इजरायल क्या विश्व नक्शे से मिटने वाला- कौन खेल रहा इजरायल के खिलाफ Psychological war

वेस्ट एशिया की क्राइसिस मतलब जो इजराइल, अमेरिका और ईरान का वॉर है जिसमें अब बहुत सारे और देश इनवॉल्व हो गए हैं। वह लंबा खींच गया है। ऐसे तो यूक्रेन और रशिया का वॉर भी लंबा खींच गया है। लेकिन इस बीच रशियन जनरल का एक स्टेटमेंट सामने आया है जो चौंकाने वाला है, रशिया के लेफ्टिनेंट जनरल आपती अलाउद्दीन ने ये दावा है कि वेस्ट एशिया क्राइसिस में कहीं इजराइल विल सीज टू एक्सिस्ट- मतलब इजराइल विश्व के नक्शे से गायब तो नहीं हो जाएगा। अब इससे पहले भी रशियन लीडरशिप ने बहुत कुछ दावे किए हैं यूक्रेन के बारे में कि वो 10 दिन में वॉर खत्म हो जाएगा, 15 दिन में वॉर खत्म हो जाएगा , मगर ऐसा हुआ नहीं और अब इजरायल को लेकर ये दावा भी कहीं फिट बैठता नहीं दिखता।जो जिओपॉलिटिक्स में बदलाव हुए हैं, सबसे बड़ा बदलाव ये हुआ कि जब 1948 में इजराइल अस्तित्व में आया था और अमेरिका ब्रिटेन इंस्ट्रूमेंट था। ब्रिटेन ही था जो इजराइल को जिसने सबसे पहले इजरायल का स्वागत किया। अब इजराइल अस्तित्व में आया है लेकिन इजराइल के प्रधानमंत्री नितिन याहू ब्रिटेन को इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ यूनाइटेड किंगडम बता रहे हैं, वहां की डेमोग्राफी बदल रही है। ये सही है। उस पर वो कमेंट कर रहे हैं। लेकिन असली मसला है कि दोनों में दूरी आ रही है। दूरी आने के पीछे कारण यही है कि वहां इस्लामिक पॉलिटिक्स डोमिन डोमिनेट कर रही है और वेस्ट एशिया इसको मिडिल ईस्ट कहिए या सेंट्रल एशिया मतलब पूरे रीजन को कहिए यहां पर जो है यहां पर भी इस्लामिक पॉलिटिक इस्लामिक जो एक्सट्रीमिज्म है उसी के खिलाफ इजराइल लड़ाई लड़ रहा है। अब उस पर आरोप हो सकता है कि वो उसका एक्सपेंशनिस्ट वो है वो गाजा पट्टी और गोलनपास सब पर कब्जा चाहता है। एक ग्रेटर इजराइल की कल्पना है उनके दिमाग में और वह बहुत सारे चीजों को एग्जीक्यूट करते हुए नजर भी आ रहे हैं। लेकिन उसके पीछे उनकी तकलीफ या उनका दर्द भी है कि किस तरह से वो लगातार आतंकवाद के चपेट में है।

इजरायल की तरभारत भी चारों तरफ से घिरा हुआ है

इस मामले में उनकी स्थिति कमोबेश भारत जैसी ही है। भारत भी चारों तरफ से घिरा हुआ है और इजरायल भी चारों तरफ से घिरा हुए हैं। भारत ज्योग्राफिकली बड़ा है। पापुलेशन के हिसाब से बड़ा है। वो बहुत छोटा देश है। लेकिन फिर भी वह मुकाबला कर रहे हैं और आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं। अब इसमें एक और बड़ा फैक्टर सामने आया है कि वेस्ट एशिया की क्राइसिस है इस क्राइसिस में अभी तक जो कहा जा रहा था कि सुपर पावर है और वो ईरान को निपटा देगी। लेकिन वैसा हुआ नहीं। इजराइल अपने जो उसका टारगेट था जो तीन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन थे हुती, हिजबुल्ला और हमास उन तीनों पर लगातार ऑन स्लॉट कर रहा है और हिजबुल्ला को हमास को तो लगभग इजराइल ने खत्म ही कर दिया है और जो उनके बेससेस थे फिलिस्तीन में और बाकी उनको डिस्ट्रॉय कर दिया है और उनको वहां से भागने पर मजबूर कर दिया कर दिया है और वो लेबनान और बाकी सब जगह पर जहां आतंकवादी ठिकाने हैं उन पर हमला कर रहा है। लेकिन इन सबके बीच जो बात निकल कर के आ रही थी और कई कई बार बहुत व्यंग के तरीके से जो जिओपॉलिटिकल एक्सपर्ट्स हैं वो ये कह रहे थे कि जो मामला है वेस्ट एशिया का या जो ये तीन देशों की लड़ाई है इसमें कहने के लिए तो सबके अपने-अपने क्लेम्स हैं। लेकिन असली विक्टोरियस जो है इसमें वो चाइना है।

