राहुल गांधी फिर विदेश दौरे पर क्या फिर फोड़ेंगे कोई खबरी बम
मानसून सेशन से पहले राहुल गांधी यूरोप की अपनी अनडिसक्लोज्ड यात्रा पर गए थे और वहां से लौटने के बाद जिस तरह से पूरा का पूरा मानसून सेशन वाश आउट हुआ उसके बाद अभी जब उनकी नवंबर में अमेरिकी यात्रा प्लान है नवंबर 16 से नवंबर 19 तो इस पर खूब हो हल्ला मचना शुरू हो गया है कि एक एक बार फिर राहुल गांधी बाहर जाएंगे और यहां पर आकर के रायता फैलाएंगे। अब उनकी वापसी मानसून विंटर सेशन के ठीक पहले होनी है। विंटर सेशन उनकी वापसी के बाद होगा और जिस तरह के विषय चल रहे हैं उसमें मान विंटर सेशन का बहुत शांति से गुजर जाना या सब कुछ ठीक से हो जाना संभव दिखता नहीं है। तब जब लगातार सरकार की ये कोशिश है कि किसी तरह से वुमेन रिजर्वेशन बिल को पुश किया जाए। अब इसके अलावा जो पूरा का पूरा मामला है वह यह भी है कि पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनाव में भी होने उत्तर प्रदेश जिसमें है उत्तराखंड है, पंजाब है, गोवा है और मणिपुर है। तो ये पांच प्रदेशों में चुनाव भी होने हैं। इन सबके मद्देनजर भी राहुल गांधी की यात्रा और उस वापसी और वापसी पे आने के बाद जो उनकी गतिविधियां हैं वो सबके ध्यान में रहेंगी या सबका सब सबकी निगाह उसी पर रहेगी। इसके पहले यूरोप से जब अपनी यात्रा पर लौट के आए थे तो पूरा का पूरा वोट चोरी और ये सेशन उसमें चला गया। अभी राहुल गांधी ने मॉक पार्लियामेंट आयोजित किया। उसके बाद लगातार वोट चोरी को लेकर के वो बहुत सक्रिय हैं और बहुत चल रहे हैं। अब कई कई बार होता है वहां से लौट के आ के कोई वो धमाका करते हैं और उसके बाद पूरा का पूरा संसद सत्र वाश आउट होता है। तो क्या वो किसी और धमाके के लिए जा रहे हैं। हालांकि इसको भारतीय जनता पार्टी यह कहती है कि वह वहां से जाकर के अपने मास्टर से मतलब जो उनके जो उनको वहां पर कुछ लोग हैं ऐसा भाजपा का है कि वहां के लोगों से वो इंस्ट्रक्शंस लेते हैं जो उनका पूरा रिसर्च टीम वहां पर काम करती है और उस इंस्ट्रक्शंस के हिसाब से उसको भाजपा भारत में इंप्लीमेंट करते हैं। अब यह राजनीतिक बहसबाजी है। इसमें भाजपा और कांग्रेस बहसबाजी करेंगे। लेकिन चुनाव से पहले, सेशन से पहले नेता प्रतिपक्ष का किसी अनडिस्क्लोज्ड लोकेशन पर जाना शंका तो जरूर पैदा करता है।
उमर अब्दुल्लाह सरकार पर संकट नजर आ रहा है क्या
नेशनल कांफ्रेंस में लगातार बगावत जैसा माहौल है। विशेष रूप से तब से जब से एक्सपेंशन हुआ है अभी हाल फिलहाल उसके बाद से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह और यहां तक कि जो पूर्व मुख्यमंत्री हैं फारूक अब्दुल्ला जो राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर काम करते हैं या पैट्रन के तौर पर काम करते हैं। उसको लेकर उनको लेकर के लगातार विरोध प्रदर्शन मतलब विरोध दर्ज कराया जा रहा है। अब इन सब विरोध के बीच जो एमएलए थे उनकी बात तो ठीक है कि भाई जिसको मंत्रालय में जगह नहीं मिली वो नाराज है तो वो अपनी शिकायत दर्ज करेगा। लेकिन इन सबके बीच जो है श्रीनगर के जो सांसद हैं आगा सैयद रहमतुल्लाह मेहंदी उन्होंने त्यागपत्र दे दिया ना केवल पार्टी से बल्कि पार्टी के की लोकसभा सीट से जिसको वो रिप्रेजेंट करते थे और उन्होंने सीधे तौर पर उमर अब्दुल्लाह और फारूक अब्दुल्ला को जनता के साथ धोखा करने का