हमारी Parliament को क्यों जरूरत है ‘डेनिसन का नियम की 

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को घेरने के लिए पूरा विपक्ष एकजुट होकर खड़ा हो गया है, ओम बिरला पर आरोप लग रहे हैं कि वो पक्षपात करते हैं और विपक्षी महिला सांसदों को झूठे आरोपों के जरिए बदनाम करने की भी कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि  लोकसभा में विपक्ष ने अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने के लिए नोटिस दे दिया पर सबको पता है कि यह संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि लोकसभा में NDA  सांसदों की संख्या कहीं ज्यादा है, पर जाहिर सी बात है कि विपक्ष के इस  कदम से सरकार और उसके बीच की तल्खियां और बढ़ेगी, संसद और ज्यादा ठप होगी और जाहिर सी बात है इससे शायद ही किसी भी दल का  कुछ बिगड़े,   हां देश की टेक्स पेयर जनता के उपर इसकी गाज गिरेगी ही गिरेगी माना यही जाता है कि संसद को गरिमापूर्वक  सुचारू रूप से चलाने के लिए  स्पीकर का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण होता है  और पहले की राजनीती में स्पीकरको चाहे सरकार हो या विपक्ष स्पीकर को बहुत ही मान -सम्मान देता था, पर पिछले कुछ सालों से संसद में जो चल रहा है वो किसी से छुपा नहीं है, विपक्ष के सांसद तो जब चाहे स्पीकर का अपमान कर ही देते हैं, पर सरकार की तरफ से भी उसे उतना सम्मान नहीं मिल पाता जिसके वो हकदार हैं, और ऐसे में राजनीतीक गलियारों में चर्चा चल निकली है कि भारत में अब ‘डेनिसन का नियम की जरूरत है, अब यह नियम  है क्या ,  ब्रिटेन में एक समय में ऐसी परंपरा थी कि अगर कोई भी नेता स्पीकर बन गया , तो उसके सम्मान में कोई भी पार्टी अगली बार स्पीकर  चुनाव में उसके खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारती थी। और ऐसे में स्पीकर भी पूरी निष्पक्षता से, पक्ष -विपक्ष में समन्वय करके बडी ईंमानदारी से  काम करता था। आपको बता दें कि इस नियम का नाम  जॉन एवलिन डेनिसन के नाम पर पड़ा है जो ब्रिटेन में 1857 से 1872 तक स्पीकर रहे हैं, वर्तमान समय में  ब्रिटेन में भी पार्टियां स्पीकर के खिलाफ उम्मीदवार खड़े करने लगी हैं पर ज्यादातर मामलों में आज भी वहां स्पीकर  पद को स्म्मान दिया जाता है।

 विपक्ष के 118 सांसदों के  हस्ताक्षर पर  तृणमूल कांग्रेस और आप गायब

आपको बता दें कि लोकसभा की व्यवस्था ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स के मॉडल पर बनी है। आजकल के हालात को देखकर लगता यही है कि सरकार और विपक्ष को ‘डेनिसन के नियम को याद करना चाहिए इससे  सबक लेना चाहिए जिससे संसद का काम सुचारू रूप से चल सके। अब ओमबिरला के खिलाफ जिस तरह से पूरा विपक्ष लामबंद हो गया वो अपने आप में ही सदन की मर्यादा पर प्रशन लगाती है, वैसे पता यही चला है कि  अब तक विपक्ष के 118 सांसदों ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं। पर आश्चर्य यही है कि लेकिन तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इससे खुद को अलग रखा है। 2022 में उपराष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी तृणमूल कांग्रेस ने वोटिंग का बहिष्कार किया था, जिससे जगदीप धनखड़ को परोक्ष रूप से फायदा मिल गया था। आज सवाल ओम बिरला के जाने का नहीं क्योंकि वो कही जाने वाले नहीं हैं पर इस प्रस्ताव से सरकार और विपक्ष दोनों दो कोनों में खड़े दिख रहे हैं,  जहां अध्यक्ष की यही जिम्मेदारी है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष – दोनों को बराबर मौका मिले और सदन की कार्यवाही ठीक से चले। वहीं सरकार के साथ विपक्ष को भी इस पद की गरिमा को बनाए रखने के लिए पूरे प्रयत्न करने चाहिए पर  आज के  सदन से ये बातें पूरी तरह से गायब दिखती हैं जो Democracy के लिए बहुत बड़ा खतरा है।

