कब चलेगी संसद बड़ा प्रश्न?

संसद सत्र चल रहा है। संसद का मानसून सत्र लेकिन ऑफिशियली ही चल रहा है। काम कोई नहीं हो रहा है। उसका कारण यह है कि जो कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध हुआ था या यह कह लीजिए कि जो पेपर लीक वाला मामला हुआ था उसके विरोध में जो प्रदर्शन हुए उसके बाद विपक्षी दल जो हैं वो मांग कर रहे थे कि रेिग्नेशन का धर्मेंद्र प्रधान का वो हो गया। उसके बाद अगला जो अगली जो मांग हुई वो ये कि गृह मंत्री को संसद में आकर के इस बात का बयान देना चाहिए कि गोली क्यों चली? किसने चलनवाई? अब जब गृह मंत्री अमित शाह संसद में आकर के बयान देने के लिए या कह लीजिए कि सरकार की तरफ से इस बात पर स्वीकृति हुई कि हां गृह मंत्री आकर के बयान देंगे संसद में। तो जो है अगला अगली डिमांड ये आ गई कि गृह मंत्री यह बताएं कि किसने ऑर्डर किया था। उन्होंने आर्डर किया था। अगर उन्होंने नहीं ऑर्डर किया था तो किसने ऑर्डर किया था और अब यह बात कही जा रही है कि या तो वह इनक इनकंपटेंट है तो यह एक मसला चल रहा है। अब इसको लेकर के फिर डेड लॉक हो गया है। अब ये डेड लॉक कैसे टूटेगा? या नहीं टूटेगा? इसके पीछे मंशा क्या है? क्यों सरकार जो है वह लंबा खींच करके बात रखने के लिए तैयार हुई और जब सरकार बात रखने के लिए तैयार हुई तो विपक्ष ने नई मांग शुरू कर दी। तो जो मामला निकल कर के आता है वो ये है कि सरकार ये चाह रही है कि किसी तरह से डेड लॉक खत्म हो। तो वो अपने जो दो प्रमुख बिल हैं जिसको लेकर के वो लंबे समय से कवायद कर रहे थे। एक तो एफसीआरए वाला है, दूसरा डीलिमिटेशन वाला है। दोनों बिल सरकार किसी तरह से पास कराना चाहती है। लेकिन इस डेडलॉक के कारण उस पे कोई काम नहीं हो रहा है। तो सरकार ने अपने कुछ कदम खींचे और चाह रही है कि अब बात आगे बढ़े। विपक्ष जो है वो दोनों बिल पास नहीं होने देना चाहिए। लेकिन विपक्ष उसमें तो एफसीआरए के बारे में तो स्पष्ट तौर पर बोल रही है कि एंटी माइनॉरिटी है। एक अलग नैरेटिव चल रहा है। लेकिन डीलिमिटेशन को लेकर के उसके पास कुछ बहुत सॉलिड लॉजिकल आर्गुमेंट नहीं है। तो वो डीलिमिटेशन को सीधे तौर पर तो नहीं बोल रही लेकिन उसको प्रधानमंत्री पर आक्रमण करके और गृहमंत्री के कंधे पर बंदूक रख के उस पूरे मामले को रोकना चाहती है। अब अभी तो कम से कम टू डाल डालाल में पातपात वाली स्थिति है। आगे क्या होगा क्या नहीं होगा यह अह कोई नहीं जानता है। लेकिन डेडलॉक अभी कम से कम बने रहने की उम्मीद नजर आ रही है।

 

Modi सरकार में फेरबदल दो नेताओं के नाम सामने

 

