ममता की हार बदल गए देश में राजनीतिक समीकरण
पश्चिम बंगाल में TMC की हार से ना केवल बीजेपी बहुत ज्यादा मजबूत हो गई बलिक ममता की हार से देश में कईं राजनीतिक समीकरण भी बहुत ज्यादा बदल गए हैं , और सबसे ज्यादा एक नारा जो जोर पकड़ रहा है कि मजबूत विपक्ष बनना है तो कांग्रेस से अलग होकर बनी तमाम क्षेत्रीय पार्टियों को फिर से वापस आना पड़ेगा, मतलब हर किसी को वापस कांगेसी बनकर बीजेपी से लड़ना पड़ेगा, अब ऐसा ऐसा क्यों कह जा रहा है इसके पीछे अपनी पूरी थ्योरी है।
पहले क्षेत्रीय दलों का पूरा दबदबा था —लेकिन अब पैठ खत्म हो रही

याद कीजिए आज से 15-२० साल पहले की राजनीती, लगभग हर राज्य के क्षेत्रीय दल बहुत मजबूत हुए करते थे और केंद्र में सरकार बनाने के लिए इन दलों का सहारा लेना बहुत जरूरी था, ये दल ना केवल अपने राज्यों में राज करते थे बल्कि केद्र में सरकार चलाने में भी इनकी ही चलती थी, अब उदाहरण सिर्फ अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार का लेकर चलते हैं, लगभग 11 दलों के साथ मिलकर वो सरकार चला रहे थे और सभी दल इतना मजबूत थे कि केंद्र के हर फैसले, हर नीति में उनका योगदान, इनका पक्ष होता ही था, अब क्षेत्रीय दलों में सबको पता है कि बिहार में RJD- और JDU से लेकर यूपी में समाजवादी पार्टी, पंजाब में अकाली दल, झारखंड़ मुक्ति मोर्चा, नार्थ के कईं दल, बंगाल में tmc, दक्षिण में DMK—AIADMK , कश्मीर में नेशनल कांफ्रेस, हरियाणा में चौटाला, कर्नाटक में देवगौण की पार्टी, सभी का अपने समय में अपने राज्य में बहुत दबदबा रहा , पर समय के साथ इन सभी क्षेत्रीय दलों का दबदबा खत्म सा होने लगा है चाहे वो RJD हो या JDU, अकाली दल हो या समाजवादी पार्टी, या बहुजन समाजवादी पार्टी , नेशनल कांफ्रेस हो या शरद पवार की NCP , चौटाला, देवीलाल , बंसीलाल सभी की पार्टी का भी खात्मा होता जा रहा है। अब क्षेत्रीय दलों में ना वो एकता रही ना वो दमखम ,ना नेता जो BJP की टक्कर में खड़े हो सकें, अब से कुछ समय पहले तक ममता की क्षेत्रीय पार्टी TMC को काफी मजबूत मजबतू माना जाता था क्योंकि वो अपने दम पर बीजेपी को हराती चली आ रही थी, पर TMC और DMK दो मजबूत स्तंभों के लुड़कने से साफ लग रहा है कि क्षेत्रीय दलों का दौर खत्म हो गया है। जैसे ही एक तरफ ममता की हार हुई , दक्षिण में भी दो मजबूत क्षेत्रीय पार्टियों DMK, AIADMK का भी किला ढह गया, और इसके साथ ही राजनीति में बरसों पुराना बना क्षेत्रीय दलों का दबदबा खत्म सा नजर आने लगा।
कांग्रेस में विलय कर मजबूत कर सकती हैं, ममता की पार्टी TMCऔर शरद पवार की पार्टी NCP

शायद यही कारण है कि चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं कि अब सभी क्षेत्रीय दल जिनमें से ज्यादातर congess से निकले थे उन सभी को अब वापस आना पड़ेगा, विपक्ष को कांग्रेसी होना पड़ेगा। ममता के हारने के बाद इसकी ज्यादा चर्चा होने लगी है और इसको और ज्यादा हवा लगी जब ममता और सोनिया गांधी हुई, वैसे कांग्रेस से निकले दल यदि वापस कांग्र्स में विलय करते हैं तो इसमें कोई भी बुराई नहीं, फिलहाल दो पार्टी इस समय कांग्रेस को मजबूत कर सकती हैं, एक तरफ ममता की पार्टी tmc और दूसरी तरफ शरद पवार की पार्टी ncp, सकता है वैसे इसमें कोई बुराई नहीं, क्योंकि ये भी कांग्रेस से निकले हैं, ममता को 1997 में Congress से निकाल गया। उन्होंने 1998 में ममता ने TMC बनाई और वहीं शरद पवार जो राजीव गांधी की मौत के बाद सोनिया गांधी को वो सम्मान, या पद देने के मूड में नहीं थे इसलिए अलग हुए NCP बनाई,
आजादी से पहले ही कांग्रेस से अलग हुए कईं नेता बनाई अपनी पार्टी
वैसे Congress से विभाजन होकर अपनी पार्टी बनाने का सिलसिला आजादी से पहले ही शुरू हो गया था, सबसे पहला पहला विभाजन 1923 में चितरंजन दास द्वारा स्वराज पार्टी की स्थापना के साथ हुआ, हालांकि बाद में उन्होंने वापस विलय कर लिया। फिर उसके बाद 1939 में सुभाषचंद्र बोस ने अलग होकर आल इंडिया फारवर्ड ब्लाक की स्थापना की, फिर चौधरी चरण सिंह ने नेहरु के साथ अपने सरकारी खेती के प्रस्ताव पर तूतू मैं कि और अपनी अलग भारतीय क्रांति दल बनाया , फिर उडीसा के कद्दावर नेता बीजू पटनाक भी कांग्रेसी थे उनहोने बीजू जनता दल बनाया , इस तरह माना जाता है कि 60 के करीब ऐसे छोटे छोटे दल रहे जिन्होंनोे कांग्रेस छोड़कर अपना दल बनाया, उनसें से ,समय के साथ कईयों ने विलय कर लिया कईयों का आस्तितव ही खत्म हो गया और वैसे इस कड़ी में सबसे नया नाम TMC और शरद पवार की पार्टी NCP का ही नाम है, चौधरी चरण सिंह के पोते जयंत चौधरी NDA में मंत्री हैं,
कुल मिलाकर विपक्ष को सोचना ही पड़ेगा जिस तरह से एक एक करके विपक्षी दल कमजोर हो रहे हैं उन्हें कांग्रेस को मजबूत कर के ही BJP को टक्टर देने का ग्राउंड तैयार करना पड़ेगा
