क्या हुआ Tamilnadu का ये कद्दावर नेता नाराज हुआ PM मोदी और चाणक्य से

 

अन्नामलाई जो भारतीय जनता पार्टी के तमिलनाडु के अध्यक्ष थे। उन्होंने अब बीजेपी पर हमला बोला है और बीजेपी की जो सेंट्रलाइज पॉलिटिक्स है जो अभी के दौर में अगर आ देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के इर्दगिर्द घूमती है उस पर हमला बोला है और सीधे ये कहा है कि क्यों बाकी प्रदेश के नेता या पूरा का पूरा नेतृत्व जो है वो कोर कमेटी की बैठक में अमित शाह के घर पर जाए। अमित शाह के घर पर कोर कमेटी की बैठक क्यों हो गई? मतलब यह कि यह जो केंद्रीय नेतृत्व का सेंट्रलाइजेशन है यह इसको डीसेंट्रलाइजेन की जरूरत है और विशेष रूप से उन प्रदेशों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जिस प्रदेश से अन्नामलाई खुद संबंध रखते हैं। मतलब ये कि तमिलनाडु जो भारतीय जनता पार्टी का सेंट्रलाइज्ड लीडरशिप है और तमिलनाडु के लिए भी निर्णय दिल्ली से होता है और ऐसे मसलों पर जो तमिल
इंटरेस्ट के हैं या तमिल लोगों के इंटरेस्ट के हैं। उनके फैसले भी अगर भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व दिल्ली में बैठकर करेगा। ये तमिल लोगों को या बहुत सारे लोगों को ये एक्सेप्ट नहीं हो पा रहा है और यही कारण है कि अन्नामलाई अलग हुए और यही कारण है कि तमिलनाडु जैसे प्रदेश में जहां पर लगभग 87 88% हिंदू हैं वो उस हिंदुत्व आईडियोलॉजी के साथ अपने आप को नहीं जोड़ रहे हैं। अब अन्नामलाई 2 दिन 3 दिन पहले मंदिर जाते हैं। केरल के तमिलनाडु के सारे जगह पर और उसके बाद वो भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व पर हमला करते हैं इससे एक और बात निकल कर के आई है वो ये कि जो लोग यह कह रहे थे कि अन्नामलाई जो है वो उनकी एक साठगांठ है और उस साठगांठ के तहत भारतीय जनता पार्टी से अलग हुए हैं और उसके बाद जो उनकी पूरी की पूरी राजनीतिक लड़ाई और पूरा का पूरा राजनीतिक आगे का कदम है और आगे का राजनीतिक जो कोर्स ऑफ़ एक्शन है वो बीजेपी ही डिसाइड कर रही है और बीजेपी के उससे चलेगा। उससे भी वह अपने आप को अलग करते हुए दिखा रहे हैं जब सीधे तौर पर प्रधानमंत्री और अमित शाह पर हमला बोलते दिख रहे हैं। अब ऐसे तो टीम अनाउंस होने के बाद लोगों का यह मानना है कि इस टीम में अमित शाह की छाप कहीं से नहीं दिख रही। अमित शाह पूरी तरह से इस मामले में नदारतहैं। तो वह भी एक महत्वपूर्ण है और उस पर जब अन्ना मलाई जैसा नेता जो जिसको अमित शाह ही लेकर के आए थे और ऐसा माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री और अमित शाह ही इनको लेकर के आए थे और उन्होंने ये फ्री हैंड दिया था। उसके बाद जब वह सीधे तौर पर अगर प्रधानमंत्री अमित शाह पर हमला करते है नजर आ रहे हैं। इसका मतलब यह कि बहुत कुछ बदलता हुआ नजर आ रहा है।

शहजाद पूनावाला क्या पैसे की कमी बनी इस्तीफे का कारण

 

