मध्यप्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में क्यों लगातार मौत का शिकार चीते

मध्यप्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में बाहर से लाए गए चीतों और उनके शावकों की लगातार मरने की खबर सामने आती हैं तो एक डर फिर लगता है कि क्या आने वाले समय में देश में फिर से चीते नहीं रहेंगे । आप में से शायद कम ही लोग जानते होंगे कि देश में चीते लगभग ७० साल से विलुप्त थे। माना जाता है देश के सबसे आखिरी चीते का शिकार वर्ष 1947 में सारगुजा के महाराजा ने किया और  वर्ष 1952 में इसे  विलुप्त जानवर घोषित कर दिया गया था।  इतने सालों से विलुपत हुए चीतों  को देश में वापस बसाने के लिए हाल ही में बाहर देशों से कई चीतों को कुनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया था , पर यहां लगातार होती चीतों की मौत ने इस पूरे प्रोजक्ट की सफलता पर सवाल खडे कर दिए हैं।

कूनो नेशनल पार्क में क्या है ग्रास लैंड की कमी 

जानकार बताते हैं कि चीता सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर है और उसको जीने के  बहुत जगह चाहिए होती है। लेकिन कूनो नेशनल पार्क  में  शायद ग्रास लैंड की कमी  है और शायद यही कारण है कि खबरे सामने आई कि यहां से कईं चीता अपनी बाउंड्री क्रॉस करके दूसरे इलाकों में चले जाते हैं  और उन्हें  ट्रेंकुलाइज करके वापस लाया जाता है। सवाल यही उठ रहे हैं कि चीतों के लिए उपयुक्त जंगल का प्रबंध क्यों नहीं किया गया।

क्या कूनो नेशनल पार्क एशियन शेरों के हिसाब से  तैयार किया गया 

कूनो के जंगलों में काम करने वाले एक एक्सपर्ट ने बताया कि  यह जंगल गुजरात से एशियाटिक लायन को यहां बसाने के लिए तैयार किया गया था क्योंकि गुजरात में उनकी आबादी लगातार बढ़ रही है। इसलिए कूनो नेशनल पार्क का हैबिटेट एशियन शेरों के हिसाब से ही तैयार किया गया था ना कि चीतों के लिए। और उन स्थितियों में जब एक जानवर को यहां सालों बाद दोबारा बसाने की बात है।

चीतों के लिए सही हैबीटेट छत्तीसगढ़ के जंगल

एकसपर्ट मानते हैं कि चीतों के लिए सही हैबीटेट  छत्तीसगढ़ के जंगल  माने जाते हैं क्योंकि वहां उनके खाने , उनके प्रवास के लिए किसी चीज की कमी नहीं है  ऐसे में बड़ा सवाल ये हैं कि छतीसगढ की बजाय चीतों को मध्यप्रदेश के कूनो में क्यों छोड़ा गया। लोग इसके पीछे राजनीति कारण भी निकाल रहे हैं क्योंकि उस संमय छतीसगढ में कांग्रेस की सरकार थी और बीजेपी किसी भी बड़े काम में कांगेस को श्रेय नहीं देना चाहती है।

शेर और बाघ की लुप्त होती जाती को बचाने के लिए शुरू प्रोजेक्ट काफी सफल 

वैसे इससे पहले देश में शेर और बाघ की लुप्त होती जाती को बचाने के लिए शुरू किए गए प्रोजेक्ट काफी सफल भी  हुए हैं। इसलिए पूरी उम्मीद है कि चीता प्रोजक्ट भी सफल होगा, हां अगर इसमें राजनीति ना लाई जाए तो। कम ही लोग ये जानते होंगे कि 18 79 में जूनागढ़ के तीन नवाबों ने शेर को बचाने का कार्यक्रम शुरू किया था और आज 100 साल बाद  हमारे पास 1000 से ज्यादा एशियाटिक लायन है। इसी तरह प्रोजेक्ट टाइगर 1972 में शुरू किया गया था तब हमारे पास अट्ठारह सौ 73  टाइगर थे जो 50 साल बाद बढ़कर 3000 से ज्यादा हो गए हैं ।

गर्व है  World में एक मात्र ऐसा देश जहां  कैट फैमिली की पूरी 16 जातियां मौजूद

 

आपको बता दें कि यह हमारे देश के लिए गर्व की बात हैं कि चीता के हमारे देश में आने के बाद हमारा देश world में एक मात्र ऐसा देश बन गया है जहां कैट फैमिली की पूरी की पूरी 16 जातियां मौजूद हैं।

चीता प्रोजक्ट को राजनीति से दूर रखना होगा 

बस कोशिश यही करनी है कि प्रोजक्ट चीता सफल रहे। और इसके लिए सरकार को इसपर पूरा ध्यान, समय देना होगा और साथ ही केंद्र-राज्यों की बीच चलने वाली  राजनीति से इस प्रोजक्ट को दूर रखना होगा।