By Ruby Kumari
क्यों नहीं होता शहद – HONEY जिंदगी भर खराब, Nature की अनूठी देन

कुछ साल पहले पुरातत्वविदों ने दावा किया कि मिस्र में मकबरे की खुदाई में उन्हें 3000 साल पुराना शहद मिला है और यह खाने योग्य है। आपको यह सुन कर काफी आश्चर्य हो रहा होगा, लेकिन यह एक वैज्ञानिक सच है कि शहद के मिठास की कोई एक्सपायरी डेट नहीं है। यानी शहद कभी खराब नहीं होता। तो फिर बाजार में मिलने वाले शहद के डब्बों पर एक्सपायरी डेट क्यों? आखिर शहद में ऐसा क्या है जो इसे खराब होने से बचाता है? ।
मधुमक्खियां कैसे बनाती हैं HONEY

शहद की अनंत सेल्फ लाइफ के वैज्ञानिक कारणों की पड़ताल में इसकी संरचना सहित कई गुण सामने उभरते हैं जो इसे खराब होने से रोकते हैं। लेकिन, जो बात सबसे पहले सामने आती है वो है इसके सृजक मधुमक्खियों की मेहनत। नेक्टर यानी फूलों से रस इकट्ठा कर शहद बनाने में वर्कर मधुमक्खियों की पहली भूमिका होती है। ये फूलों का रस चूसकर इसे अपने दूसरे विशेष पेट यानी Honey Stomach में रख लेती हैं और इस रस में मधुमक्खी की ग्रंथी से स्रावित एंजाइम मिलता है जो रस के सुक्रोज को तोड़कर सरल सुगर में बदल देता है। सुक्रोज, डायसैकेराइड होता है जो वास्तव में दो सरल सुगर, ग्लूकोज और फ्रक्टोज से बना होता है। मधुमक्खी के हनी स्टोमक में यह एंजाइम के प्रभाव से ग्लूकोज और फ्रक्टोज में बदल जाता है। जब वर्कर बी छत्ते में वापस लौटता है तो वह रस यानी नेक्टर सोल्युशन को छत्ते में रह रहे हाउस बी को सौंप देता है। यह हाउस बी वर्कर बी की शुरू की गई प्रक्रिया को लगभग 20 मिनट तक जारी रखती है और इसे वमन कर बाहर निकालती है और फिर से पी लेती है, इस प्रक्रिया में एंजाइम नेक्टर सोल्युशन में मिलता रहता है और सुक्रोज का टूटना जारी रहता है और ज्यादातर हिस्सा टूटकर ग्लूकोज और फ्रक्टोज में बदल जाते हैं। इसके बाद हाउस बी नेक्टर को छत्ते के मधुकोश में हनी को रख देते हैं। इसमें 70 फीसद तक पानी होता है। इस पानी को वाष्पित कर उड़ाना जरूरी है जिसके लिए मधुमक्खियां अपने पंखों से तेजी से हवा करती हैं। अंत में ऑरिजनल नेक्टर का पानी का हिस्सा मात्र 17 फीसद तक रह जाता है। यह वह शहद होता है जो छत्तों से निकाला जाता है।
HONEY में बैक्टीरिया नहीं पनपता क्योंकि होती है कम पानी की मात्रा

शहद में पानी मात्रा एक बड़ा कारक है जिसकी वजह से यह खराब नहीं होता। 17 फीसद पानी, बैक्टीरिया या फंजाई के पानी के स्तर से काफी कम है। शहद में सबसे न्यूतम जल क्रिया यानी वाटर एक्टीविटी होती है, वाटर एक्टीविटी यानी पानी की न्यूनतम मात्रा जिसमें माइक्रोब्स पनप सकें। वाटर एक्टीविटी को 0 से 1 के स्केल पर मापा जाता है, शहद में यह 0.6 है जबकि बैक्टीरिया, म़ॉल्ड्स को पनपने के लिए 0.75 से उपर की वाटर एक्टीविटी चाहिए। चुंकि बैक्टीरिया इतने कम पानी की मात्रा में पनप नहीं सकता, इसलिए शहद खराब नहीं होता है। शहद की अम्लता भी उसे खराब होने से बचाती है। इसका औसत पीएच 4 होता है, जिसमें फॉर्मिक एसिड और साइट्रिक एसिड जैसे अम्लों का योगदान है, लेकिन सबसे प्रबल अम्ल है, ग्लूकोनिक अम्ल जो कि मधुमक्खी के एंजाइम का कुछ ग्लूकोज मॉल्युक्यूल पर एक्शन से पैदा होता है। अम्लीय प्रकृति के कारण शहद के बैक्टीरिया रोधी गुणों को बढ़ावा मिलता है क्योंकि कई बैक्टीरिया केवल न्यूट्रल स्थिति में पनपते हैं। यही कारण है कि शहद को घाव पर ड्रेसिंग के दौरान लगाया जाता है क्योंकि यह इतना गाढ़ा होता है कि किसी भी तरह का बैक्टीरियल ग्रोथ नहीं हो सकता और इसमें हाइड्रोजन परऑक्साइड होता है जिससे घाव का संक्रमण रूकता है। आपने यह भी देखा होगा कि समय के साथ शहद क्रिस्टल के रूप में परिवर्तित होकर ठोस हो जाता है। ऐसा शहद में पानी की मात्रा काफी कम होने के कारण होता है। वास्तव में इसे अनेक तरह के सुगर का अति-सांद्र घोल कहा जा सकता है।
शहद सील बंद ना हो Moisture अंदर पहुंच जाता

फिर बाजार में मिलने वाले शहद पर एक्सपायरी डेट क्यों। ऐसा इसलिए है कि यदि शहद को अच्छी तरह से सील डब्बे में नहीं रखा जाए तो यह बाहर से मॉइस्चर सोख सकता है और खराब हो सकता है। शहद तब तक सुरक्षित जब तक इसमें किसी भी तरह पानी न मिले। आखिर, मधुमक्खियां इसलिए तो सुखाती हैं कि यह खराब न हो।