तेजतर्रार प्रवक्ता भारतीय जनता पार्टी के शहजाद पूनावाला ने डेढ़ महीने में दूसरी बार अपना त्यागपत्र दिया है केंद्रीय नेतृत्व को नितिन नवीन जो अध्यक्ष है उनको कि उनको रिलीव कर दिया जाए। जुलाई में उन्होंने भेजा था त्यागपत्र लेकिन उस पर उनसे पार्टी नेतृत्व में बोला था कि आप जो है वह विचार कीजिए फिर से अपने त्यागपत्र को लेकर के और त्यागपत्र पर विचार कीजिए और संभव हो तो पार्टी में बने रहिए। लेकिन 17 तारीख को पूनावाला ने एक पत्र सोशल मीडिया पर साझा किया और उसमें ना केवल यह बोला कि उनको रिलीव मुक्त किया जाए बल्कि यह भी बताया कि वो क्यों अब पार्टी के उससे अलग हो रहे हैं प्रवक्ता पद से और उन्होंने बताया कि वो कुछ प्राइवेट बिजनेस या कुछ कॉरपोरेट या इस तरह की चीजों में जाना चाह रहे हैं। अह वह कुछ उनके अपन व्यक्तिगत कारण हैं, कुछ फाइनेंसियल अह कारण हैं जिसके कारण उनको जो एक्टिव सक्रिय राजनीति से अलग होना उनकी मजबूरी हो गई है और इसीलिए वो उन्होंने अपना त्यागपत्र दिया है। उन्होंने यह नहीं कह है कि वो पार्टी से अलग हो रहे हैं। इस मतलब वो विचारधारा से अलग हो रहे हैं यार नरेंद्र मोदी के जो काम है, डेवलपमेंट वर्क है, जो उनकी राजनी जो उनकी अह पॉलिसीज़ हैं, उससे अपने आप को अलग कर रहे हैं। वो मानसिक तौर पर जो प्राइम मिनिस्टर का की सोच है उस सोच के साथ बने रहेंगे। लेकिन जो रेगुलर पार्टी की जो डिबेट्स होती है या गतिविधि होती है उन गतिविधियों से अलग कर रहे हैं। और जैसा मैंने बताया कि उन्होंने अपने आप को अपने आप को अलग होने का कारण बता दिया। अब क्यों अचानक जो है वो शहजाद पूनावाला महत्वपूर्ण हो गए हैं। शहजाद पूना वाला महत्वपूर्ण इसलिए हो गए हैं कि वो बहुत जोरदार ढंग से विपक्ष के लोगों को आईना दिखाते थे। प्रमाण के साथ आईना दिखाते थे। इसके कारण बहुत सारे लोगों को मुश्किल का सामना करना पड़ता था डिबेट के दौरान। एग्रेसिव होने के कारण और जो एक भाजपा के खिलाफ एंटी मुस्लिम वाला एजेंडा चलता था। उस एजेंडे को भी रोकने में वो कामयाब हो जाते थे।कि क्योंकि वो खुद मुस्लिम थे, पसमांदा मुस्लिम थे। तो यह एक बड़ा कारण था और इसलिए भाजपा चाहती है कि वह रुकेकि भाजपा पसमांदा नैरेटिव चला रही थी। इसलिए कि इसके अलावा जो दोनों मुस्लिम फेस थे चाहे मुख्तार अब्बास नकवी सिवा है सिया हैं। और सैयद शाहनवाज हुसैन और सैयद हैं। तो दोनों अपर कास्ट थे। तो जो एक आउटरीच होता है वह मुसलमानों के बीच पसमांदा के माध्यम से ज्यादा हो रहा था और इसीलिए ऐसा किया जा रहा था कि उनको रोकने की कोशिश की जा रही थी। अब देखते हैं कि उनका त्यागपत्र मंजूर होता है कि नहीं होता है।

 

UP – योगी के अलावा कोई नहीं

 

