क्या योगी के सामने डिंपल यादव को खड़ा करने की कवायद हो रही 

जिस तरह से समाजवादी पार्टी लगातार डिंपल यादव को ना केवल प्रोजेक्ट कर रही है बल्कि डिंपल यादव खुद भी एक्टिवली बहुत सारी गतिविधियों में पार्टिसिपेट कर रही हैं। उसके बाद ऐसा लगता है कि समाजवादी पार्टी की योजना डिंपल यादव को लेकर के कुछ बड़ी है। विशेष रूप से  जब यह लग रहा है कि एक नया वर्ग या एक नई तरह की पॉलिटिक्स प्रदेश में हो रही है। उन परिस्थितियों में डिंपल यादवकी भूमिका बड़ी हो सकती है। अब ये मामला ऐसा नहीं है कि अचानक शुरू हुआ। डिंपल यादव एक कार्यक्रम में जो पार्लियामेंट के सामने वाली मस्जिद है वहां भी गई थी और एक आउटरीच कार्यक्रम के तहत उसके अलावा जिस तरह से मकरद द्वार पर वह खड़ी होती हैं और मीडिया से इंटरेक्ट करती हैं और उनकी बात या उनके स्टेटमेंट वायरल होते हैं। उसके बाद जिस तरह से वो सीजेपी के कार्यक्रम में पहुंची थी और सीजेपी के कार्यक्रम में यह बात निकल कर के आई थी कि वो कितनी सहजता से धर्मेंद्र यादव तक पहुंची थी और इस बात के बाद से ही पूरा का पूरा विपक्ष जो है वह एकजुट होकर के सीजेपी वाले आंदोलन को सपोर्ट किया था और इसीलिए उसको इतना ट्रैक्शन मिला था और लोग इकट्ठा हुए थे। लोग इकट्ठा हुए थे और उसके बाद वह आंदोलन बड़ा हो गया था। अब उसके बाद एक और एक के बाद एक और घटना हो रही है। इन सबके पीछे कहीं समाजवादी पार्टी की मंशा और तो नहीं कुछ इसलिए कि सीजेपी के नेताओं से रांका जो हैं आशुतोष रांका उनसे अखिलेश यादव की मुलाकात हुई थी। तो यूथ को इकट्ठा करने की जो योजना है कहीं ऐसा तो नहीं कि महिला यूथ और उसके बाद योगी आदित्यनाथ को टारगेट करने के लिए इसलिए कि डिंपल का भी बैकग्राउंड पहाड़ का ही है। वो डिंपल रावत अब डिंपल तो कहीं यह एक योजना तो नहीं बन रही है जहां पर डिंपल यादव को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट किया जाए और 2027 का विधानसभा का चुनाव उसी योजना के तहत लड़ा जाए और ये निश्चित तौर पर ना केवल भारतीय जनता पार्टी के लिए बल्कि एक बड़ी चुनौती के के रूप में वो होगा और इसका फायदा कितना होगा यह नहीं कहा जा सकता लेकिन अभी बहुत मजबूती के साथ योगी आदित्यनाथ अपनी पकड़ बनाए हुए हैं।

