BY RUBY KUMARI

 

मधुमक्खियां ना हों तो खाने-पीने की हो जाएगी कमी

कम ही लोग ये जानते होंगे कि मीठा शहद बनाने वाली मधुमक्खियों का हमारे पर्यावरण को बचाने में कितना बड़ा हाथ रहता है, , इन मधुमक्खियों के बारे में विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने यह तक कहा था कि अगर मधुमक्खियां पृथ्वी से समाप्त हो जाएं तो चार साल के अंदर ही इस पृथ्वी से मानव जाति का नामोनिशान मिट जाएगा। आपको यह सुनकर आश्चर्य हो रहा होगा पर इसके पीछे की वजह जानेगे तो और भी हैरान हो जाएंगे, कम ही लोग ये जानते होंगे कि मधुमक्खियां यानी हनी बी और इसकी कईं और प्रजातियां पौधों के परागण में बड़ी भूमिका निभाती हैं। समझाने वाली भाषा में परागण का मतलब है कि पौधों के नर-मादा भाग का आपस में मिलन कराना जो बीज निर्माण के लिए जरूरी है। यह काम हवा-पानी और तमाम तरह के कीट-पतंगों द्वारा किया जाता है।

मधुमक्खियों का फसलों के बीजों को हर जगह पहुंचाने यानी परागण मे एक चौथाई के लगभग योगदान

 


संयुक्त राष्ट्र संगठन की संस्था फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी तक भोजन के लिए पूरे विश्व में 6000 से ज्यादा पौधों की प्रजातियों की खेती की गई है, लेकिन इस समय 200 से भी कम पौधों की प्रजातियां हमारे खाने के काम आती हैं , अब फसलों और आहार की घटती variety का बड़ा कारण यही है कि परागण में योगदान देने वाले कीट-पतंगों- जीव-जन्तुओं का धीरे धीरे खातमा हो रहा है और इसमें मधुमक्खियों की प्रजातियों का खातमा सबसे ज्यादा चिता का विषय है। क्योंकि माना जाता है कि मधुमक्खियों का फसलों के बीजों को हर जगह पहुंचाने मे एक चौथाई के लगभग योगदान रहता है। जी हां आंकड़े बताते हैं कि पौधों के परागण में मधुमक्खियों की प्रजातियां लगभग 73 फीसदी रोल निभाती हैं , उसके बाद परागण में मक्खियों की भूमिका 19 फीसदी रहती है, चमगादड़ की 6.5 फीसदी , झींगुर की 5 फीसदी, पक्षी की 4 फीसदी, तितलियों की 4 फीसदी रहती है।

 

कीटनाशक से जहरीली फसलों का रस सेवन के बाद 26 फीसदी रानी मक्खी अंडे देना बंद कर देती हैं

विशेषज्ञ मानते हैं कि मधुमक्खियों में भी जंगली मधुमक्खियों की प्रजाती की भूमिका बहुत important होती है। ज्यादा है। कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि 100 प्रमुख फसलों में से 80 प्रतिशत के परागण में जंगली मधुमक्खियों यानी वाइल्ड बी की अहम भूमिका है रहती है। आंकड़ों को देखें तो पूरे विश्व में मधुमक्खियों की 25,000 से 30,000 प्रजातियां हैं। वहीं भारत में 1000 के लगभग प्रजातियां हैं। पर पिछले काफी समय से खासकर यूरोप और अमेरिका में मधुमक्खिों की कई प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। हमारे देश में भी कोई अच्छी स्थिति नहीं है।आंकड़े बताते हैं कि पिछले 25 वर्षों के दौरान भारत में 40 प्रतिशत से ज्यादा मधुमक्खियां विलुप्त हो गई हैं, और लेकिन जंगली मधुमक्खियों का तो कोई आंकड़ा ही नहीं हैं वो कितनी तेजी से गायब हो रही हैं कोई नहीं जानता । विशेषतज्ञों का यही मानना है कि पर्यावरण को जिस तेजी से नुकसान पहुंचाया जा रहा है, उससे मधुमकिख्यां ऐसे ही लुप्त होती रहेंगी क्योंकि ना तो उनके रहने की जगह बचेगी ना प्रजनन देने के लिए उचित environment की। वैसे पर्यावरण पर बढ़ता खतरा वाले समय में आपकी कॉफी की चुस्कियां भी छीन सकता है और सेब का स्वाद भी , जी हां अगर इनकी फसलें भी ख्तम हो जाएं तो। चलते चलते आपको बता दें कि फसलों पर कीटनाशक के बढ़ते प्रयोग के कारण जब मधुक्खियां इनपर बैठती हैं , इसका रस खाती हैं तो कीटनाशक की वजह से यह रस भी जहरीला हो जाता है और इस रस के सेवन के बाद 26 फीसदी रानी मक्खी अंडे देना बंद कर देती है।

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