New Delhi: Congress leaders Rahul Gandhi and Priyanka Gandhi Vadra gather to pay their respects as the mortal remains of late former Prime Minister Manmohan Singh arrive at the All India Congress Committee (AICC) headquarters on Saturday, December 28, 2024. (Photo: IANS)

BY ANU JAIN ROHATGI -VINOD SHUKLA 

कई ऐसी खबरें हैं सामने आ रही है पर ये कितनी ठीक है, क्योंकि पता चलता है कि खबरें ठीक नहीं है। हमने वरिष्ठ पत्रकार विनोद शुक्ला से बातचीत कर जाना इन खबरों की सच्चाई के बारे में

Ques—- खबर आई महाराष्ट्र से , कांग्रेस ने डिसीजन लिया है कि बीएमसी चुनाव वो अकेले लड़ेगी। दूसरी खबर यह भी आ रही है कि बिहार में जो रिजल्ट आए हैं उसको लेकर अब कांग्रेस आरजेडी से अलग होना चाहती है, अलग पहचान बनाना चाहती है और इन सबके साथ एक और चर्चा है जो जोर पकड़ रही है कि हर दल कांग्रेस से परेशान हो चुका है और हर दल कांग्रेस से छुटकारा पाना चाहता है और शायद ये कांग्रेस आलाकमान अच्छी तरह से जान गई है और तभी पहले से ही अलग होने की एक भूमिका तैयार कर ली गई है , आपको क्या लगता है विनोदजी

Ans —— कांग्रेस हर जगह अलग-अलग अपनी कोशिश कर रही है। अपनी-अपनी ताकत अपनी ताकत आजमाने की कोशिश कर रही है। वो उसके पीछे जो आपका जो आखिरी लाइन था वो ज्यादा महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस के साथ अब लोग नहीं जाना चाह रहे हैं। आपने बात की महाराष्ट्र की महाराष्ट्र में जिस तरह से शिवसेना का एक धड़ा और राष्ट्रवादी कांग्रेस ने मिलकर के चुनाव लड़ा लेकिन परफॉर्मेंस क्या रहा वो साफ है। दूसरी तरफ अगर आप बिहार की बात कीजिए तो बिहार में भी एक कॉमन कंसेंस कंसेंसस पर राजनीति नहीं हो पाई और अल्टीमेटली बिहार में जो महागठबंधन था उसको हार का सामना करना पड़ा। अब इसके अलावा पश्चिम बंगाल का जहां पर तृणमूल कांग्रेस भी कांग्रेस के साथ किसी भी तरह के गठबंधन या किसी भी तरह के अलायंस के साथ जाने से बच रही है। यहां तक कि उनके पुराने अधिरंजन चौधरी थे उन्होंने तो ये कह दिया कि ये जो घुसपैठिए हैं ये ममता बनर्जी के कारण हैं, इसके अलावा तमिलनाडु में भी कुछ बहुत अच्छा नहीं है। जहां पर उनकी मिलीजुली सरकार है। उसका मैं आपको उसका मैं आपको एक उदाहरण दे रहा हूं कि अभी जैसे ही बिहार की हार हुई थी उसके बाद स्टालिन की और अखिलेश यादव की बातचीत हुई और उस बातचीत में कांग्रेस कहीं पर नहीं थी। झारखंड में भी स्थितियां बहुत खराब है। झारखंड में भी उनके नेताओं की कांग्रेस से खटपट चल रही है। तो जहां-जहां भी कांग्रेस दूसरे उन घटक दलों पर जिन पर निर्भरता है वहां पर वो घटक दल कांग्रेस से मुक्ति चाह रहे हैं।इसलिए ऐसा है कि इन सब जगहों पर कांग्रेस लायबिलिटी बनती जा रही है और कांग्रेस इन्हीं पॉलिटिकल पार्टीज के दम पर फायदा तो उठा रही है लेकिन जो कॉम्प्लीमेंट करना चाहिए कि उन राजनीतिक दलों को कांग्रेस बेनिफिट कर पाए वो करती हुई नहीं दिख रही है।

मायावती की Bihar में जबरदस्त हार क्या बंद कर दिए UP में भी जीत के रास्ते

Ques— अब बिहार की बात हो रही है तो बिहार में अगर हम देखें तो मायावती ने बड़ी जोर शोर से एंट्री की थी। उनको लगा कि दलित जितने भी वोट है सब उनको मिल जाएंगे लेकिन बिलकुल फ्लॉप शो हुआ एक विधायक आया है और अब चर्चा यह भी चल रही है जो सुनने में आ रहा है कि वो डर लगा हुआ है कि वह भी कहीं दूसरी पार्टी जॉइन ना कर ले। लेकिन बिहार का जो असर है आपको लगता है यूपी में पड़ेगा। यूपी में जो मायावती का एक फेस है मतलब कुछ भी कहिए उसका वोट बैंक है। बिहार में इतनी बुरी तरह से पिछड़े हैं। कहीं ना कहीं इसका असर यूपी में पड़ेगा। और यूपी में अब आपको लगता है कि मायावती गायब हो चुकी हैं, 2027 में मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच है

