अमित शाह के पास क्या सचमुच पहुंची कोई  चिठ्ठी -समाजवादी पार्टी में टूट

 सुहेलदेव भारत समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर ने  दावा किया है कि समाजवादी पार्टी का एक बड़ा दल उसमें लोकसभा के सांसद भी शामिल हैं और राज्यसभा के सांसद भी शामिल हैं। वह भारतीय जनता पार्टी को समर्थन करने के लिए तैयार हैं, और इस संबंध में एक चिट्ठी रामगोपाल यादव जो राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव उनके नजदीकी माने जाते हैं। उन्होंने एक चिट्ठी अमित शाह को लिखी है। ऐसा ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है। लेकिन उन्होंने यह चुनौती भी दी है रामगोपाल यादव को कि अगर वो कुछ गलत कह रहे हो तो उसका जवाब दें। उस चिट्ठी में नाम तक होने की दावा का दावा किया गया है कि इतने इतने लोग हैं और यह सपोर्ट करने के लिए तैयार हैं। अब महत्वपूर्ण बात यह है कि लगातार पार्टियां टूट रही हैं। जब पश्चिम बंगाल के चुनाव खत्म हुए तो वहां पर जो उनका विधायकों का दल था 80 विधायकों में से 64 अलग हो गए हैं।29 लोकसभा के सांसद हैं। उनमें से 20 ने एक नई पार्टी ज्वाइन कर ली है। मर्ज हो गए हैं नए पार्टी के साथ और उन्होंने लोकसभा स्पीकर को दस्तखत सहित अपनी सूची दे दी है कि वो एनडीए के समर्थन में रहेंगे और उनको एनडीए वाला जो मतलब इलाका है सरकार वाला जो क्षेत्र है उस  सिंटिंग  अरेंजमेंट किया जाए, विपक्ष वाले दल में नहीं। अब  कांग्रेस के बाद  दूसरा बड़ा दल है 37 सांसदों के साथ समाजवादी पार्टी का तीसरा बड़ा दल था वो तृणमूल कांग्रेस का तो तीसरा बड़ा दल टूट गया है। अब दूसरे बड़े दल की बारी है। तो उसके बहुत सारे सांसद ऐसे हैं जो भारतीय जनता पार्टी को समर्थन करने के लिए तैयार हैं। अब इसमें बहुत सारे फैक्टर हैं। पहला फैक्टर तो यह  की क्या चुनावी तैयारियां हो रही हैं, लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि इसका मैसेज 27 में क्या जाएगा? वो ज्यादा महत्वपूर्ण है। इसलिए कि 2027 पर  सबने दांव लगा रखा है और जिस तरह से अखिलेश का दावा है कि इस बार वो बाबा को पटकनी दे देंगे। लेकिन आसार वैसे नहीं नजर आ रहे हैं। दावे बहुत सारे हैं और विषय भी उठाने की कोशिश की जा रही है। विशेष रूप से मंदिर के इर्दगिर्द कि मंदिर में जमीन को लेकर के घोटाला हुआ। अब मंदिर के जो दान है उसको लेकर के घोटाला की बात अखिलेश कर रहे हैं। लेकिन क्या अखिलेश की इस बात पर हिंदू मतदाता विश्वास करेगा? जो अब तक इतना दिन मंदिर के उद्घाटन को हो गए। अब तक दर्शन के लिए नहीं पहुंचे। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि परिवार में एक बार फिर विघटन दिख रहा है और विघटन यहां तक कि बड़ा दल टूटने के लिए तैयार है।