आरोप लगाया। लेकिन इस सब के बीच पूरे के पूरे मामले में राम माधव जो भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष हैं उनकी भी एंट्री होती है, जब राम माधव ये कहते हैं कि अब श्रीनगर में जब उपचुनाव होंगे तो उसमें रहमतुल्लाह जो हैं उन पर भारतीय जनता पार्टी की ब्लेसिंग होगी। अब इसमें एक बात महत्वपूर्ण है समझ लीजिए कि राम माधव जो है वो जम्मू कश्मीर में पहले भी काम कर चुके हैं और जो मुफ्ती साहब मुफ्ती की महबूबा मुफ्ती की पार्टी के साथ अलायंस हुआ था। उस अलायंस में राम माधव की बड़ी भूमिका थी। तो क्या यह जो आगा साहब का त्यागपत्र हुआ है इसमें भारतीय जनता पार्टी की बड़ी भूमिका है और अगर भारतीय जनता पार्टी की भूमिका है तो क्या भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर सक्रिय होकर जम्मू कश्मीर में काम कर रही है और वहां पर कुछ बड़े और बदलाव की संभावनाएं दिख रही है। इसलिए कि अगर ऐसा होता है और एक सांसद जो है वह त्यागपत्र देता है तो और ऐसा कहा जा मतलब इस तरह की खबरें आ रही हैं। हमने खुद वीडियो किया है कि लगभग 15 एमएलए जो हैं वो नाराज हैं और वो किसी भी समय त्यागपत्र दे सकते हैं। इसका मतलब यह किस इस बात की खबर कभी भी आ सकती है कि जम्मू कश्मीर की सरकार गिर गई। अगर 15 लोग यह अलग हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर उनके लिए संकट का विषय हो जाएगा। अब इसमें एक और बात है कि अगर 15 लोग अलग हो जाते हैं या 1/3 दो तिहाई इस तरह की सिचुएशन बन जाती है तो क्या वहां भाजपा की कोई संभावना नजर आ रही है? ये सारे कयास हैं। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि उमर अब्दुल्लाह पर संकट नजर आ रहा है।
अखिलेश यादव क्या अंधविश्वास पर यकीन करने लगे
अखिलेश यादव ने यह घोषणा की है कि वो विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे। फरवरी मार्च में होने की संभावना है 2027 में। वो यह घोषणा उन्होंने चुनाव के समय में 2024 के लोकसभा चुनाव में की थी। अब फौरी तौर पर उनका यह दावा है कि वो चुनाव लड़वाएंगे और क्योंकि उनको बहुत सारे कैंडिडेट डिसाइड करने होंगे। उसके अलावा प्रचार करना होगा तो उनकी व्यस्तता होगी और अगर वो अपने कांस्टीट्यूएंसी में फोकस करेंगे तो बाकी सारी कांस्टीट्यूएंसी नेगलेक्ट होंगी। तो इन सबके मद्देनजर वो चुनाव जो है नहीं लड़ेंगे। लेकिन मसला कुछ और है। मसला अंधविश्वास पर ज्यादा लगता है। पहली बार जब अखिलेश मुख्यमंत्री बने थे तो अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने में या उनके मुख्यमंत्री बनने में वो चुनाव नहीं लड़े थे और उन पर उनको जो है उनके पिता ने भारत मतलब उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी थी और इस बात को लेकर के नाराजगी थी शिवपाल रामगोपाल आजम खान और इस तरह के और बहुत सारे नेताओं ने यह महसूस किया था कि उनको नेगलेक्ट किया गया है ना केवल वरिष्ठता के दृष्टि से बल्कि जो है वरिष्ठता के अलावा अन्य दृष्टि से भी अनुभव राजनीतिक उस सबसे अब क्या है ऐसा वही बात है कि चुनाव लड़ने के बाद चाहे लोकसभा का चुनाव लड़े चाहे विधानसभा का चुनाव लड़े अखिलेश हारते हैं तो उस हार से बचने के लिए वो इस तरह की टोटका करते हुए नजर आ रहे हैं। जहां पर ऐसा लगेगा कि वो चुनाव जीतेंगे अगर वो चुनाव नहीं लड़ते हैं और चुनाव लड़ाते हैं।
