Bihar —बडे दलों की कुछ ज्यादा ही कमर झुका गया ये चुनाव
कुछ समय की ही बात है , बिहार की गद्दी किस दल के पास जाती है , उसका खुलासा हो जाएगा, वैसे एक्जिट पोल NDA के सिर पर जीत का सेहरा बांध चुके हैं पर सभी को पता है कि कईं बार ये पोल पूरे गलत साबित हो चुके हैं, खैर इन सबके बीच 2020 के चुनाव की तरह, एक बात तो साफ ही दिखती है कि छोटे छोटे दलों की Performance काफी हद तक किसी बड़े दल को बिहार की कमान सौपने में अहम भूमिका निभाएंगे। यानी अगर कहें कि बिहार में छोटे दलों के पास सीट भले ही कम हों पर सत्ता की चाभी किसे सौपनी है उसके लिए वो बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं,
पिछली बार 43 फीसदी वोट सहयोगी दलों के खाते में

साल 2020 में बिहार में हुए चुनाव के परिणाम को देखते हुए इस बात को समझते हैं, पिछली बार RJD को 23.5 फीसदी , BJP को 19.8 फीसदी , कांग्रेस को 9.4 फीसदी और वाम दलों को 4.7 फीसदी वोट मिले थे , तो देखा जाए तो इन बड़े दलों को बिहार की जनता ने 57 फीसदी वोट दिए थे और बाकी के 43 फीसदी वोट NDA और महागठबंधन के सहयोगी दलों के साथ कुछ और छोटे दलों को चले गए थे, साफ है कि जो सहयोगी दल हैं उन्हें बिहार की जनता का पूरा सपोर्ट मिलता है और बड़ी संख्या में वोट भी मिलते हैं चाहे खाते में कम सीटे आती हों। 2020 में NDA ने 125 सीटे जीती थी और महागठबंधन ने 110 सीटे जीती थी।
Bjp और कांग्रेस जैसे बड़े दलों को भी झुकना पड़ा

अब इस बार के चुनाव की बात करें तो इस बार NDA और महागठबंधन दोनों में ही छोटे दलों का महत्व बहुत ज्यादा बढ़ गया है, जैसे कि NDA में चिराग पासवान की वापसी हो चुकी है, पिछली बार वो अलग लड़े थे उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली थी पर वोट काट कर उन्होंने JDU का बहुत नुकसान पहुंचाया था। इस बार उन्हें 29 सीटे दी गई हैं और उपेंद्र कुशवाहा की वापसी पर उन्हें भी 6 सीटे मिली हैं , वहीं राष्ट्रीय लोक मोर्चा को भी 6 सीट मिली है , इन दलों का महत्व देखते हुए और वोट ना कटे इसके लिए जहां BJP ने इस बार अपनी 9 सीटे कम की हैं वहीं JDU ने 14 सीटे। इससे साफ लगता है कि छोटे दल अपने आगे नेशनल दलों को झुकाने की क्षमता रखते हैं, वहीं दूसरी तरफ मुकेश साहनी जो महागठबंधन में आ गए उन्हें लड़ने के लिए 15 सीटे दी गई, वाम दलों की सीटे बढ़ाई गई और इसके लिए कांग्रेस जैसी बढ़ी, नेशनल पार्टी को अपनी 9 सीटे कम करनी पड़ी जबकि rjd ने एक सीट कम की ।
तो कहना यही है कि नेशनल पार्टी हो या बड़ी Regional पार्टी लेकिन चुनाव में जीतने और सत्ता पाने के लिेए कहीं ना कहीं किसी भी रूप में छोटे दलों के आगे झुकना ही पड़ता है और इस बार के चुनाव में छोटे दलों ने उन्हें कुछ ज्यादा ही झुका दिया है।
