West Bengal से गयब राहुल अंडमान पहुंचे पीछे छुपा बड़ा मकसद

पश्चिम बंगाल में चुनाव के बीच राहुल गांधी अंडमान निकोबार द्वीप पहुंच गए हैं। हालांकि लगभग हर चुनाव से पहले वो इस तरह की यात्राएं करते रहते हैं। लेकिन अब उनका अंडमान निकोबार पहुंचना उसके कुछ कारण है, वैसे भीपश्चिम बंगाल के चुनाव में कांग्रेस का कुछ ज्यादा स्टेक पर नहीं है। अगर वो एक दो सीट जीतने में भी कामयाब होती हैं तो ये उनकी बड़ी उपलब्धि होगी। पश्चिम बंगाल के चुनाव के बीच वह जब वहां पहुंचे हैं और वहां पहुंचते के साथ जो ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट है उसकी उन्होंने आलोचना शुरू की है। ग्रेट निकोबार जो प्रोजेक्ट है उसमें चार महत्वपूर्ण चीजें होनी है। पहला तो एक वहां पर डॉग बनना है जो कमर्शियल और जिसका जिसका व्यासायिक है। दूसरा एक मिलिट्री और सिविल एयरपोर्ट बनना है। एक टाउनशिप बननी है। ये तीन चार महत्वपूर्ण चीजें हैं जिसके लिए लगभग 1 लाख करोड़ को 92 हजार करोड़ लगभग मतलब मान के चलिए कि 1 लाख करोड़ का वहां इन्वेस्टमेंट होना है। लेकिन वहां पर यह मामला उठाया जा रहा है कि एनवायरमेंट को डिस्टर्ब किया जा रहा है। जबकि एनजीटी ने पहले ही क्लीयरेंस अपना दे दिया है। लेकिन अंडमान निकोबार या जो ग्रेट निकोबार है वहां पर इस तरह की चीजों को लेकर के कांग्रेस क्यों विरोध कर रही है?कि क्योंकि वहां से मलक्का जो स्टेट है वह नजदीक है और वह भारत की सुरक्षा की दृष्टि से बहुत मजबूत है। बहुत आवश्यक है। हालांकि उसमें उसमें जो मलेशिया और सिंगापुर जैसे देश भी उसको बंदोबस्त करते हैं। उसका उसको हैंडल करते हैं। लेकिन भारत की भी उसमें बड़ी भूमिका है। और भारत की भूमिका ना केवल सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि बिजनेस की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। और जो ये प्रोजेक्ट है ग्रेटर ग्रेट जो ग्रेटर आयरन अंडमान प्रोजेक्ट है ये भी ना केवल इकोनॉमिक सिक्योरिटी बल्कि और भी इस तरह के डेवलपमेंट के लिए महत्वपूर्ण है। और दूसरा ये कि वहां जो चाइना लगातार अपना प्रभाव बढ़ा रहा है उसको रोकने में भी मदद करे मतलब मददगार होगा। अब क्या ये चाइना को जो वहां पर कंटेन करने में भारत का ये प्रोजेक्ट मददगार होगा। कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी इसीलिए बार-बार इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे हैं। यह बात समझने वाली है।
तेजस्वी बिहार में हारे क्या अब ममता को हराने बंगाल पहुंचे

आरजेडी के प्रवक्ता किस तरह से आरजेडी के नीतियों की या आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव की बाहर जो पश्चिम बंगाल में या बाकी और देशों में या कुछ ऐसी नीतियां या कुछ ऐसी बात जिसका ना तो बिहार की राजनीति से कोई लेना देना है ना आरजेडी से कोई लेना देना है उसकी बात कर रहे हैं। अब जैसे पश्चिम बंगाल में पश्चिम बंगाल की रैलियों में जो भीड़ जुट रही है तो उसको यह बताने की कोशिश की जा रही है कि वो तेजस्वी यादव की भीड़ है। तेजस्वी यादव अपनी अपने प्रदेश में जो रैलियां कर रहे थे वहां भीड़ नहीं भीड़ नहीं जुटा पा रहे थे। तो अभी तेजस्वी यादव को जो पश्चिम बंगाल में बुलाया गया है कि जो वहां उत्तर प्रदेश और बिहार के यादव मतदाता हैं या ओबीसी मतदाता हैं उनको टीएमसी की तरफ ले जाने की कोशिश की जाए। अब क्या टीएमसी जो उत्तर प्रदेश या