ANS — थोड़ा सा इसको ज्योग्राफी से समझने की कोशिश करते हैं। उत्तर प्रदेश के दो इलाके हैं जहां पर बीएसपी का सपोर्ट बेस है। वो है बुंदेलखंड का इलाका जो यूपी और मध्य प्रदेश दोनों में है और बिहार से जुड़ा हुआ पूर्वांचल वाला इलाका है। जो संबंध है चाहे वो बिहार से जुड़ा हुआ पूर्वांचल का इलाका हो चाहे मध्य प्रदेश से जुड़ा हुआ इलाका हो बुंदेलखंड का या बुंदेलखंड का यहां पर जो दलित वोटर है बुंदेलखंड में दलित वोटर जो है पूरे उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा कंसंट्रेशन है अगर उत्तर प्रदेश में 20% के आसपास है तो ये लगभग 24% के आसपास बुंदेलखंड में है और जो पूर्वांचल वाला इलाका है क्योंकि वो एक साथ जुड़ा हुआ है तो आपस में रिलेशंस के कारण वो वोटर्स प्रभावित होते हैं। तो वो इलाका बुंदेलखंड और यहां वाला है। मायावती की कोशिश रहती है कि जब मध्य प्रदेश के चुनाव हो तो वो मध्य प्रदेश में अपने कुछ कैंडिडेट खड़ा करें और बिहार में कुछ कैंडिडेट खड़ा करें। थोड़ी बहुत सफलता भी मिलती है, वोट परसेंट मिलता है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से ना केवल इन इलाकों में बल्कि पूरे के पूरे प्रदेश में मायावती के वोट में या मायावती को इस बात को लेकर के एक मैसेज सा चला गया है कि मायावती अब बहुत सीरियसली चुनाव नहीं लड़ती है। उसका नुकसान हो रहा है और फिर उस नुकसान में नजर आता है कि दो बड़े घटक ही बचते हैं। समाजवादी पार्टी है उसके साथ चाहे कांग्रेस मिल जाए । दूसरा भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जब से ये दलित राजनीति हुई और दलित को एक अलग आइडेंटिटी बना के कोशिश की है। उसके बाद दलितों के बीच में आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी ने बहुत काम किया है और उसी का कारण ये है कि जो 202% वोटर मायावती का शुरू होता था वो अब घट के 10 12 पर आ गया है और वो उसका सीधा-सीधा जो है नुकसान मायावती को हुआ है और सीधा-सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को हुआ है। तो यहां पर कहने का मतलब है कि अगर यूपी में जो चुनाव होते हैं 2027 में तो मायावती का कोई रोल नहीं रहेगा। बेसिकली समाजवादी पार्टी और बीजेपी के बीच मुकाबला रहेगा।


शशि थरूर का बड़ा खेला मोदी की हो रही बार बार तारीफ

Ques. -एक और मुद्दा है विनोद जी बड़ी चर्चा चल रही है शशि थरूर को लेकर। बहुत बार अब मोदी जी की तारीफ कर रहे हैं। उसको लेकर कांग्रेस के कई नेता उनपर बहुत अटैकिंग है, लेकिन शशि थरूर ऐसा क्यों कर रहे हैं? यह भी चर्चा का काफी विषय बन रहा है और जो कहा जा रहा है कि वेणु गोपाल जो गांधी परिवार के काफी करीब है और वेणु गोपाल की भी शायद ख्वाहिश है कि वो केरल के मुख्यमंत्री बने और शशि थरूर अपनी ये ख्वाहिश काफी समय से जाहिर कर रहे हैं कि वो चाहते हैं कि उनको केरल में अगर कांग्रेस आए तो उनको एक फेस बनाया जाए तो आपको लगता है कि शशि थरूर जो बार-बार मोदी की तारीफ कर रहे हैं। एक तरह से डबल गेम खेल रहे हैं। एक तरह से क्या वो कांग्रेस को दिखा रहे हैं कि अगर आप मुझे केरल नहीं भेजते तो एक और आप्शन खुला है।