Rahul  Gandhi को pm project करने का  Congress सपना क्या होगा पूरा 

के सी वेणुगोपाल ने एक प्रश्न के जवाब में यह बोला कि 2029 का जो लोकसभा का चुनाव होगा। उसमें आईएडीएआईए काजो गठबंधन है उसके प्रधानमंत्री पद के दावेदार जो हैं वो राहुल गांधी होंगे। अब ये हालांकि उन्होंने इस बात के जवाब में दिया था कि जो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री हैं उनको भी लोग 2029 के प्रधानमंत्री पद के दावेदार के लिए लगातार आगे कर रहे हैं। तो इन परिस्थितियों में यह नाम आया। लेकिन क्या यह नाम वेणु गोपाल ने जो आईएडीआई के बाकीअलायंस हैं उनसे बात की करके किया है? समाजवादी पार्टी से इस बारे में क्या चर्चा हुई है?  उसके अलावा नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के लोगों से या शिवसेना से या डीएमके तो अब इनका हिस्सा नहीं रहा है। तृणमूल कांग्रेस से या जो भी या लेफ्ट से तो हालांकि लेफ्ट इस बात पर सहमत हो जाएगा। तो यह जो पूरा का पूरा पूरी कीपूरी योजना है क्या उस योजना पर कोई पहले से कोई चर्चा हुई या हमेशा से जैसा होता रहा है अनाउंसमेंट कर दिया गया है और उसके बाद इस पर मंथन होगा चर्चा होगी लेकिन इस मामले में बहुत सारे लोगों को सहमति है। आम आदमी पार्टी है। आम आदमी पार्टी राहुल गांधी का नेतृत्व मानने के लिए नहीं तैयार है वो तो पहले भी नहीं मानने के लिए तैयार है। तो अब आम आदमी पार्टी कम से कम पहले दो प्रदेशों में थी। अब ये कम से कम एक प्रदेशों में सरकार में तो है ही है। भाई तीन प्रदेशों में कांग्रेस है तो एक प्रदेश में आम आदमी पार्टी है। समाजवादी पार्टी दूसरे नंबर पर सबसे बड़ी पार्टी है लोकसभा में। तीसरे नंबर पर कांग्रेस के बाद तो क्या इन परिस्थितियों में ऐसी स्थिति बनेगी जहां पर कोई ऐसी बात निकल कर के आए जहां पर राहुल गांधी के नाम पर कंसेंसस हो जाए। संभावनाएं बहुत कम है। राहुल गांधी या कांग्रेस कांग्रेस का नेतृत्व 2024 के चुनाव के बाद से ही यह राग अलापना शुरू कर दिया है कि अगला प्रधानमंत्री या अगले इंडिया का 2000 जो 29 का प्रधानमंत्री है वह राहुल गांधी है। अब इस पर जो भी आगे की चर्चा हो, जो बात हो, जो सहमति बने वो अलग बात है। लेकिन अभी बिना सहमति के ये दिया गया स्टेटमेंट है। इसके क्या रिपरकशंस होंगे ये उनको देखना पड़ेगा।

Credibility Crisis से जूझ रही CJP 

जो कॉकरोच जनता पार्टी है जब से उसको इस बात पर सफलता मिली कि उसके आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ गया था। उसके बाद से वो थोड़ा उसका कॉन्फिडेंस बढ़ा हुआ है और कभी वो एफआईआर कराने के लिए धरना दे देती है। कभी वो किसी कॉलेज में पहुंच जाती है। स्कूल में पहुंच जाती है वहां की व्यवस्था देखने के लिए और उसी उत्साह में कुछ ट्वीट्स भी वो कर रही है। ट्वीट्स से जो बात निकल कर के आ रही है वो यह कि ज्यादातर बिना जांचे परखे और एआई वाले ट्वीट्स हैं। अब वो एआई वाले ट्वीट्स पर जो है वो पकड़े जा रहे हैं। अभी जैसे जो बात हुई थी राम जन्मभूमि वाले मामले में उसमें भी सौरभ दास ने ट्वीट किया था वो गलत था। उसके बाद अभिजीत दीपके ने अभी तुरंत एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने गौरव भाटिया के नाम पर चल रहे एक फर्जी बयान को शेयर किया था।  जिसके बाद  वह गलत साबित हुआ। सौरभ पहले सौरव दास ने किया था। बाद में गौरव अह बाद में अह अभिजीत दीपके ने किया था। अब ये दोनों वायरल कंटेंट जो है फर्जी निकले। अब लेकिन इसमें दिक्कत ये है कि ये लोग गलती करते हैं और उसके बाद पूरी बेशर्मी के साथ उस पर टिके रहते हैं। चाहे वो एआई जनरेटेड फेक हो। अब बहुत सारा बहुत सारा इनका जो आईडिया है या बहुत सारी इनकी जो जो बातें ये कह रहे हैं वो फेक बातों पर ही निकल कर के आ रही है। अब उस फेक को ये कितने दिन तक चला पाएंगे, कितने दिन तक आगे ले जा पाएंगे ये तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन जिस तरह से एक के बाद एक इनकी बातें गलत साबित हो रही हैं। उससे क्रेडिबिलिटी क्राइसिस तो है ही। क्रेडिबिलिटी क्राइसिस इनको पहले से ही थी। जब ये जंतरमंतर पर तो प्रोटेस्ट कर रहे थे लेकिन झारखंड नहीं पहुंच पाए। ये कर्नाटक नहीं पहुंच पाए। ये और किसी प्रदेश नहीं पहुंच पाए। तो वो एक इनका जो एटीट्यूड या बदला हुआ वो था वो मतलब एक तरफ़ा दृष्टिकोण था वो तो था ही। उसके कारण लेकिन अब ये जो झूठ फैला रहे हैं ये भी एक इसका एक नेगेटिव प्रभाव भी है जो इनके आगे के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है।

