बीजेपी जीत के भी हार गई लगती है
उत्तर प्रदेश जहां 2027 में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, वहां अभी जो MLC का चुनाव के परिणाम आए हैं, जिसमें भारतीय जनता पार्टी को छह सीटें मिली हैं और समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिली है। कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिल पाई है और जिस तरह के परिणाम आए हैं उसके बाद समाजवादी पार्टी अब बहुत उत्साहित होने का और बहुत मजबूत होने का दावा कर रही है। भारतीय जनता पार्टी को लोग इस बात को लेकर के उनकी खिंचाई कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री के अपने चुनाव क्षेत्र से दोनों एमएलसी के की सीट्स टीचर्स वाली भी और ग्रेजुएट वाली भी। दोनों सीटें वह हार गई हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने अह चुटकी ली थी कि कांग्रेस को इसमें कुछ नहीं मिला है। लेकिन इस पूरे जो चुनाव है इसके इसको अगर आप 2027 के विधानसभा चुनाव के दृष्टि से देखें तो इसके मायने क्या है? यह महत्वपूर्ण है। लेकिन अगर भारतीय जनता पार्टी बहुत निराश है तो वो भी बहुत ठीक नहीं है। और अगर समाजवादी पार्टी बहुत खुश है तो वो भी बहुत ठीक बात नहीं है। वैसे जिन भी परिस्थिति में जैसा भी चुनाव हुआ है चुनाव तो हुआ है और उस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने बेहतर किया है। यह अलग बात है कि अगर मेजॉरिटी की दृष्टि से देखें तो भारतीय जनता पार्टी मेजॉरिटी सीट जीत करके आई है। 11 में से छह तो वो सिंपल मेजॉरिटी उस दृष्टि से भी देखे तो मतलब ये कि बीजेपी कमजोर तो हुई है लेकिन ऐसी नहीं हुई है कि उसको बाहर का रास्ता देखना पड़ सकता है। लेकिन दोनों के लिए सीख भी है। अगर इससे कॉम्प्लसेंसी आएगी जो समाजवादी पार्टी में संभावित है और बीजेपी इसको सबक की तरह से ले सकती है।
यहां इतना बड़ी बात पर पूरा विपक्ष खामोश
अगर भारतीय जनता पार्टी ने किया होता तब तक हंगामा हो रहा होता। लेकिनकि मुस्लिम पॉलिटिकल पार्टी या मुस्लिम डोमिनेटेड पॉलिटिकल पार्टी ने किया है इसलिए चुप है। उमर अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अभी रिशफल किया। चार नए मंत्रियों को शामिल किया और कुछ लोग गए। उसमें उन्होंने इंडिपेंडेंट एमएलए सतीश शर्मा को ड्रॉप कर दिया। अब जो सतीश शर्मा साहब ड्रॉप हुए हैं उसको और उसके बाद एकमात्र जो मिनिस्टर उमर अब्दुल्लाह की सरकार में रह गया है हिंदू एकमात्र वो है सुरेंद्र चौधरी सुरेंद्र कुमार चौधरी अब इंडिपेंडेंट सतीश शर्मा थे उनको ड्रॉप कर दिया है अब इन सबके बीच भारतीय जनता पार्टी तो हमलावर होगी लेकिन सामान्य तौर पर भारतीय जनता पार्टी से पूछा जाता है कि कितने माइनॉरिटी रिप्रेजेंटेशन है। हालांकि भारतीय जनता पार्टी ये कहती है कि उसके माइनॉरिटी में सिख हैं, उसके माइनॉरिटी मिनिस्ट्री में जैन है, बुद्धिस्ट हैं, क्रिश्चियंस हैं। ये सब हैं। मुस्लिम को लेकर के बात होती है कि मुस्लिम एमपी कोई नहीं है। हालांकि प्रदेशों में कई जगह पर मुस्लिम एमपी हैं उनके। लेकिन केंद्र में नहीं है निश्चित तौर पर। अब सिमिलर प्रश्न क्या उस राजनीतिक दल से पूछा नहीं जाना चाहिए जो तथाकथित सेुलर पॉलिटिक्स को रिप्रेजेंट करने की बात करते हैं। अब सबको मालूम है कि नेशनल कांफ्रेंस जो है वो मुस्लिम कांफ्रेंस हुआ करती थी जब इसको लांच किया गया था। इसके जो संस्थापक थे उमर अब्दुल्लाह के ग्रैंड फादर। तो उसके बाद 1939 में इसका नाम बदल करके नेशनल