क्या Rahul Gandhi नहीं लड़ पाएंगे कोई चुनाव

राहुल गांधी का लगातार लोकसभा में हंगामा करना, खुद भी वाक आउट करना , दूसरों को भी साथ ले चलना, साथ ही सदन में गलत भाषा का प्रयोग करना,  लगता है ये सब अब राहुल गांधी पर भारी पड़ने वाला है,  आपको बता दें कि राहुल के इसी व्यवहार से नाराज बीजेपी सांसद  निशिकांत दुबे ने लोकसभा में  सब्सटेंटिव मोशन यानी विशिष्ट प्रस्ताव पेश करके  नेता प्रतिपक्ष यानी राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करने और भविष्य में चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।  दुबे ने सीधे आरोप लगाया  है कि राहुल गांधी  सोरोस फाउंडेशन के साथ साथ  देश को टुकड़े करने वाली ताक़तों के साथ खड़े रहते हैं भारत विरोधी काम कर रहे हैं। इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने का कोई अधिकार नहीं है। निशिकांत दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि राहुल लगातार संसद में झूठ बोलकर सभी को  गुमराह करने का प्रयास भी कर रहे हैं। राहुल का लगातार  संवैधानिक संस्थाओं जैसे चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट और लोकसभा अध्यक्ष पर अंगुली उठाना भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है। अब जाहिर है कि जब राहुल गांधी के के खिलाफ यह प्रस्ताव आएगा तो सदन में हंगामा तो होएगा ही।इसके सामने आते हैं सरकार और विपक्ष आपस में भिड़ गए और लोकसभा भंग करनी पड़ी , वैसे आपको बता दें कि  सब्सटेंटिव मोशन, ऐसा प्रस्ताव  है, जिसके जरिए सदन किसी मुद्दे पर अपना मत व्यक्त करता है या निर्णय की मांग करता है। ये प्रस्ताव  राजनीतिक में बहुत  संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि इससे विपक्ष और सरकार के बीच टकराव और बढ़ जाता है और अब माना यही जा रहा है कि पहले से ही विपक्ष और सरकार में तनातनी चल रही है ऐसे में ये प्रस्ताव सरकार और विपक्ष के बीच और दूरियां पैदा कर सकता है।

Bihar -राबडी देवी का भाई  क्यों फंसा मुसीबत में 

लग रहा है कि बिहार विधान परिषद में राबड़ी देवी के भाई के शायद गिनती के ही दिन बचे हैं, जी हां वो कमाल ही ऐसा करते हैं कि उनके निलंबन तक की नौबत आ गई है, दरअसल आपको बता दें कि  एमएलसी सुनील कुमार सिंह और ग्रामीण कार्य मंत्री अशोक चौधरी के बीच  जोरदार बहस के चलते दोनों ही आपा खो बैठे और कहा जा रहा है कि सुनील सिंह ने मर्यादा की सीमा पार कर दी, यह पहला मौका नहीं है जब सुनील सिंह ने अभद्र भाषा  का प्रयोग किया हो, इससे पहले भी लालू यादव के बड़े पुत्र तेज प्रताप यादव के साथ भी सुनील कुमार सिंह की जुबानी जंग हो चुकी है, यही नहीं  दो साल पहले भी सुनील कुमार सिंह ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी जिसकी वजह से उनकी सदस्यता रद्द कर दी गई थी, हालांकि उस समय सुप्रीम कोर्ट ने उनकी  सदस्यता तो बहाल कर दी थी लेकिन कोर्ट ने साफ कह दिया  था कि अगर सुनील कुमार सिंह सदन में दोबारा दुर्व्यवहार करें तो एथिक्स कमेटी और चेयरमैन फैसला ले सकते हैं।और अब फिर एक बार फिर एक साल के अंदर ही  सुनील कुमार सिंह पर फिर से  सदन की मर्यादा तोड़ने का आरोप लग गया है, देखना यही है कि क्या इस बार उनकी सदस्यता पूरी तरह ख्तम हो जाएगी, वैसे आपको बता दें कि सुनील कुमार सिंह को लालू परिवार का काफी  करीबी  माना जाता है और  राबड़ी देवी इन्हें राखी भी बांधती हैं। पर हां था लालू प्रसाद के बड़े पुत्र तेज प्रताप यादव इन्हें पसंद नहीं करते है।

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