UP — बीजेपी से बनाना चाहते हैं दूरी पर क्या करें बड़ी है मजबूरी

यूपी में तीन बड़े राजनीतिक दल हैं वो अब ब्राह्मणों को लुभाने पर लगे हुए हैं। समाजवादी पार्टी इस तैयारी में है। जनेश्वर मिश्रा जयंती मनाने की। इस बहाने वह ब्राह्मणों को साधने की तैयारी है क्योंकि चुनाव 2027 में है। दूसरी तरफ बहन कुमारी मायावती भी उसी प्रयास में लगी हुई हैं कि किसी तरह से ब्राह्मण वोट उनकी तरफ आ जाए तो 2027 का चुनाव उनके लिए आसान हो जाएगा। इन सब के बीच जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी में ब्राह्मणों के साथ व्यवहार हो रहा है। उसके बाद क्या ब्राह्मण भारतीय जनता पार्टी के साथ रहेंगे या उनकी मजबूरी है कि वह समाजवादी पार्टी के साथ नहीं जा सकते हैं। मुसलमानों के कारण बहन मायावती के साथ नहीं जा सकते हैं या किसी और राजनीतिक दल के साथ नहीं जा सकते हैं। कांग्रेस की कोई हैसियत नहीं बची हुई है। तो इन सब परिस्थितियों में ब्राह्मणों की मजबूरी होगी कि वह भारतीय जनता पार्टी के साथ रहे और भारतीय जनता पार्टी कोशिश कर रही है कि किसी तरह से उनको अपने साथ रोक कर रखे। लेकिन सबको पता है कि यूपी में ब्राह्मणों का ज्यादातर जो भाजपा के साथ जुड़ाव था वो राम मंदिर के कारण था। राम मंदिर का मामला एक तो पूरा हो गया है। राम मंदिर बन करके खड़ा हो गया है। लेकिन राम मंदिर के बन जाने के बाद जिस तरह से चंदा चोरी की बात निकल कर के आ रही है। उसके कारण एक बड़े वर्ग में ब्राह्मणों के बड़े वर्ग में नाराजगी है इस बात को लेकर के कि चंदा चोरी का मामला है उस चोरी को सही ढंग से हैंडल करना चाहिए , दोषियों को सजा मिलनी चाहिए वगैरह । यह होना अपने आप में एक दुखद और बहुत नाराज करने वाली बात है। इसलिए कि राम मंदिर को लेकर के ना केवल ब्राह्मण बल्कि पूरा का पूरा हिंदू समुदाय एक हुआ था और उन्होंने मिलकर के जिसके पास कुछ नहीं था उसने भी राम मंदिर के लिए दान किया और उस पैसे का गमन घपला घोटाला ये किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं है। तो इन सब के बीच जिस तरह से सारे के सारे राजनीतिक दल कोशिश में लगे हुए हैं कि किसी भी तरह से ब्राह्मणों को जो उत्तर प्रदेश में लगभग 12% के आसपास हैं सेंट्रल या अवध वाला क्षेत्र है वहां लगभग 15% है। ज्यादा कंसंट्रेशन है। अगर भूमिहार को भी जोड़ दिया जाए तो ये जनसंख्या लगभग 14% के आसपास या 14% से ऊपर हो जाती है। तो उस दृष्टि से ब्राह्मणों का मतदार ब्राह्मणों का मत प्रतिशत और ब्राह्मणों का वोट उत्तर प्रदेश में महत्वपूर्ण है। अब देखते हैं कि 2027 तक कहां किस करवट ऊट बैठता है।

Congress के कद्दावर नेता बदलाव बहुत जरूरी -देर से समझे

हाल फिलहाल में कांग्रेस के महासचिव केसी वेणुगोपाल जो संगठन महासचिव हैं, उन्होंने अपनी स्ट्रेटजी में थोड़ा बदलाव किया है, क्या बदलाव किया है, वह बाद में समझेंगे। पहले यह समझेंगे कि उन क्या कमियां थी जिसमें बदलाव की जरूरत थी। सबसे बड़ी बात यह थी कि वह दक्षिण भारत से आते हैं, केरल से आते हैं। और भाषा एक बड़ी बात होती है किसी भी दल मे राजनीति में सफल होने की अब क्योंकि उत्तर प्रदेश या पूरे हिंदी बेल्ट में कांग्रेस की हालत बहुत खराब है। कांग्रेस का कोई भी व्यक्ति कोई भी चुनाव जीतता हुआ नहीं दिख रहा है। कांग्रेस कहीं सरकार बनाती हुई नहीं दिख रही है। अगर हिमाचल प्रदेश को छोड़ दिया जाए तो उन परिस्थिति में संगठन महामंत्री की बड़ी भूमिका होती है और संगठन महामंत्री पर ह सारा दोष आ रहा है। चाहे वह हरियाणा में तीसरी बार हार का प्रश्न हो, चाहे वह अहम महाराष्ट्र में हार की बात हो, या बिहार में हार की बात हो या पश्चिम बंगाल में कुछ ना कर पाने की बात हो। लेकिन इन सब के पीछे दोष तो केसी वेणुगोपाल को दिया जा रहा था। लेकिन वो दोष में क्या दिक्कत थी? पहली बात जो ये थी कि वो उनको उत्तर भारत की राजनीति की समझ नहीं है। एक बात उत्तर भारत की राजनीति की समझ ना होने के कारण क्या कहां कैसे होना चाहिए इसकी जानकारी उनको नहीं है। दूसरा ये कि भाषा क्योंकि उनको हिंदी में फ्लुएंट नहीं है। ऐसा नहीं है। बहुत सारे राजनेता हिंदी में फ्लुएंट नहीं होते हैं। लेकिन वो जिस तरह से भी है कम्युनिकेट करते हैं और अपनी बात रख पाते हैं। दूसरी बात यह हो गई। तीसरी बात , केसी वेणुगोपाल के साथ कि वह
बहुत ज़्यादा मिलनसार नहीं थे। उनके ना केवल पार्टी कार्यकर्ताओं के बल्कि बड़े नेताओं को भी उनके घर का या उनके उनका एक्सेस नहीं मिलता था। तो जनता की तो बात ही छोड़ दीजिए। इन सब में केसी वेणुगोपाल ने परिवर्तन किया है। अब वह ना केवल लोगों से मिल रहे हैं। उन जगहों पर भी विजिट कर रहे हैं जहां पर पार्टी कमजोर है और पार्टी को रिवाइव करने की कोशिश की। अगर संगठनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो केसी वेणुगोपाल तीसरे सबसे बड़े कद्दावर नेता हैं। पार्टी के संगठनात्मक दृष्टि से तो लेकिन वो कुछ कर नहीं पाए पार्टी के लिए। यह एक बड़ा चैलेंज उनके सामने है और इस चैलेंज को निपटने का एकमात्र तरीका यही है कि वह अब लोगों से मिले, उनकी बात सुने और कम्युनिकेशन को बेहतर करें और जो उन्होंने करना शुरू कर दिया है।