 

युद्द वेस्ट एशिया देशों के बीच लेकिन फायदा चीन को हो रहा है

 

चाइना हर तरह से जीतता हुआ दिखाई दे रहा है। मतलब परसेप्शन वाइज उसने ईरान का साथ देकर के जो ग्लोब हैजिमनी थी यूएस की उसको डिस्ट्रॉय कर दिया। अमेरिकी इकॉनमी पर इसका इतना दुष्प्रभाव इतना प्रभाव पड़ा कि वो लंबे समय तक इससे उभर नहीं पाएंगे और अभी तक उसमें फंसे हुए हैं। तीसरा जो महत्वपूर्ण है मामला है वो यह किए जिनके आर्म एंड इमिनेशंस को उन्होंने ना केवल बेचा बल्कि इस वॉर में ईरान को के लोगों को या ईरान को गिने पिक की तरह से इस्तेमाल करके उन्होंने अपने आर्म एनिमिनेशनंस और ड्रोन और बाकी सारी चीजों को टेस्ट किया। चाइना जो है वो अपने इंटरेस्ट को बहुत मजबूती के साथ सर्व करता हुआ दिख रहा है। अब इसमें रशिया की कहां से भूमिका है? रशिया भी इक्वल बेनिफिशियरी है। अगर अमेरिकी रेपुटेशन, अमेरिकी हेजमिनी, अमेरिकी लीडरशिप ग्लोबल कहीं से कम होती है। हालांकि रशिया उस दौड़ में बहुत पीछे चला गया है। चाइना ने लंबे समय से टेकओवर किया है। कंपटीशन असली चाइना और अमेरिका के बीच में है। लेकिन इसमें अगर अमेरिका जो है वो कहीं से मिलिट्रीली अमेरिकी चाइना रशिया अभी बहुत पावरफुल है। और रशिया लड़ते रहे हैं। चाइना सीधे डायरेक्ट वॉर में कभी नहीं होता है। वो वो मर्चेंट स्टेट है। उसको अपने फायदे दिखने चाहिए। वो नियो कॉलोनियलिज्म में विश्वास करता है। अफ्रीका के बहुत सारे देशों पर उसने अपने पैसे लोन दे के पाकिस्तान, श्रीलंका हम और मालदीव्स इन पर वो अपना धीरे-धीरे कब्जा बनाकर। तो अब इसमें इस पूरी लड़ाई में अचानक रशियन जनरल को कूदने की क्यों जरूरत है? रशियन जनरल को कूदने की जरूरत इसलिए अचानक पड़ी कि वह इस पूरे मामले में किसी भी तरह से अमेरिका को ए्बरेस देखना चाहते हैं और ईरान के साथ कि वो मजबूती के साथ खड़े हैं। ईरान को बहुत सारा वो हथियार सप्लाई कर रहे हैं। टर्की को वो सप्लाई कर रहे हैं।लेकिन इजराइल को इतनी आसानी से राइट ऑफ करना या ये कहना कि वो खत्म हो जाएगा। ये मुझे लगता है सिवाय एक साइकोलॉजिकल वॉर से ज्यादा कुछ नहीं है। इजराइल बहुत मजबूती के साथ अपने जगह पर डटा हुआ है और अपने देश के लिए अपनी सुरक्षा के लिए लगातार मजबूती से जो जरूरी है वो कर रहा है।