MODI सरकार Investigation में मदद के लिए किसी दूसरे देश की जरूरत नहीं
जब ऑपरेशन सिंदूर हुआ था उस ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने लगातार यह दावा किया था कि उन भारत और पाकिस्तान के बीच जो युद्ध रुका था उसमें उनकी बड़ी भूमिका थी। उसके विपरीत अभी जो दिल्ली ब्लास्ट हुए हैं जिसमें 13 लोगों की मौत हुई है। टेररिस्ट ब्लास्ट हुआ है। उसको लेकर के अमेरिकी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रूबियो का एक बयान आया है कि अमेरिका ने भारतीय भारत को इस मामले को इन्वेस्टिगेट करने के लिए अपनी मदद की पेशकश की थी। जिसको भारत सरकार ने या भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने मना कर दिया। बहुत तरीके से उसको डिक्लाइन कर दिया कि उनको अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की इंटेलिजेंस एजेंसियों की मदद की जरूरत नहीं है। वो इस पूरे मामले को इन्वेस्टिगेट करने में इससे जुटी जानकारी हासिल करने में और जो आतंकी घटना है उसकी तह तक जाने में खुद सक्षम है। इसको लेकर के मार्को रूबियो ने जरूर वह कनाडा मेंरिपोर्टर से बात कर रहे थे और उन्होंने भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसीज की तारीफ की लेकिन निश्चित तौर पर जिस तरह से डेवलपमेंट हो रहे हैं एक के बाद एक कौन-कौन इनवॉल्वमेंट इनवॉल्व है ब्लास्ट के बाद और ब्लास्ट के पहले जो लगभग 300 किलो एक्सप्लोसिव के बरामद होने से लेकरके इस घटना के बाद को जो कनेक्ट करने की बात है उसके बाद उसमें कौन-कौन लोग इनवॉल्व है कहां-कहां जितनी आवश्यक जानकारी है वो साझा हो रही है लेकिन बहुत सारी जानकारी निश्चित तौर पर ऐसी होगी जो सुरक्षा एजेंसियों ने अपने पास संभाल करके रखी होगी उसको जरूरत पर इसको रोकने गिरफ्तारी करने और इस पूरे मसले के समाधान में उपयोग किया जाएगा लेकिन कुल मिलाकर के इंटेलिजेंस एजेंसीज ने पूरी कुशलता के साथ इस मामले को इस मामले को सॉल्व करने की दिशा में बहुत मजबूती से काम किया है और वो दिख रहा है। इस मामले में निश्चित तौर पर जब आतंकी हमला होता है तो उसमें बहुत सारी बाहर की एजेंसियों की मदद की जरूरत होती है। लेकिन अमेरिकी की मदद से भारत ने साफ मना कर दिया है जो ये बताता है कि हम इस तरह के मामले को हैंडल करने में खुद सक्षम है और उसको अपने स्तर पर मैनेज कर लेंगे।
Bihar में वोटिंग बढ़ने के दो बडे कारण

बिहार में जो वोटिंग परसेंट बढ़ा है ये जो अनप्रेसिडेंटेड वोटिंग परसेंट आया है निकल कर के लगभग 70% के आसपास 69% के आसपास जो पिछले चुनाव में मतलब ये इस दूसरे फेज में लगभग 70% के आसपास है। उसमें सबसे ज्यादा किशनगंज 75% के पास है। लेकिन ओवरऑल जो निकल कर ओवरऑल जो वोटिंग परसेंट निकल कर के आया है वो 67% है। मतलब ये कि पिछले विधानसभा के चुनाव मतलब 2020 के विधानसभा चुनाव से 10% वोट में बढ़ोतरी हुई है इस बार के चुनाव में। इसके मायने क्या है, इसको समझना बहुत जरूरी है। पहला ये कि ये जो एसआईआर हुआ है एसआईआर में जो 69 लाख 69 9 लाख वोटर्स के नाम हटे हैं। अह बहुत सारे कारण है। कुछ लोग दूसरी जगह चले गए हैं। कुछ लोग अह अब नहीं रहे हैं। और कुछ लोगों ने अपना जो जो गलत नाम थे वो सब भी हटाए गए। तो कुल मिलाकर के 69 लाख लोगों ने हटाए। तो जब ये 69 लाख वोटर हट गए तो ये जो ये जो वोटर्स हुआ करते थे लेकिन वो वोट कर नहीं पाते थे। तो इसके कारण जो वोटिंग परसेंट बढ़ा हुआ जो जब आप इसको जब आप इसको परसेंट में डालिएगा तो उसके कारण भी वोटिंग परसेंट में बढ़ोतरी हुई। इसलिए कि जितने लोग थे वो वोट करने गए। कम लोग वोट नहीं करने गए। तो यह भी वोट परसेंट का कारण एसआईआर भी है। तीसरा यह है कि जो यूथ है उसको आरजेडी ने उम्मीद जताई थी कि बेरोजगारी दूर होगी, यवाओं ने उनको कैच किया है और दूसरी तरफ महिलाएं जो हैं वो खुलकर के लगभग जो 8 या 9% ज्यादा वोट किया है तो ये दो फैक्टर और हैं जिसके कारण वोटिंग बढ़ी , अब वोट किसको गए ये अलग बात है, चाहे वो महागठबंधन को किया हो चाहे भारतीय मतलब महागठबंधन को चाहे एनडीए को भारतीय जनता पार्टी को पर वोटिंग बढ़ी है मसला यही है।