कॉन्फ्रेंस कर दिया गया। लेकिन अब इनकी आलोचना यही हो रही कि यह मुस्लिम कॉन्फ्रेंस 2.0 है और वहां पर मुस्लिमों को ही रिप्रेजेंटेशन मिलता है। उससे महत्वपूर्ण बात ये है कि जो हमेशा से जो वहां की वैली की पॉलिटिकल पार्टीज हैं या जो मुस्लिम डोमिनेटेड पॉलिटिकल पार्टीज हैं चाहे नेशनल कॉन्फ्रेंस हो चाहे पीडीपी हो चाहे और कोई राजनीतिक दल वो जम्मू को लगातार निगलेक्ट करती आ रही हैं और एक बार फिर जम्मू को नेगलेक्ट किया जा रहा है। फिर जब केंद्र सरकार की तरफ से इंटरवीन किया जाएगा या कोई इस तरह की चीज होगी तो फिर वहां पर सुगबुगाहट शुरू हो जाती है। विरोध और अन्याय होता है। ये सब चीजें तो जम्मू कश्मीर में अभी जो उमर अब्दुल्लाह की सरकार ने किया वो अपने ग्रैंडफादर की जो लिगेसी है उसी को आगे बढ़ाते हुए नजर आ रही हैं।
क्या मायावती BJP को फायदा पहुंचाने वाली रणनीति बनाती हैं
यूपी में बहुजन समाज पार्टी ने इन MLC चुनाव में शिरकत नहीं की। अभी वह अपना जो बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख हैं मायावती जी वह अपना अभी हाउस जो है जो जिसको बोलिए कि जो उनका घर का मामला है या पार्टी का मामला है उसको दुरुस्त करने में लगी हुई हैं। कभी आकाश आनंद को आगे करती हैं, कभी किसी और को आगे करती हैं। फाइनली अभी जो आकाश आनंद है उनको उन्होंने आगे किया हुआ है और उन्हीं के साथ पार्टी चुनाव में लड़ने जा रही है। आगे बढ़ेगी लेकिन ये जो मायावती का फ्लिप फ्लॉप है इसके कारण जो है पार्टी को तो नुकसान हो रहा है। पार्टी को नुकसान होने के कारण बहुत सारे ऐसे नेता जो मायावती जी के साथ थे, वह धीरे-धीरे अपना दूसरा ठिकाना तलाश रहे हैं। अभी बसपा के एक नेता ने समाजवादी पार्टी जॉइन किया। और कुछ लोग भाजपा में भी आएंगे। उसके अलावा जो मतदाता हैं, वह भी अपना ठिकाना बदलेंगे। मतदाताओं को जो ठीक लगेगा कि ये राजनीतिक दल है जो हमारे बारे में सोच सकता है। इसलिए कि अगर आप पिछले तीन-चार चुनाव को देख लें तो मायावती का वोट परसेंट जो लगभग 22% के आसपास टिका हुआ था वो घट करके 10 11% के आसपास हो गया। और 10 11% के वोट पर आप सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होते हैं। तो क्या जो ये फ्लिप फ्लॉप है इससे मायावती को नुकसान हो रहा है? निश्चित तौर पर नुकसान हो रहा है और उन पर आरोप लगता है कि यह उनकी स्ट्रेटजी जो है उनको जो राजनीतिक तौर पर अचीव करना था जो उनको उपलब्धि हासिल करनी थी उन्होंने हासिल कर ली है। लेकिन ये राजनीतिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचाने की एक योजना है और मायावती उसी योजना पर काम करती है। अब उन पर आरोप और बहुत सारे लगते हैं। अगर आप राजनीतिक तौर पर देखें तो ये निश्चित तौर पर हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में जो दलित मतदाता है वो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के साथ चला गया था। वो एक नारा दिया गया था कि संविधान बदल रहा है आरक्षण खत्म हो रहा है इसके कारण। लेकिन प्राकृतिक तौर पर जो दलित मतदाता है वह ओबीसी मतदाता के साथ नहीं जाता है। मतलब वो समाजवादी पार्टी के साथ नहीं जाता है। तो इन चुनाव में अगर मायावती जी अभी से सीरियस नहीं होती हैं तो चुनाव समीकरण बदलेंगे। अब चुनाव समीकरण बदलेंगे और वो किस करवट बैठेंगे यह तो आने वाला समय बताएगा। लेकिन मायावती की निष्क्रियता उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरण को निश्चित तौर पर प्रभावित करेगी।
