ममता को जीताने के चक्कर में अखिलेश यादव कहीं UP ना खो दें

अखिलेश यादव लगातार पश्चिम बंगाल के चुनाव में उससे पहले या वहां की जो गतिविधियां हैं उनको लेकर के ममता बनर्जी के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, खुलकर समर्थन कर रहे हैं। यहां तक कि बहुत सारी ऐसी चीजें जो वो उत्तर प्रदेश के लोगों के खिलाफ जाती हैं, उस पर भी ममता का साथ देते नजर आ रहे हैं। अब लगातार वो यह तारीफ कर रहे हैं कि ममता बनर्जी बहुत अच्छा परफॉर्म कर रही हैं। वो भारतीय जनता पार्टी को वहां टिकने नहीं देंगी। बहुत बुरी तरह से हराएंगी। यह सब बातें तो समझ में आती हैं। लेकिन जब वह यह कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के ऐसे अफसरों को मतलब अपशब्द का इस्तेमाल करते हुए बंगाल भेजा है जो उनकी गुलामी करते हैं या उनके साथ खड़े नजर आते हैं। उनके लिए बात करते हुए नजर आते हैं। विशेष रूप से अजयपाल शर्मा जो ऑब्जर्वर बना करके बंगाल गए थे, उसको लेकर के उत्तर प्रदेश के अफसरों को लेकर के जिस तरह की वो बात कर रहे थे और यहां तक बोले कि इन सबको सबक सिखाया जाएगा जब समय आएगा । अब उत्तर प्रदेश के किसी अफसर के बारे में ऐसे बोल अखिलेश निकाल रहे हैं जो उनपर भारी पड़ सकते हैं। ममता बनर्जी का नाम, सिर्फ अल्पसंख्यकों की बात करने वाले नेता के नाम पर जाना जाता है और हिंदुओं के वोटर्स को या हिंदुओं के इंटरेस्ट को कॉम्प्रोमाइज करते हुए तो उसी बात को लेकर के कि हम भी उस स्तर तक जा सकते हैं। अब अखिलेश कह रहे हैं कि हम भी वही कर सकते हैं उत्तर प्रदेश में चूंकि उत्तर प्रदेश में भी 20% के आसपास मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल में 30% के आसपास मुसलमान हैं। तो हम भी उस स्तर तक जा सकते हैं। वहां तक जा सकते हैं। तो एक ये अल्पसंख्यक मतदाताओं को उत्तर प्रदेश में मैसेज देने की कोशिश की गई है। चूंकि चुनाव बहुत ज़्यादा दूर नहीं है। चुनाव 27 में ही है। 2027 में चुनाव होने वाले हैं। तो, यह एक मैसेज देने की कोशिश की गई और अनगिनत घटनाएं हैं जहां पर वह अपीज़मेंट के नाम पर, ममता बनर्जी के साथ, अफसरों के साथ और भारतीय जनता पार्टी की आलोचना करती हुई नजर आए। लेकिन शायद उनको यह भी ध्यान नहीं रहा कि वो उत्तर प्रदेश के खिलाफ बात करते हुए नजर आए। इसका उनको नुकसान पहुंच रहा, पहुंच सकता है जो लगातार सोशल मीडिया पर नजर आ रहा है।

West Bengal में पहली बार चुनाव में कोई मौत नहीं—किसकी जीत मानी जाए

बंगाल में दूसरे फेज में भी हिंसा नहीं हो पाई।कुछ घटनाओं को छोड़कर, जैसे पहले फेज में हिंसा को रोक दिया गया था। वैसे दूसरे फेज में भी हिंसा को रोका गया। ये ये अपने आप में एक बहुत महत्वपूर्ण बात है कि बावजूद इसके कि लगातार पूरी की पूरी टीएमसी के जो कार्यकर्ता हैं, टीएमसी से जुड़े हुए लोग हैं और जो वहां पर वहां की जो टीएमसी के कार्यकर्ता हैं, बूथ से लेकर के और बीजेपी के वर्कर से लेकर के, सीआरपीएफ को को लेकर के इन सब पर वो हमला वार रहे। लेकिन उन सबके बावजूद सीआरपीएफ ने, पुलिस ने और लोकल प्रशासन ने वहां हिंसा से हिंसा नहीं होने दिया और हर बार के चुनाव की तुलना में इस बार पश्चिम बंगाल में चुनाव से जुड़ी हुई एक भी मृत्यु नहीं हुई। तो ये अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि आप कह लीजिए मतलब जो चुनाव प्रबंधन में जो लोग भी लगे हुए हैं उन सबके लिए तो ये इसको अगर आप केवल चुनावी उपलब्धि के तौर पर देखें तो भी , प्रशासनिक उपलब्धि के तौर पर देखें तो भी और चुनाव से पहले फ्री एंड फेयर इलेक्शन होने के संदर्भ में भी अगर आप इसको देखें तो भी यह महत्वपूर्ण है। अह बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है और उसका परिणाम मतलब इस इन सारी जो गतिविधियां हैं इन ये सब जो है रिफ्लेक्ट होगा चुनाव परिणामों में। अब चकि हर बार आरोप टीएमसी पर यही लगता है कि वह चुनाव जो है वो रिग करके धमका करके लोगों को वोट नहीं देने दे दे के एक घटना सामने आई जिसमें बीजेपी का जो बटन था उस पर टेप लगा हुआ था जिसको चुनाव आयोग ने बोला कि हम उसके जांच करेंगे अगर सही पाया गया तो इस इलेक्शन काउंटर काउंटरमांड होगा मतलब टलेलेगा तो ये ये सारी चीजें नजर आ रही हैं। अह इस बीच जो लोग अगर हिंसा नहीं हुई और हिंसा के डर से लोग जो वोट नहीं डालने गए थे तो वोट भी डाल के आए हैं। ये अपने आप में एक बड़ा वो है और अब तक वोटिंग खत्म हुई है। अब तक एक भी रिपोर्ट घटना ऐसी रिपोर्ट नहीं की गई जहां किसी की मौत की बात हुई है।

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