by Ruby Kumari
Pollution का एक और Invisible बढ़ता खतरा
सभी को पता है कि सूरज की झुलसाती तेज गर्मी, खतरनाक पराबैंगनी किरणों से हम धरती की ऊपरी परत में मौजूद ओजोन लेयर के कारण ही बचे हुए हैं, अगर ये ना हो तो गर्मी के कारण धरती का आस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा, लेकिन यही ओजोन जब हमारे आसपास की हवा में बढ़ जाती है, तो यह एक खामोश ज़हर बनकर काम करती है और एक नए अध्ययन ने चेतावनी भी दे दी है कि भारत में बढ़ती हीटवेव अब सिर्फ गर्मी का संकट नहीं रही, बल्कि यह ओजोन प्रदूषण को भी बढ़ा रही है, जिससे दिल और फेफड़ों की बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। आपको बता दें कि वायुमंडल की ऊपरी परत में मौजूद ओजोन पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करती है। लेकिन जमीन के करीब बनने वाली ओजोन एक जहरीली गैस है, जो सांस, फेफड़ों और हृदय पर गंभीर असर डालती है। वैज्ञानिकों के अनुसार ओजोन हवा में सीधे नहीं छोड़ी जाती, बल्कि यह तब बनती है जब नाइट्रोजन ऑक्साइड और फॉर्मल्डिहाइड जैसी गैसें तेज धूप में प्रतिक्रिया करती हैं। लू के दौरान तापमान बहुत अधिक होने से यह प्रक्रिया और तेज हो जाती है। यही कारण है कि गर्म दिनों में ओजोन का स्तर अचानक बढ़ जाता है।
लू चलने से सतही ओजोन प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और बढ़ रही हैं तमाम बीमारियां
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस invisible प्रदूषण के बारे में ज्यादा लोगों को पता ही नहीं चल पा रहा है। वैसे भी हमारे देश में लू या हीटवेव पहले से ही स्वास्थ्य के लिए बहुत गंभीर खतरे पैदा कर रही है। लेकिन नेचर पार्टनर जर्नल क्लीन एयर में प्रकाशित एक नए अध्ययन से पता चलता है कि अब यह स्थिति और भी खतरनाक हो रही है, क्योंकि लू के दौरान सतही ओजोन प्रदूषण तेजी से बढ़ जाता है।अध्ययन में बताया गया है कि नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य गैसें पहले से ही सांस संबंधी बीमारियों से ग्रसित लोगों को ज्यादा नुकसान पहुंचाती हैं, और जब ये ओजोन बनाती हैं, तो असर और भी गंभीर हो जाता है।
NPJ Clean Air में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, हीटवेव के दौरान उत्तर भारत में सतही ओजोन का स्तर 85 से 110 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच जाता है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सुरक्षित सीमा 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारत में 2004 से 2024 के बीच हुए आंकड़ों का विश्लेषण किया। उन्होंने अनुमान लगाया कि कि ओजोन प्रदूषण के प्रभाव से लू वाली गर्मी के दौरान करीब 830 अतिरिक्त मौतें जुड़ी हो सकती हैं। अध्ययन में वैज्ञानिकों ने भारत मौसम विज्ञान विभाग यानी आईएमडी के दो दशकों के तापमान रिकॉर्ड, उपग्रह के आंकड़ों और वैश्विक मौसम मॉडल का उपयोग किया। इसके आधार पर 188 लू की घटनाओं की पहचान की गई।
Heat wave और प्रदूषण को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा जाए और control किया जाए
अध्ययन से यह भी पता चला है कि हाल के वर्षों में अल नीनो के प्रभाव के कारण लू की घटनाएं बढ़ी हैं, खासकर 2010, 2016, 2019 और 2024 में। पश्चिमी हिमालय क्षेत्र में ओजोन प्रदूषण में सबसे तेज बढ़ोतरी देखी गई है, जो कई बार सुरक्षित सीमा से 100 फीसदी से भी अधिक रहा। चिंताजनक बात यह है कि यह प्रदूषण स्तर सिर्फ उत्तर भारत तक सीमित नहीं है। अध्ययन बताता है कि देश के लगभग हर हिस्से में यह सीमा पार हो जाती है। हालांकि लू खत्म होने के तीन से चार दिनों के भीतर ओजोन का स्तर फिर से कम हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि “गर्मी और ओजोन का संयुक्त प्रभाव” तेजी से बढ़ रहा है, और ऐसे में जरूरी है कि इस बढ़ते खतरे को समय रहते पहचाना जाए, प्रदूषण और गर्मी को अलग-अलग देखने के बजाय एक साथ देखा जाए, बेहतर स्वास्थ्य नीतियां बनाई जाए जिससे हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।