ANS —ये करीब साल या डेढ़ साल पहले इस तरह की चर्चा शुरू हो गई थी , अब केरल में सामान्यत एक बार लेफ्ट फ्रंट आता है एक बार यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट फ्रंट आता है कांग्रेस के नेतृत्व वाला जिसमें मुस्लिम और बाकी सारे अब उसमें कांग्रेस के तीन बड़े दावेदार थे उसमें केसी वेणुगोपाल जो जनरल सेक्रेटरी ऑर्गेनाइजेशन है ये पूर्व विदेश मंत्री हैं शशि थरूर और तीसरे रमेश चरित है जो प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं और यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। कई बार के लोकसभा सदस्य हैं। तो अब ये ये तीन दावेदारी थी और अगर मैं गलत नहीं हूं तो रमेश चंद थल्ला दलित समाज से आते हैं एससी कैटेगरी में। अब इन तीनों में दावेदारी थी। इन तीनों की दावेदारी थी और तीनों अपनी-अपनी दावेदारी पेश कर रहे थे। लेकिन चूंकि केसी वेणुगोपाल की नजदीकी राहुल गांधी से और गांधी परिवार से बहुत ज़्यादा है तो उनकी दावेदारी साफ नज़र आ रही है बावजूद इसके कि उनका सक्सेस रेट बहुत खराब है। हरियाणा की हार का ठीक की जिम्मेदारी उन पर है। महाराष्ट्र की हार की जिम्मेदारी उन्ही पर है, लेकिन राहुल गांधी उसको सुनने के लिए नहीं तैयार है या गांधी परिवार उसको सुनने के लिए तैयार है। उन परिस्थितियों में को देख के यही लगता है कि गांधी परिवार ने ये मन बना लिया है कि अगले विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस का नेतृत्व के वेणुगोपाल के होगा। अब ये दोनों शशि थरूर और केसी वेणुगोपाल दोनों लोकसभा के सदस्य हैं। अब जो प्रश्न आपका था कि इसमें शशि थरूर की क्या भूमिका और शशि थरूर इस तरह की बात क्यों कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री की बार-बार तारीफ़ कर रहे हैं। शशि थरूर को यह मालूम है कि जब वो चुनाव लड़े थे राष्ट्रीय अध्यक्ष का तब भी गांधी परिवार जो है वो मल्लिकार्जुन खड़गे के साथ खड़ा था। तो अब भी इस मामले में वो केसी वेणुगोपाल को छोड़कर शशि थरूर पर नहीं आएंगे। तो उनके पास ऑप्शन क्या बचता है? या वो एमपी बन के संतुष्ट रहे या अपना पॉलिटिकल एंबिशन है और हर व्यक्ति का पॉलिटिकल एंबिशन होता है कि जिस प्रदेश से वो आता है वहां पर उसको मुख्यमंत्री पद की अगर जिम्मेदारी मिल जाए और तब जब उसके पास बहुत मौका होता है काम करने का। लेकिन शशि थरूर के हाथ कुछ नहीं लगने वाला है यह उनको पता चल चुका है तो अगर बीजेपी के साथ जाना है तो उनको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। वैसे केरन में उनकी अपनी एक ऐसी इमेज है जहां पर वो एक बड़ा बड़े वर्ग को अपने साथ ला सकते हैं। सेकुलर इमेज है, इंटेलेक्चुअल इमेज है और इस तरह के लोगों को केरल में पसंद किया जाता है। तो अगर वो बीजेपी में जाते हैं तो जैसा कि केरल में 54 फीसदी के आसपास हिंदू है और लगभग 18% वहां पर क्रिश्चियन है। तो अगर यह 55 और 18 का गठजोड़ करने में शशि थरूर चार साल 5 साल मेहनत कर सकते हैं तो बीजेपी को कोई इस बात से गुरेज नहीं है कि उनको मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करके चुनाव लड़ाया जाए। इसलिए कि अभी बीजेपी का वहां से अभी एक सांसद है। इस बार केरल से खाता खुला है पर वो सांसद भी राजनीति में बहुत ज्यादा इंटरेस्टेड नहीं दिखते हैं तो उन परिस्थिति में अगर बीजेपी शशि थरूर को प्रोजेक्ट करके चुनाव करती है तो दो अगला चुनाव ये इस बार के बाद वाला चुनाव बीजेपी के जो है एक चैलेंजर के रूप में उभर सकती है और शशि थरूर मुख्यमंत्री के दावे हो सकती है। ये एक बड़ा प्रोजेक्ट जो है शशि थरूर के मन में हो सकता है और वो इसीलिए इस तरह की बात तारीफ जो मोदी जी कर रहे हैं।

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