उत्तर प्रदेश को लेकर के जो लंबे समय से कयास लगाए जा रहे थे कि उत्तर प्रदेश में क्या होगा? चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं। योगी आदित्यनाथ क्या की क्या भूमिका होगी? तो जो भारतीय जनता पार्टी के बहुत सारे सर्वेज़ या संघ के सर्वेज़ या वो हैं वो यह कह रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी को अगला चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही लड़ना चाहिए और योगी आदित्यनाथ की ही बड़ी भूमिका है। अगर योगी आदित्यनाथ के अलावा किसी और के साथ या न्यूट्रल वाली भूमिका होगी तो उत्तर प्रदेश के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मुश्किल हो सकती है। अब यह सबको मालूम है कि उत्तर प्रदेश में बहुत सारा बवाल चल रहा है। राम मंदिर में चाह जो चंदा चोरी या चढ़ावा चोरी वाला मामला है। उसको जिस तरह से अह मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने हैंडल किया। उसके बाद कम से कम जो चारा चोरी के लिए सरकार को जो लोग जिम्मेदार ठहरा रहे थे या योगी आदित्यनाथ को जिम्मेदार ठहराते थे वो नहीं हो पाया। और दूसरा एक यह कि जिस तरह से प्रशासन को लेकर के वह काम करते हैं या प्रशासन को लेकर के जिस तरह से बहुत एग्रेसिव दिखते हैं वो सारी चीजें नजर आती हैं। डेवलपमेंट में भी वो पीछे नहीं ऐसा नहीं है कि केवल हिंदुत्व का नैरेटिव वो चला रहे हैं। डेवलपमेंट में उत्तर प्रदेश की इकॉनमी पिछले 9 10 साल में जिस तरह से स्काई रॉकेट हुई है वो भी महत्वपूर्ण है। तो अगर आप प्रशासन की बात करें, आप इन्वेस्टमेंट की बात करें, आप डेवलपमेंट की बात करें, आप इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें, आप सुरक्षा की बात करें, आप महिलाओं की सुरक्षा की बात करें, तो ये सारे पैराटर्स पर ड्रास्टिक चेंजेस हुए हैं। और उस ड्रास्टिक चेंजेस के पीछे अगर किसी को सबसे महत्वपूर्ण ढंग से इसके लिए जिम्मेदार माना जाता था वो योगी आदित्यनाथ हैं। और अब अगर तीसरी बार योगी आदित्यनाथ को हटा करके या उनको जिम्मेदारी से मुक्त करके या उनको और कोई जिम्मेदारी दे कर वहां पर किसी और को बिठाया जाता है या किसी और के नेतृत्व में चुनाव होता है तो निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किल होगी और यह लगातार सारी चीजें आप ग्राउंड पर जाइएगा तो यही पल्स निकल कर के आएगी जो सर्वेज़ करा रहे हैं और यही कारण है कि विपक्ष जो है वह बौखलाया हुआ है। विपक्ष किसी भी तरह से इस पूरे मामले को जैसे पिछले चुनाव में हुआ था जब अरविंद केजरीवाल लगातार ये कह रहे थे कि जैसे ही चुनाव होगा वैसे ही योगी आदित्यनाथ को हटा दिया जाएगा तो लेकिन वैसा हुआ नहीं तो कुल मिलाकर के ये एक ऐसी स्थिति है जहां पर बीजेपी के प्रति तो नाराजगी कहीं-कहीं नजर आती है लेकिन योगी आदित्यनाथ पर अभी भी लोग मजबूती के साथ उनके पीछे खड़े हुए नजर आ रहे हैं। इन परिस्थिति में मुझे लगता है या जो सामान्य वह है कि योगी आदित्यनाथ बहुत मजबूती के साथ उत्तर प्रदेश में हैं और उन्हीं के साथ ही उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाएगा और यह सरकार लगातार अपने सरकार और संगठन अपने सर्वेज और बाकी सारी चीजों से जाग चुकी है।