इस युद्द में अमेरिका को फंसाए रखना चाहते हैं ये दो देश

ईरान -अमेरिका के बीच जंग एक डेडलॉक वाली स्थिति है और ये एक ऐसा डेडलॉक है जिसमें वर्ल्ड की सबसे पावरफुल कंट्री फंसी हुई है , अमेरिका इस मामले से निकलना चाहता है पर कैसे निकलेगा और बहुत सारे देश चाह रहे हैं कि अमेरिका इस डेडलॉक में फंसा रहे और उस डेडलॉक में फंसा रहने देने में चाइना और रशिया की बड़ी भूमिका है इसलिए उनको फायदा है, यूरोपियन यूनियन की से जो उम्मीद थी कि वह अमेरिकी मदद के लिए वहां पर तैयार रहेगा उससे यूरोपियन यूनियन ने हाथ खींच लिया और इसीलिए अब अमेरिका भी यूरोपियन यूनियन की कोई मदद नहीं करना चाह रहा है। तो ये जो पूरा का पूरा विवाद या पूरा का पूरा मसला है लगातार लंबे समय से वॉर में है मिडिल ईस्ट उसका स्यूशन कोई दिख नहीं रहा है। एक साइन हुआ था, एक अंडरस्टैंडिंग बनी थी। लेकिन वो साइन होते के साथ ही टूट गई। तो अभी कोई इस तरह का वो नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात है कि ये जो तीन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन है हमास, उती और हजबुल्ला इन तीनों को ईरान समर्थन करना बंद नहीं करेगा। यह इनके आईडियोलॉजिकल फ्रंट्स हैं। इस्लामिक आईडियोलॉजिकल फ्रंट है जो ईरान के ही पैदा किए हुए। तो कुल मिलाकर के कॉम्प्लेक्स सिचुएशन है ईरान की और उस कॉम्प्लेक्स सिचुएशन का इंपैक्ट पूरे वर्ल्ड की इकॉनमी पर पड़ रहा है। बहुत सारे देश तो भुखमरी के कगार पर आ रहे हैं। अब ये कब तक इसका समाधान होता है? कोई नहीं प्रेडिक्ट कर सकता। लेकिन यह समस्या अभी वर्ल्ड की सबसे बड़ी समस्या बनी हु ईरान और यूएस का जो मिडिल ईस्ट में कॉन्फ्लिक्ट चल रहा है जिसमें इजराइल भी शामिल था वो खत्म नहीं हो रहा है और दावे पर दावे किए जा रहे हैं। ईरान का दावा है कि वह स्टेट ऑफ हार्मोस पर उसका कब्जा है और वह वहां से किसी का जहाज पास नहीं होने देगा। विशेष रूप से जो ऑयल वाले हैं। अमेरिका का दावा है कि वो वहां पर कंट्रोल में है। उसकी नेवी कंट्रोल में है। और जो यूएस सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस है पीट हेक्सेट उनका कहना है कि अमेरिका जो है यहां पर अनंत काल के लिए इस ब्लॉकेड को बना सकता है। जो सबके लिए मुश्किल वाली स्थिति है। अब जो अमेरिकी वाइस प्रेसिडेंट हैं जे डी वेंस उनका कहना है कि जो  ऑब्जेक्टिव है स्टेट ऑफ हार्मोंस पर कंट्रोल रखने का या उसके ब्लॉकेट का वो ये कि एनर्जी प्राइस जो है वो स्टेबल रहे गल्फ कंट्रीज में जो उनका प्रभाव है उस प्रभाव के चलते ग्लोबल जो ऑयल प्राइसेस है उसको कंट्रोल करके रखें इस बीच लेकिन ना केवल स्टेट ऑफ हार्मोस में बल्कि जो कईं स्टेट है वहां पर हूती जो आतंकवादी संगठन है उसने जो ऑयल शिप्स हैं उन पर हमला किया। दो रॉकेट फायर किए। इसके अलावा जो यूएई पर हमला हुआ। लेकिन यह पूरा का पूरा जो मामला है वह एक तो लंबे समय से खींच रहा है। दूसरा यह कि इसमें कोई भी जो है वो ब्लिंक करने के लिए नहीं तैयार है। अमेरिका को अमेरिका के लिए ये प्रेस्टीज इशू बन गया है। उनके लिए इज्जत की बात हो गई है कि वो ईरान जैसे देश जिस पर उन्होंने लंबे समय से सेंशंस लगा रखा था। वो इतने दिनों तक उनके साथ युद्ध में विस्टैंड कैसे कर पाया? इतने दिन तक मुकाबला कैसे कर पाया? इजराइल जो तीन दिन चार दिन में वॉर निपटा देता था कोई बावजूद इसके कि बहुत पावरफुल इकोनॉमिकली और हर तरह से उसके दुश्मन आसपास हैं। लेकिन ये वॉर लंबा खींच गया। अब ये वॉर लंबा शायद इसलिए खींच गया कि इस वॉर का कोई स्पेसिफिक प्लान नहीं था।