लंबे समय से यह कहा जा रहा था कि मोदी सरकार में के मंत्रिमंडल में फेरबदल होसकते हैं। कुछ लोग नए आएंगे। कुछ पुराने जो है वह जाएंगे। तीन चार ऑलरेडी संगठन में भेजे जा चुके हैं। चाहे उत्तर प्रदेश के भाजपा अध्यक्ष हो, चाहे दिल्ली भाजपा अध्यक्ष हो, उसके अलावा बिटू हैं। उसके अलावा केरल वाले मंत्री जो हैं थॉमस साहब ये सारे चार पांच लोग ऑलरेडी जा चुके हैं। तो नए लोग चाहिए। अब नए लोग चाहिए तो उसमें बहुत सारे और हैं और दूसरा कि एनडीए का कुनबा भी बढ़ गया है। जैसे शिवसेना के छह एमपी बढ़ गए हैं। एक जो पार्टी नई बनी है नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया जो तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद टूट कर आए हैं। उन्होंने एक पार्टी के अब ये भी एनडीए के साथ हैं। तो ऐसा माना जा रहा है कि इन लोगों को भी रिप्रेजेंटेशन मोदी सरकार में मिल सकता है। अब आम आदमी पार्टी का एक बड़ा धड़ा सात लोगों का वह अह राज्यसभा वाला वह टूट करके भाजपा में विलय हो गया है उसका। तो ये स्थिति है। तो ये चर्चा पहले हो चुकी है कि जो आम आदमी पार्टी से टूट के आए हैं भाजपा के मंत्री के तौर पर राघव चढा का मंत्रिमंडल में को शामिल किया जा सकता जा सकता है। लेकिन इंटरेस्टिंग बात यह है कि जो एनसीपीआई है एनसीपीआई के जो दो का जो दो नाम चर्चा में है उसमें तो एक काकोली घोष दस्तीदार जो पूरे इस पूरे विरोध या इस पूरे ग्रुप को तोड़ के ले आने के लिए जिम्मेदार हैं वो और सयोनी घोष सयोनी घोषकि यंग फेस है बहुत आर्टिकुलेट हैं तो उनको भी मंत्रालय में जगह मिल सकती है। हालांकि वो पहली बार की एमपी हैं। तो दो बड़े यंग चेहरे राघव चढा और घोष दोनों बहुत आर्टिकुलेट हैं। बहुत बढ़िया से बात रखते हैं। और यंग चेहरा हैं। अब असली प्रश्न यह है कि मंत्रिमंडल में फेरबदल कब हो रहे हैं? अब तो निश्चित तौर
पर इस सेशन खत्म होगा उसके बाद ही कुछ चीजें होगा। लेकिन अब जिस तरह से ये कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध प्रदर्शन वहां एक शिक्षा मंत्रालय वाली भी जगह खाली हो गई है। अब एडिशनल चार्ज जो है वो प्रल्हाद पटेल के पास है। लेकिन वो एडिशनल चार्ज कितने दिन रहा जाएगा कि शिक्षा मंत्रालय किसी न किसी एक ऐसे व्यक्ति को दिया जाएगा जो उसको बेहतर ढंग से हैंडल कर पाए। ये बड़ा वो है। तो कुल मिलाकर के ये है कि दो नाम सायली घोष और राघव चड्डा बहुत जोर शोर से मंत्रालय में शामिल होने के लिए चर्चा में है।

 

वंदे मातरम कानून पास क्या करेंगे विरोध करने वाले नेता

सरकार ने संसद में एक कानून पास कर दिया है कि अब वंदे मातरम गाने पर और या वंदे मातरम का अपमान करने पर वैसी ही सजा दी जाएगी जैसी राष्ट्रगान जन गण मन का अपमान करने पर होगी। लेकिन यह एक कानूनी पक्ष हो गया। लेकिन उसका दूसरा पक्ष यह हो गया कि वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर उसको लाल किले से पहली बार इंडिपेंडेंस डे सेलिब्रेशन में गाया जाएगा। अब ये कहने के लिए तो ये वंदे मातरम है। वंदे मातरम एक राष्ट्रगान है। राष्ट्रगान का सम्मान होना चाहिए। लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी हैं और राजनीतिक मायने निश्चित तौर पर हैं। इसलिए कि इसको लेकर के विरोध होता रहा है। जो मुस्लिम कम्युनिटी है वो लगातार वंदे मातरम गाने का विरोध करती रही है। अब क्या वो गाएगी? अगर नहीं गाएगी तो पनिशेबल होगा। उत्तर प्रदेश के एक सांसद थे शफीक उर रहमान बर्ग। वो जब संसद में अह संसद सत्र खत्म होता है तो वंदे मातरम गाया जाता है। और तब तो केवल पहला स्टैंजा गाया जाता था। दूसरा दो स्टैंजा गाए जाते थे। अब जब पूरा गाया जाएगा तो क्या होगा? तो शफीक उर रहमान बर्ग जब कुछ स्टैंजा गाए जाते थे तब उठकर के संसद से चले जाते थे। अब कम्युनिटी का क्या रुख होगा इस मामले में? ये एक मसला है। इसके अलावा इस मामले को लेकर के अब बहुत सारे लोग हैं जो निश्चित तौर पर विरोध प्रदर्शन करेंगे। अपनी बात रखेंगे या पब्लिकली डिसरिस्पेक्ट करेंगे। यह सारी चीजें होंगी। सरकार उन लोगों से कैसे निपटती है फिर मामला कोर्ट में भी जाएगा। तो ये निश्चित तौर पर जो अभी लाल किले पर होने वाला है उसमें कोई समस्या नहीं आएगी। वहां पर जो लोग जाएंगे अगर वो डिग्निटरीज भी होंगे तो वो रेस्पेक्ट करेंगे। लेकिन सामान्य तौर पर इस पर स्थितियां थोड़ी सी वो होंगी। उसको सरकार कैसे हैंडल करती है? कुछ जगहों पर जैसे उत्तर प्रदेश में कोई नहीं कर पाएगा। शायद अब पश्चिम बंगाल में भी नहीं कर पाए और कुछ वो कर पाए। लेकिन उन जगहों पर जहां प्रशासन कमजोर है। बीजेपी का ही प्रशासन कमजोर है। जैसे मध्य प्रदेश में कुछ नहीं हो पाएगा। राजस्थान में कुछ नहीं हो पाएगा। बिहार में हो सकता है कुछ नहीं हो पाए। तो ये ये स्थितियां बनी रही है। अब क्या सरकार इसको हर तरह से डील करने के लिए सख्ती से निपटेगी? ये बड़ा प्रश्न है।