मायावती इस बार चुनाव में आर या पार 

2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं उत्तर प्रदेश में और चार बार की मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती के लिए। यह चुनाव कितना जरूरी है और क्या वह इस बार मजबूती से चुनाव लड़ पाएंगे? इसलिए कि पिछले कई चुनाव से बहुजन समाज पार्टी जो है वो लगातार अपना ना केवल आधार खो रही है बल्कि उनके बहुत सारे समर्थक इधर-उधर छिटकना शुरू कर दिए हैं। उनमें से बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी के साथ भी पहुंच गए हैं। अब मसला ये है कि मायावती अब राजनीतिक दृष्टि से तो अभी उनके पास काफी समय है। लेकिन वो धीरे-धीरे सक्सेशन की तरफ जा रही थी और अपने भतीजे आकाश को वो आगे करना चाह रही थी। लेकिन आकाश जो है वो आकाश और ईशान दोनों को। लेकिन आकाश और ईशान जो है वो जो उनकी अपेक्षाएं हैं उस उन अपेक्षाओं पर खरेनहीं उतर रहे थे। खरे नहीं उतर रहे हैं तो वह लगातार उसमें बदलाव करती रहती हैं। अब उन बदलावों से क्या राजनीतिक उसके परिणाम होंगे? राजनीति कैसे निकल कर के आएगी? यह एक बड़ा विषय है। लेकिन तब जब समाजवादी पार्टी कांग्रेस बहुत एग्रेसिवली अपनी राजनीति कर रही हैं। भारतीय जनता पार्टी हमेशा से अग्रेसिव रही है। उनपरिस्थिति में क्या दलित वोट के अलावा जो लगभग 21-22% है उत्तर प्रदेश में दलित वोट के अलावा इसलिए कि केवल 21-22% वोट चुनाव जिताने के लिए काफी नहीं है। तो कौन सा ऐसा सेगमेंट है ओबीसी उनके साथ आएगा नहीं ब्राह्मण को लेकर के थोड़ा सा कंफ्यूजन है लेकिन ब्राह्मण अल्टीमेटली ही हराने के लिए हारने हराने के लिए वोट नहीं करेंगे भारतीय जनता पार्टी को इन परिस्थितियों में क्या ऐसी स्थिति बन रही है जहां पर बहुजन समाज पार्टी कुछ करती हुई दिख रही है या एक और चुनाव की हार उनको सामने नजर आ रही हालांकि समाजवाद बीएसपी के नेता सक्रिय हुई हैं और सहारनपुर वाले मामले पर उन्होंने स्टेटमेंट भी दिया कि मस्जिद काडिमोलिशन नहीं होना चाहिए तो शायद मुसलमान उनके साथ आए। अब मुसलमान के लिए इस समय उत्तर प्रदेश में बहुत सारा बहुत सारे लोग हैं। कांग्रेस है ही है। समाजवादी पार्टीहै ही है। एमआईएम भी आ गया है और बहुजन समाज पार्टी। अब इसमें कहां जो है वो जाकर के मुसलमान टिकेगा या किसको वोट करेगा? कहां से राजनीति आगे जाएगी उनकी या अल्टीमेटली जो जीतने वाला कैंडिडेट होगा मुसलमान और जो भाजपा को हराने वाला कैंडिडेट होगा अल्टीमेटली समाजवादी मुसलमान उसी को वोट करेगा। ये वोटिंग पैटर्न है। लेकिन चौराहे पर नजर आ रही ऐसे चौराहे पर नजर आ रही है जहां मंजिल को लेकर के बड़ा कंफ्यूजन है बहुजन समाज पार्टी में।