Tmc -Dmk क्यों भाग रहे हैं अपनी जिम्मेदारी से

एक जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी यानी संयुक्त संसदीय समिति बनी है इस कानून को लेकर, जिसको पार्लियामेंट में पेश किया गया था कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई मंत्री जो है वो एक पर्टिकुलर टाइम पीरियड तक जेल में रहता है। एक महीने का समय है तो उसको त्यागपत्र देना पड़ेगा। इसको लेकर के बहुत बवाल हुआ था। अब कहा यह जा रहा था कि यह सब किया इसलिए गया कि अरविंद केजरीवाल लगभग छ महीने तक जेल में रहे। उन्होंने त्यागपत्र नहीं दिया। ऐसे ही एक डीएमके के मंत्री लंबे समय तक जेल में रहे लेकिन उन्होंने त्यागपत्र नहीं दिया। दूसरा उदाहरण यह है कि हेमंत सोरेन जेल में रहे लेकिन जेल में जाने सेपहले उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। वापस लौट के आए तो उन्होंने अपनी जगह चंपाई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया था। चंपाई सोन को त्यागपत्र देना पड़ा और हेमंत सोरेन एक बार फिर मुख्यमंत्री पद संभाल लिया उन्होंने जेल से वापस आने के बाद। तो इस सब के मद्देनजर ऐसा माना जा रहा था की इन्हीं सब को देखकर के इस कानून को बनाया गया था। लेकिन उस कानून को मामले को लेकर के जेपीसी गठित की गई। लेकिन इस जेपीसी में कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस ने और डीएमके ने इस समिति का हिस्सा बनने से मना कर दिया। क्या वो लोग इस समिति का हिस्सा नहीं बन रहे हैं। इस समिति की जो चेयर पर्सन है वो भुवनेश्वर से सांसद हैं अपराजिता सारंगी। लेकिन इस जो ये समिति होती है इस समिति में दोनों पक्ष और विपक्ष के नेता होते हैं लोग होते हैं और इस पर लंबी बहस होती है। जो ऑब्जेक्शनेबल चीजें होती हैं उन पर चर्चा होती है। जेपीसी जब बनी थी वक्त पर तो बहुत बवाल हुआ था। तो ये उसी तरह का मसला है जिसमें कानून बनना है। कानून बनाया जाना है। इसमें किसी को विरोध हो सकता है। प्रधानमंत्री का भी नाम इसमें शामिल है कि प्रधानमंत्री अगर एक महीने तक जेल में रहते हैं तो उनको रिजाइन करना पड़ेगा। मतलब कोई आदमी जेल से सरकार नहीं चला सकता है स्पष्ट तौर पर। इसमें जो सरकार में होगा वो अभी बीजेपी एनडीए सरकार में है बाद में कोई और आ सकता है। तो जो भी सरकार में होगा उसके ऊपर ये लागू होगा। लेकिन इसमें विपक्ष के तीन बड़े दल मतलब तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस सब 99 सीट के साथ दूसरे नंबर पर अरे विपक्ष में है। उसके बाद समाजवादी पार्टी है। उसके बाद फिर तृणमूल कांग्रेस है। फिर डीएमके है। तो समाजवादी पार्टी तो आ रही है। लेकिन टीएमसी और डीएमके इसमें शामिल होने के लिए नहीं तैयार हैं। यह अपने आप में विरोध का एक तरीका हो सकता है। हालांकि जिस तरह से जेपीसी जो वक्त पर बनी थी उसमें कोई कंस्ट्रक्टिव रोल टीएमसी के सांसदों ने नहीं प्ले किया था जिसके कारण उनकी बहुत छीछा लेदर हुई थी। लेकिन अभी कम से कम यह जो विरोध का तरीका है यह अपने आप में थोड़ा सा अजूबा है और अगर आप डेमोक्रेटिक प्रोसेस में इस तरह की प्रक्रिया में शामिल नहीं होते हैं तो आपकी जवाबदेही भी होती है।
