बांकीपुर जीत ने खड़ा किया प्रशांत किशोर को चंद्रशेखर आजाद -असदुद्दीन ओवैसी की वनमैन आर्मी में
बिहार में बीजेपी की हार और प्रशांत किशोर की जीत एक नहीं कईं मायनों में बिल्कुल अलग मानी जा रही है, सबसे पहले बिहार में प्रशांत किशोर की बरसों की मेहनत रंग लाने लगी है, उनके चाहने वाले वोटर्स में बदल रहे हैं , दूसरा पांच दशकों से जो सीट बीजेपी के पास रही उसको छीनकर प्रशांत किशोर ने बड़ी कहानी रच दी है और इसके साथ ही चर्चाएं ये भी शुरू हो गई कि अब बीजेपी के सामने RJD यानी लालू का विपक्ष ख्तम होकर क्या प्रशांत किशोर का विपक्ष खड़ा हो रहा है, जो आने वाले समय में बीजेपी को सीधी टक्कर देगा। इन सब के बीच बांकीपुर चुनाव में प्रशांत किशोर की जीत ने एक सबसे बड़ी इस चर्चा को जन्म दे दिया कि अपनी व्यक्तिगत साख के जरिए एक नेता बहुत बड़ी राजनीतिक ताकत में बदल सकता है, लोगों के बीच अपनी पहचान बना सकता है बशर्त मेहनत लगन और राजनीती के दांव पेंच से वाकिफ हो। और वही प्रशांत किशोर की जीत ने साबित किया है कि अब वह भी असदुद्दीन ओवैसी-चंद्रशेखर आजाद जैसी वनमैन आर्मी में शामिल हो चुके हैं जो अपने बलबूते पर किले फतह कर कर सकते हैं। । ये नेता तो एक हैं पर इनकी राजनीति और जनता पर पकड़ ऐसी है कि सियासी वजन बहुत भारी हो जाता है, और यही वजन सरकार के साथ साथ और विपक्षी नेताओं पर भी कईं बार भारी पड़ता है।
जीत ने प्रशांत किशोर को एक जीते हुए नेता के रूप में स्थापित किया

बांकीपुर में बीजेपी की हार क्यों हुई यह अलग मुद्दा है लेकिन किससे हुई बड़ा मुद्दा वही है क्योकि बीजेपी की हार तो भोपाल के दतिया में भी हुई, लेकिन वहां हराने वाली कांग्रेस पार्टी थी, इसलिए वो हार इतनी चर्चा का विषय नहीं बनी जितनी बिहार की बांकेपुर की हार बन रही है , इस जीत ने राजनीति में उन नेताओं की भूमिका को सामने ला खड़ा किया , जो बड़ी पार्टी या गठबंधन के सहारे नहीं, बल्कि अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक पहचान के दम पर सदन तक पहुंचते हैं। आपको बता दें कि विधानसभा चुनाव में करारी हार के 8 महीने बाद मिली इस जीत ने प्रशांत किशोर को एक जीते हुए नेता के रूप में स्थापित कर दिया है। और साथ ही इस जीत से ना केवल उनकी सिर्फ राजनीति में वापसी नहीं हुई है बल्कि उनकी पार्टी के लिए भी यह मनोवैज्ञानिक बढ़त मानी जा रही है।
राजनीती लोकतंत्र में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहां किसी दल का सिर्फ एक विधायक या सांसद होने के बावजूद उसकी आवाज सदन और राजनीति दोनों में प्रभाव छोड़ती रही है और कई बार एक सीट जीतने वाला नेता भी राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन जाता है।इसमें उत्तर प्रदेश में आजाद समाज पार्टी -कांशीराम के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद का नाम लिया जा सकता है। लोकसभा में उनकी मौजूदगी उस युवा विपक्षी चेहरे की है जो प्रतिनिधित्व तो करता है छोटे दल का पर बड़े राजनीतिक सवाल उठाता रहता है। फिर बात करें AIMIM President असदुद्दीन ओवैसी की, संसद में उनकी पार्टी के सांसदों की संख्या सीमित रही है, लेकिन हर विषयों पर उनके भाषण लगातार ना केवल राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनते हैं बल्कि गौर से सुने भी जाते हैं। अब प्रशांत किशोर इस गुट में शामिल हो चुके हैं पर उनकी स्थिति इन नेताओं से कुछ अलग है। वो पहली बार खुद जनप्रतिनिधि बने हैं। ऐसे में विधानसभा में सरकार को घेरने, जनहित के मुद्दे उठाने और जन सुराज की वैकल्पिक राजनीति को जमीन पर साबित करना उनके सामने ब़ड़ी चुनौती होगी।
PM मोदी एक्शन मूड में क्या सम्राट चौधरी की लगेगी क्लास

बीजेपी की दो उपचुनाव में हार से पूरी पार्टी में खलबली मची हुई है, पता चला है कि अब खुद पीएम मोदी एक्शन मोड पर आ गए हैं और बाकायदा नेताओं की क्लास लगनी शुरू हो गई है, आपको बता दें कि बीजेपी को हाल ही में हुए दो उपचुनाव, एक बांकीपुर, दूसरा दतिया में तगड़ा झटका लगा है और इसके बाद ही पार्टी में जबरदस्त चिंतन दौर चल रहा है और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे मामले पर अपना मोर्चा संभाला रखा है , हाल ये है कि मोदी जी एक ही दिन में बैक टू बैक नेताओं की बैठकें ले रहे हैं, और साथ ही उन्होंने प बिहार के पूर्व सीएम नीतीश कुमार और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी मुलाकात करके हार के कारणों पर चर्चा की। उन्होंने बांकीपुर से लगातार पांच बार विधायक रहे और मौजूदा बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन से बात करके कईं डिटेल भी मांगे हैं। दरअसल बांकेपुर की हार ने बिहार के पहली बार बने cm सम्राट चौधरी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि उनके सीएम बनने के बाद बीजेपी की बिहार में पहली बार ये शर्मनाक हार हुई है, शर्मनाक इसलिए कि उनके उम्मीदवार को किसी नेशनल पार्टी यानी के congress या क्षेत्रीय बड़ी पार्टी rjd ने नहीं हराया बल्कि एक नई बनी पार्टी के उम्मीदवार ने उनके किले में छेद कर दिया।
