांग्रेस में जाना और वहां चुनाव जितना लगभग नामुमकिन मुमकिन है। तो कुल मिलाकर
के स्थितियां ऐसी हैं जहां पर  कांग्रेस का हाल बुरा होता जा रहा है। और भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जिस तरह की उन्होंने बयानबाजी की थी। अब सिवाय इसके कि वह अपने आप को ठीक करें, दुरुस्त करें। अपने जो पुराने नेता हैं उनके साथ संबंध ठीक करें। इसलिए कि किसी जमाने में वरुण गांधी जो है वो प्रधानमंत्री के काफी नजदीकी माने जाते थे। मतलब प्रधानमंत्री उनको पसंद करते थे।

एक बेटी ने अपने बाप के अपमान का कैसे बदला लिया Congress से 

अभी जो राज्यसभा के चुनाव हुए हैं उन चुनाव में कांग्रेस के एक नेता की बेटी ने अपने पिता के अपमान का बदला लिया है।  उसमें
महत्वपूर्ण बात यह है कि दिलीप रॉय  जो है वह बीजेपी समर्थित कैंडिडेट थे राज्यसभा के लिए और उनके खिलाफ बीजू जनता दल के कुछ नेताओं ने वोट किया और कुछ कांग्रेस के नेताओं ने वोट किया। अब बीजेपी बीजू जनता दल के नेताओं ने जो वोट किया वो ये था उनका यह कहना था कि बीजू पटनायक जो हैं वो भारतीय
मतलब वो कांग्रेस के विरोधी थे तो कांग्रेस के किसी कैंडिडेट को वोट नहीं किया जा सकता। इसलिए उन्होंने बीजेपी को वोट किया। बीजेपी के कैंडिडेट को वोट किया। अब जो कांग्रेस के लोगों ने वोट
किया उनमें महत्वपूर्ण नाम है वो सोफिया फिरदौस का। सोफिया फिरदौस जो हैं वो मोहम्मद मुकीम की बेटी हैं। मोहम्मद
मुकीम वही नेता हैं जिन्होंने  सोनिया गांधी को पत्र लिख के यह बताया था कि राहुल गांधी से वो 2 साल तीन साल से वक्त मांग रहे हैं। उनको नहीं मिल रहा है। इसके बाद उनकी बात सुने जाने की बात तो दूर उनको पार्टी से निलंबित कर दिया गया। तो यह एक वो है और यह बात सोफिया फिरदौस ने इस बात का बदला लेते हुए बीजेपी को वोट किया। जबकि कहा बीजेपी के कैंडिडेट डेट जो दिलीप राय बीजेपी समर्थित कैंडिडेट जो दिलीप राय थे उनको वोट किया और वो जीत गए। तो ये ये एक स्वीट रिवेंज कहा जा सकता है बीजेपी मतलब बीजेपी के समर्थित कैंडिडेट को वोट देकर के सोफिया फिरदौस ने लिया है कांग्रेस से बदला और  ये बड़ा इंटरेस्टिंग है
इन चुनाव में।

Tamilnadu  में चाणक्य की यह कूटनीती क्या बनेगी विजयपथ 

तमिलनाडु में कांग्रेस का और डीएमके का अलायंस हो गया है। सरकार साथ-साथ नहीं बनाएंगे लेकिन साथ-साथ चुनाव लड़ेंगे। बीजेपी और एआईएडीएमके का अलायंस हो गया है। लेकिन
बीजेपी लगातार इस कोशिश में है कि विजय की पार्टी को अलायंस में शामिल किया जाए। अगर डीएमके को हराना है और और बीजेपी या एनडीए किसी भी कीमत पर इन चुनाव में डीएमके को
हराना चाहती है और हराए बिना वहां के प्रशासन को दुरुस्त करना या जिस तरह की बातें डीएमके के नेता करते हैं हिंदुत्व की , हिंदुत्व के खिलाफ सनातन के खिलाफ नॉर्थ के नेताओं के खिलाफ हिंदी के खिलाफ उन सब के बीच जो है वो बीजेपी या एनडीए का चुनाव जीतना जरूरी है। हालांकि अन्ना मलाई जो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं वो इस पक्ष में नहीं थे कि वहां से बीजेपी को अलायंस
में चुनाव लड़ना चाहिए। वो इस पक्ष में थे कि किसी भी तरह से हो चाहे हम चुनाव जीते चाहे हारे। इंडिपेंडेंट अकेले दम पर चुनाव
लड़ना चाहिए और अकेले दम पर चुनाव लड़ने का फायदा हुआ था। उनकी ग्रोथ हुई थी। पार्टी पार्टी की ग्रोथ हुई थी। पार्टी का
जो दो 3% का वोट था वो बढ़कर के 13% हो गया। इसलिए भारतीय जनता पार्टी को वो वहां अकेले चुनाव लड़ने देना चाह रहे हैं।
लेकिन अभी जो केंद्रीय नेतृत्व की स्ट्रेटजी है कि वो किसी तरह से पहले चुनाव में डीएमके को हराएं। उसके बाद
देखेंगे धीरे-धीरे एक्सपेंशन की बात सोचेंगे। एक दिन में एक्सपेंशन नहीं किया जा सकता है। तो इसीलिए लगातार जो है एनडीए के नेता विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी के जितने वरिष्ठ नेता हैं
इंक्लूडिंग अमित शाह इस प्रयास में है कि किसी तरह से विजय जो है वो भाजपा को एनडीए को ज्वाइन करें और उसके बाद जो है चुनाव
में वह आगे बढ़े। हालांकि टाइम अब बहुत कम बचा हुआ है। नहीं भी आते हैं तब भी वह पूरेकि जय ललिता के मरने के बाद जो एआईडीएमके का नेतृत्व है पूरी तरह से कमजोर हुआ है। और वो उतना रहा उनका आधार नहीं रहा। लेकिन दूसरी तरफ करुणानिधि और उनके बेटे स्टालिन और जिस तरह से सनातन के
खिलाफ बात करते हैं  वो डीएमके को मजबूत करता है लगातार। तो इन परिस्थिति में विजय का अलायंस में आ जाना एनडीए में भारतीय जनता पार्टी को निश्चित तौर पर एक बड़ी मदद देगा और एनडीए वहां से चुनाव जीतने की स्थिति में आ सकती है।

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