Tamilnadu —बीजेपी नेताओं का जाना क्या कोई बड़े खेल का हिस्सा 

अन्नामलाई  अभी भारतीय जनता पार्टी से हाल फिलहाल में त्यागपत्र दिया है उनके साथ भारतीय जनता पार्टी के बहुत सारे नेता एक के बाद एक टूट कर आ रहे हैं। ऐसा कहा जा रहा था। ऐसा माना भी जा रहा था कि यह पूरा का पूरा जो अन्ना मलाई का भारतीय जनता पार्टी को छोड़ के जाना और अलग पार्टी का गठन करना यह ये भारतीय जनता पार्टी की ही एक योजना का हिस्सा है और उस योजना का हिस्सा इसलिए है कि अन्ना मलाई के भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़े रहने पर मैसेज यह जाता कि यह पूरा का पूरा कंट्रोल जो हो रहा है वो नॉर्थ के पॉलिटिकल सेटअप से हो रहा है और इसकाफायदा जनता पर उतना फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन अगर जनता के मन में डीएमए  जैसे पार्टी के नेता या टीवीके जैसे पार्टी के नेता जो यह बताने की कोशिश करेंगे कि आपको वो जो एक द्रविड़ियन वर्सेस आर्यन की एक बाइनरी है उसके तहत आपको सब्जुगेट किया जाएगा। तब लोगों को दिमाग में फर्क पड़ता है। दूसरा यह कि एक वो जो कास्ट वाला ब्राह्मण वर्सेस द रेस्ट का वहां पर मामला है वो है। तो ये जो दो मसले हैं इसके कारण से भारतीय जनता पार्टी की तमिलनाडु की ग्रोथ की एक सीमा थी। लोकसभा चुनाव में वो ग्रोथ 11.5% के आसपास वोट शेयर के उसमें पहुंची थी। लेकिन विधानसभा में तमिल अन्नामलाई के बैक फुट पर होने पर वो फिर घूम फिर करके 2.5% के आसपास सीमित हो गई। तो अब ग्रोथ को उस सीमा तक ले जाने की के लिए जहां पर सीटें सीटों में कन्वर्ट होने लगे ग्रोथ उसके लिए ये जरूरी था कि एक स्टेप पीछे आकर के कुछ इस तरह की रणनीति बनाई जाए कि जो बीजेपी को कॉम्प्लीमेंट तो करे लेकिन बीजेपी का होता हुआ ना दिखे और बाद में एनडीए का हिस्सा बन करके आगे बढ़े। इसी योजना के तहत यह काम होता हुआ दिख रहा है और यही कारण दिख रहा है जिसके कारण कि बड़ी संख्या में भारतीय जनता पार्टी के नेता जो है वो भाजपा छोड़ छोड़ के अन्नामलाई का साथ पकड़ रहे हैं और इस तरह की खबरें हैं कि 14 सितंबर लगभग आज दो महीने बाद अन्नामलाई अपना अपना अपना जो राजनीतिक दल है उसका औपचारिक उसकी उसको ल्च कर सकते हैं। उसकी पचारिक शुरुआत कर सकते हैं। उसके बाद नजर आएगा कि अन्ना मलाई को कितना ट्रैक्शन जनता से तमिलनाडु की जनता से मिल रहा है।