 

अमेरिका में भी पूरी तरह अर्थव्यवस्था खत्म हो रही


दूसरा इस ये कि इसमें स्ट्रेटजी अमेरिका की इसमें अमेरिका को लगभग 1.2 बिलियन डॉलर का अब तक खर्च हो चुका है। जो उसकी अर्थव्यवस्था जो पहले से ही खराब स्थिति में है मतलब धीरे-धीरे उसका डिक्लाइन या डिटरट हो रहा है। उस पर बहुत उसका इंपैक्ट नेगेटिव पड़ रहा है। ये एक ओवरऑल उस वॉर की अंडरस्टैंडिंग हो गई। लेकिन अब जो असली मसला है। हालांकि अगर आप इसको समझने की कोशिश कीजिएगा तो वॉर इस बात पर शुरू हुई थी कि ईरान को न्यूक्लियर कैपेबल स्टेट नहीं बनने देगा यूएस एक बात दूसरा यह कि जो हुती और हिजबुल्ला और हमास है इनको जो मोरल सपोर्ट इकोनॉमिक सपोर्ट और आर्म्स का सपोर्ट है ये रोकना पड़ेगा। तीसरा रिजीम चेंज का। तो रिजीम चेंज के नाम पर अमेरिका ने जो उनके टॉप लीडर हैं आयतुल्ला खोमनाई उनको एलिमिनेट ही कर दिया। इजराइल ने एलिमिनेट कर दिया और जो उनके पुत्र हैं वो गंभीर हालत में है और इस तरह का इजराइल का दावा है कि किसी भी समय इस तरह की खबर आ सकती है कि वो अब इस दुनिया में नहीं रहे।

 

लंबे युद्द में ईरान पूरी तरह तबाह हो चुका है

लेकिन सब असली मसला इन सब के बावजूद जो लंबे समय तक वॉर चला उसमें ईरान में बहुत डिस्ट्रक्शन हुआ है। जब अंदर की रिपोर्ट आएगी तो पता लगेगा कि अभी तोकि वहां पर ये प्रतिबंधित है कि कोई भी व्यक्ति बाहर की तस्वीर अगर जाएगा तो उसको भेजेगा तो उसको वेजिंग वॉर अगेंस्ट द नेशन कंसीडर करके सजा दी जाएगी। तो इस कारण वहां से कोई खबर नहीं आ रही है। कोई पिक्चर, कोई सूचना नहीं आ रही है। लेकिन ईरान पूरी तरह से डिस्ट्रॉय हो चुका है। इसमें कोई दो राय नहीं। जिस तरह के बम उन पर बरसाए गए हैं। कितने भी छिप के रहे तो जो लोग छुप के रहे हैं वो बच गए लेकिन शहर तो तबाह हुए ही हैं। जो अंदर पहाड़ियों के अंदर जो गुफाओं में जो लोग या जो इक्विपमेंट्स हैं वो रखे गए हैं वो तो बच गए। इसके अलावा पूरी की पूरी आर्मी नेवी तबाह हो गई। एयरफोर्स है ही नहीं इनके पास। इसके अलावा जो इनका जो लड़ाका मिलिशिया है वो तो जिनको रिपब्लिकन गार्ड्स बोलते हैं वो तो लड़ रहा है लेकिन जो रेगुलर आर्मी है रेगुलर आर्मी के पास को सैलरी नहीं मिल रही है उनके पास लड़ने के लिए हथियार नहीं है तो ईरान की हालत इस तरह की है। उन सब परिस्थिति में वो निश्चित तौर पर अमेरिका मुकाबला कर रहा है। उनके पास जो भी चीन से या और कहीं से सप्लाई किए हुए आर्म एंडशंस हैं। उनसे वो लड़ रहा है। उनके पास कंधे पर रख के फायर करने वाले मिसाइल्स हैं और उनके पास मिसाइल लांचर नहीं है। और जिस तरह के ट्रेन में वो रह रहे हैं वहां शायद मिसाइल लांचर का छिप कर रह रहे हैं। मिसाइल लांचर का इस्तेमाल या उसको बाहर निकालना संभव ही नहीं होगा इसलिए वो ज्यादातर शोल्डर फायर्ड जो है वो मिसाइल लांचर का इस्तेमाल कर रहे हैं और उसमें उन्होंने यूएस के को फाइटर प्लेन को गिराया है। हेलीकॉप्टर्स को गिराया है। ड्रोंस तो बहुत सारे गिराए हैं। तो वो वो सफल हो रहे हैं। लेकिन अब इन सब से बात अलग आ गई है।

