अपने इलाके में माने जाते हैं पिछड़ों के मसीहा

झारखंड में भाजपा के कुर्मी नेता और पांच बार के लोक सभा सांसद, दो बार विधायक रामटहल चौधरी, एक कद्दावर नेता रहे हैं और सच पूछिए तो उन्हें पिछड़ों के मसीहा के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि उनके बीच टहल ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। राम टहल चौधरी स्वर्गीय दशरथ चौधरी के पुत्र हैं और रांची के मूल निवासी हैं। उनका जन्म रांची के ओरमांझी गांव में हुआ था और उन्होंने रांची में कई शैक्षणिक संस्थान स्थापित किए हैं। एक जनवरी 1942 को ग्राम कुच्चू, जिला. रांची (झारखंड) में जन्मे रामटहल चौधरी 10वीं पास हैं और पेशे से कृषक, सामाजिक कार्यकर्ता, ट्रेड यूनियनिस्ट हैं। हालांकि रामटहल चौधरी 10वीं पास हैं और पेशे से किसान हैं पर उनकी काम करने की क्षमता के आगे उनकी पढ़ाई काफी आड़े नहीं आई।

कांग्रेस को नहीं मिला रामटहल चौधरी का फायदा रांची में

2024 के आरंभ में हुए लोक सभा चुनाव से पहले टहल कांग्रेस में शामिल हो गए लेकिन चाहे रांची में कांग्रेस को उनसे कोई चुनावी फायदा नहीं मिला क्योंकि शहरी क्षेत्रों में भाजपा का दबदबा बरकरार रहा था । हालांकि चौधरी ने अपने कांग्रेस में शामिल होने का कारण जातीय जनगणना को बताया था जिसकी पुरजोर पैरवी कांग्रेस और इसके शीर्ष नेता राहुल गांधी काफी समय से करते आ रहे हैं। पर, वास्तविकता इसके उल्ट थी।
दरअसल, भाजपा ने वृद्ध होने के पैमाने के मद्देनजर रामटहल चौधरी का 2019 में रांची से टिकट काट दिया था। तब वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे और बुरी तरह हरे थे। उनकी जमानत तक जब्त हो गई थी। तब, कांग्रेस ने चौधरी को टिकट देने की शर्त को नामंजूर करते हुए उन्हें पार्टी में शामिल कराया था। इस मौके पर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी गुलाम अहमद मीर ने कहा कि चौधरी राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा से प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल हुए हैं। चौधरी दो बार स्थानीय विधायक रह चुके हैं और उसके बाद पांच बार सांसद रहे हैं। उन्होंने 1991, 1996, 1998, 1999 और 2014 में रांची लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके चौधरी के कांग्रेस में शामिल होने के मौके पर चिर प्रतिद्वंदी सुबोध कांत सहाय भी मौजूद थे।झारखंड के एक कद्दावर नेता और सच पूछिए तो पिछड़ों के मसीहा के रूप में अपनी पहचान बन चुके रामटहल चौधरी के पार्टी में शामिल होने से कांग्रेस के मजबूत होने की संभावना जताई जा रही थी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं क्योंकि चुनावी नतीजे ने उनको फुंका हुआ कारतूस साबित कर दिया ह था। इस बार भी रांची से भाजपा के संजय सेठ ही लोक सभा चुनाव जीते हैं। विधान सभा चुनाव प्रचार में चौधरी की गुमशुदगी से ऐसा लगता है कि कांग्रेस को भी उनकी अप्रासंगिकता का अहसास हो गया है।

कुर्मी मतदाताओं पर अभी भी रामटहल चौधरी का दबदबा

पर माना जाता है कि अभी भी रांची में कुर्मी मतदाताओं की संख्या पांच लाख है जिन पर रामटहल चौधरी का पूरा दबदबा है। रामटहल चौधरी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने गरीबों, किसानों, मजदूरों और आम आदमी की सेवा में उपना राजनीतिक जीवन गुजार दिया। उन्होंने रांची में 11 उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों और मांझी में एक महाविद्यालय की स्थापना की है। वह 15 ट्रेड यूनियनों के अध्यक्ष महासचिव रहे हैं। उन्होंने विकास के क्षेत्र में भी काफी काम किया और सड़कों, पुलों, यात्री शेडों, शौचालयों, पेयजल आदि से संबंधित कई समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया

बीजेपी नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए

कांग्रेस में शामिल होने के साथ ही रामटहल चौधरी ने बीजेपी नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने ने कहा था कि 2019 में उनसे जबरन कहा गया कि वो लिख कर दें कि अब वे चुनाव नहीं लड़ेंगे। तब उन्होंने इसे तानाशाही करार देते हुए पार्टी छोड़ दी थी। चौधरी ने दावा किया था कि उन्होंने जातीय जनगणना की राहुल गांधी की मांग से प्रभावित होकर कांग्रेस में शामिल होने का फैसला लिया था।

आदिवासियों को लेकर विवादित बयान से काफी किरकिरी हुई

चौधरी ने एक बार आदिवासियों को लेकर एक विवादित बयान दिया था। इस बयान की वजह से ना सिर्फ उनकी बल्कि पार्टी की भी खूब किरकिरी हो रही है। उन्होंने कहा था कि आदिवासियों ने एचईसी (हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन) से मिले पैसों का खूब दुरुपयोग किया है। इन लोगों ने उस पैसे को शराब और रेडियो में उड़ा दिया। आदिवासी रोज रेडियो खरीदते थे और शराब के नशे में रेडियो तोड़ देते थे। आदिवासियों की इन्हीं हरकतों से उनके पास अब ना तो पैसे बचे हैं और ना ही रेडियो।

रामटहल चौधरी का 2019 में रांची से टिकट कटा और उन्होंने कांग्रेस का रास्ता लिया

हालांकि चौधरी ने अपने कांग्रेस में शामिल होने का कारण जातीय जनगणना को बताया था जिसकी पुरजोर पैरवी कांग्रेस और इसके शीर्ष नेता राहुल गांधी काफी समय से करते आ रहे हैं। पर, वास्तविकता इसके उल्ट थी।
दरअसल, भाजपा ने वृद्ध होने के पैमाने के मद्देनजर रामटहल चौधरी का 2019 में रांची से टिकट काट दिया था। तब वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे और बुरी तरह हरे थे। उनकी जमानत तक जब्त हो गई थी।

न घर के रहे न घाट के फिर भी राजनीति से संन्यास नहीं

1991 से लेकर 2014 तक भाजपा के रांची से कई बार संसद रहे रामटहल चौधरी को कांग्रेस ने गाजे बाजे के साथ पार्टी में शामिल कराया था। सोचा था कि इनकी वरीयता का पार्टी को झारखंड और रांची में फायदा मिलेगा, पर ऐसा हुआ नहीं क्योंकि वे फुके हुए कारतूस साबित हुए । नतीजतन, फिलहाल कांग्रेस में भी हाशिए पर पड़े हुए हैं। मतलब न घर के रहे न घट के। फिर भी राजनीति से संन्यास नहीं ले रहे हैं।

 

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