बिहार का मतदाता जो पश्चिम बंगाल में है जिसको टीएमसी के जो कार्यकर्ता हैं टीएमसी के वर्कर हैं टीएमसी के नेता हैं वो ह्यूमिलिएट करते हैं या उनके साथ मारपीट करते हैं वो तेजस्वी यादव की अपील के बाद उनकी बात सुनेगा और जो लगातार साल भर या लगातार वो 5 साल अपमान सहता टीएमसी के नेताओं से, उनके कार्यकर्ताओं से उसको भूल जाएगा। ऐसा होता हुआ दिखता नहीं है। अह और तेजस्वी का प्रभाव ओबीसी नेताओं पर भी नहीं है। यादवों पर कुछ हो सकता है। लेकिन जो यादव उत्तर प्रदेश बिहार से बाहर रहते हैं उन पर उनका कितना प्रभाव होगा इसको लेकर के बहुत डाउट है। इसमें एक और महत्वपूर्ण बात है। हिंदुत्व की राजनीति को लगातार आरजेडी नकारती भी रही है।अब बहुत समझना मुश्किल हो गया कि बिहार में वो कुछ कर नहीं पा रही हैं। कोई कार्यक्रम नहीं है।छुट्टियों के बाद बड़ी मुश्किल से वापस आए थे और अभी भी बिहार में कुछ ऐसा करते हुए नहीं दिख रहे हैं जो दिखाए कि आरजेडी मजबूती के साथ अपने प्रदेश में है। बाक़ी वह क्या करेंगी वहां उनकी कोई सुनने वाला नहीं।
एक सर्वे और उड़ गई अखिलेश की नींद
उत्तर प्रदेश में जो सर्वे निकल कर के आए हैं उन सर्वे के हिसाब से भारतीय जनता पार्टी मजबूत स्थिति में है। और अभी अगर चुनाव होते हैं तो पूरे अलायंस को सिर्फ दो सीटें उस सीटों का नुकसान होता हुआ दिख रहा है पिछले चुनाव के कंपैरिजन में। और ये चुनाव ये नुकसान जो है वो भारतीय जनता पार्टी का कम अपना दल का निषाद पार्टी का सुहेलदेव समाज पार्टी का और बाकी जो अलायंस पार्टनर्स हैं उनको ज्यादा दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी को कम दिख रहा है। कुल मिलाकर के और करीब 15 सीटों का समाजवादी पार्टी को फायदा होता हुआ दिख रहा है। अब चुनाव अगले साल हैं। और यह लगभग तय है कि चुनाव जो है वह योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। तो इन परिस्थितियों में जब यह माना जा रहा है कि चुनाव योगी आदित्यनाथ की के नेतृत्व में लड़ा जाएगा और भारतीय जनता पार्टी बहुत मजबूती के साथ जो है वो चुनाव लड़ती हुई दिख रही है और लगातार तीसरी बार सरकार बना पाने की स्थिति में नजर आ रही है। कम से कम सर्वे
तो यही बता रहे हैं और ग्राउंड रिपोर्ट भी यही बता रहे हैं। अगर आप उत्तर प्रदेश के चाहे शहरों में चाहे रिमोट इलाके में जाइए तो कुल मिलाकर के मामला यही निकल कर के आ रहा है कि योगी आदित्यनाथ की पॉपुलरिटी जस की तस बनी हुई है। उसमें कोई कमी नहीं आई है। बावजूद इसके कि वो तीसरी बार मुख्यमंत्री मंत्री पद की दावेदारी कर रहे होंगे। इसके पीछे बहुत सारी चीजें हैं। जिस तरह से वह लॉ एंड ऑर्डर को लेकर के, महिला सुरक्षा को लेकर के, डेवलपमेंट को लेकर के काम करते हुए नजर आ रहे हैं। वह सारी चीजें ही उनको एक पॉपुलर नेता यहां तक कि अभी पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री के बाद अगर सबसे ज्यादा किसी नेता की मांग वहां की सरकार और सबसे ज्यादा रैलियां कोई भी नेता करते हुए नजर आए तो वो योगी आदित्यनाथ थे। तो उत्तर प्रदेश के चुनाव से पहले इस तरह का एक सर्वे आना जिसमें भारतीय जनता पार्टी को बहुत पॉजिटिव रिस्पांस दिख रहा है वो महत्वपूर्ण है और ये निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को ऊर्जा देगा लेकिन विपक्ष को निराशा देगा जो लगातार पीडीए के नाम पर चुनाव जीत मतलब जीतने का मंसूबा पाले हुए हैं।