सिर्फ दो देशों के बीच चल रही अहम की लडाई

अब इन सब से बात अलग आ के जो निकल कर के आ रही है वह यह कि ईरान का है कि प्रतिबंध हटना चाहिए, वॉर कंपनसेशन मिलना चाहिए। इस तरह की चीजें हैं। स्टेट ऑफ हार्मोस पर अब वसूली चाहता है ईरान जिसको लेकर के ग्लोबल असहमति है और इसीलिए अमेरिका वहां पर कब्जा हालांकि अमेरिका के पूरे ऑब्जेक्टिव वॉर के वॉर ऑब्जेक्टिव के पीछे ईरान के तेल बाजार पर कब्जा करना भी शामिल था। जैसे उसने वेनेजुएला पर कब्जा किया है कि ऑयल जो बिके वो अमेरिकी अमेरिकी अह चाहत के हिसाब से अमेरिका जैसा चाहत है चाहता है और जिस देश को चाहता है और जिस रेट पर चाहता है तो वह वो भी एक शर्त लेकिन चकि फुट ऑन ग्राउंड जो है वो हो नहीं पाया है ईरान में और उसमें बहुत ज्यादा कैजुअल्टी की संभावनाएं हैं। बहुत ज्यादा सोल्जर्स मारे जाएंगे। अभी अफगानिस्तान का अनुभव बहुत बुरा रहा है। उसके अलावा वियतनाम का अनुभव अमेरिका का बुरा रहा है। तो वो फुट ऑन ग्राउंड्स जो है वो तैयार नहीं है अमेरिका और इसीलिए इस मामले को डिले किया जा रहा है और चाह है अमेरिका ये रहा है कि जब तक ईरान पूरी तरह से एग्जॉस्ट ना हो जाए आर्म एनमिनेशंस को लेकर के। फाइनशियली तो वो पहले से ही डिस्ट्रयड है। तब तक वो फुट ऑन ग्राउंड्स नहीं भेजेगा और तब तक जो है वो ऑयल वेल्स पर या ऑयल कंपनीज पर या जो ऑयल एक्सट्रैक्शन या पूरा तेल निकालने की प्रक्रिया में अपने कब्जे को नहीं कर पाएगा। तो अब उसमें ये है कि जब ये जब तक ये नहीं कर पा रहा है तब तक जो स्टेट ऑफ हार्मूस का वो है जहां से भारत चाइना और पूरे एशियन कंट्रीज को के ऑयल सप्लाई का मामला है उस पर कब्जे की बात है और उससे पैसे चाह रहा है ईरान और अमेरिका उसको होने नहीं देना चाह रहा है। तो इन सबके बीच में अब सारा का सारा जो वॉर है वो स्टेट ऑफ हार्मोस पर आकर के टिक गया है। स्टेट ऑफ हार्मोस पर अमेरिका अपना कब्जा जो अभी वो बता रहे हैं कि उनका कब्जा है। ईरान कह रहा है कि वहां से कोई शिप जाएगा तो हम उस पर हमला करेंगे। वो चाहे जिसका हो वहां से गुजरने नहीं देंगे बिना हमको टैक्स पैसा दिए।