D-limitation Bill को पास कराने के लिए  बीजेपी कर रही यह  बड़ा खेला

भारतीय जनता पार्टी ने डीलिमेंटेशन बिल पिछले विधानस लोकसभा सत्र में मतलब पिछले संसद सत्र में पेश किया था। लेकिन वो गिर गया। पास नहीं हो पाया। लेकिन भारतीय जनता पार्टी लगातार इस कोशिश में है कि डीलिमिटेशन बिल पास हो और उसके बाद यह जो महिला आरक्षण बिल वाला है उसको 2029 के चुनाव में लागू किया जा सके। उसके लिए भरपूर कोशिश कर रही है।लेकिन जोकि अमेंडमेंट बिल्ड है इसलिए टू थर्ड मेजॉरिटी चाहिए और टू थर्ड मेजॉरिटी से कोसों दूर है भारतीय जनता पार्टी। अब लगातार वह कोशिश में है कि चाहे बाहर से समर्थन चाहे अंदर से समर्थन मिलकर के इस इस का इस बिल को पास किया जाए। अब धीरे-धीरे संख्या बढ़ाने की कोशिश हो रही है। तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसद आ गए। शिवसेना के लगभग छह  सांसद आने की उम्मीद है। उसके अलावा अगर समाजवादी पार्टी में फूट होता है उनके सांसद भी सपोर्ट के लिए आ जाते हैं। डीएम के कांग्रेस से नाराज होने के कारण अगर अबस्टेन भी कर देती है तो भी सीटों में अंतर आ जाएगा। उसके अलावा डीएम बीजेडी को कन्विंस कर कर रखा है भारतीय जनता पार्टी ने। उसके अलावा VSR   कांग्रेस हालांकि उनके सांसद बहुत ज्यादा नहीं है उनको इस तरह से कुल मिलाकर के कोशिश इसी दिशा में हो रही है कि किसी तरह से ये पूरा का पूरा जो मामला है वो उस स्थिति में पहुंचे जहां भारतीय जनता पार्टी इस अमेंडमेंट बिल को लोकसभा में पास करवा पाए। लोकसभा से उलट राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी को ये बिल पास करवाना बहुत आसान होगा। आसान इसलिए होगा कि अब लगभग वहां पर ऐसी स्थिति है दो तिहाई वाली जहां भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत आसान होगा इस बिल को पास कराना  इसीलिए लग रहा है कि बीजेपी राज्यसभा को लेकर के  निश्चिंत हैं। अभी आम आदमी पार्टी के जो सांसद आ गए हैं उसके बाद और स्थिति मजबूत हुई है। अभी के चुनाव में  कई सारे सांसद भारतीय जनता पार्टी के जीत के आ रहे हैं राज्यसभा में। तो राज्यसभा में दिन पर दिन साल दर साल भारतीय जनता पार्टी लगातार मजबूत हुई है। तो राज्यसभा समस्या नहीं है। लोकसभा के सांसदों का दो तिहाई समर्थन इस बिल को पास करने के लिए जरूरी है। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी लगातार है और ऐसा लगता है कि ये जो तृणमूल कांग्रेस शिवसेना उद्धव बाला साहब ठाकरे समाजवादी पार्टी के लोग ये सब उसी पटकथा का हिस्सा हैं जहां पर भारतीय जनता पार्टी किसी भी कीमत पर चाहे वह मर्ज करें भाजपा में चाहे वह बाहर से समर्थन करें लेकिन इस बिल को समर्थन करें उसी योजना का हिस्सा नजर आता है।

जयंत चौधरी जाना चाहे तो जा सकते हैं, सीटें नहीं मिलेगी-दो टूक 

राष्ट्रीय लोकदल के नेता जयंत चौधरी ने पैरवी लगाई पीयूष गोयल से कॉमर्स मिनिस्टर कि उनको किसी तरह से विधानसभा के चुनाव में 30 से 35 सीटें दी जाए।कि कि उनके लिंक पर्सन जो है वो पीयूष गोयल ही हैं। तो पीयूष गोयल ने भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से उनकी मुलाकात कराई इस संबंध में चर्चा करने के लिए और उन्होंने अपनी चर्चा में बातचीत में 30 से 35 सीटों की मांग रख दी। उनका यह कहना है कि पश्चिम में जाट बाहुल्य इलाका है और वहां पर उनको सीट चाहिए। अब इसमें दो तीन फैक्टर है। पहला ये कि क्या जयंत चौधरी जाटों के नेता हैं? एक दूसरा है कि उनका उनकी पकड़ कितनी है? तीसरा कि उनके पास सिर्फ दो सांसद हैं। दो सांसद के पल पर उनको कितनी सीट दी जा रही है। इन सब के मद्देनजर भारतीय जनता पार्टी ने जयंत चौधरी को दो टू कह दिया कि  उनको जो है मैक्सिमम अधिकतम 10 से 15 सीटें दी जाएंगी। उससे ज्यादा एक भी सीट नहीं दी जाएगी। उनके पास दो लोकसभा हैं और उनका परफॉर्मेंस ऐसा नहीं था चुनाव में कि जाट वोट उनके कारण लामबंद हुए। जाटों का वोट भाजपा को उतना ही मिला जितना हमेशा से मिलता रहा है। तो जो उपयोगिता थी जयंत चौधरी की वो साबित नहीं कर पाए। और महत्वपूर्ण बात यह है कि जाट नेताओं जाट नेता का दावा करने वाले जयंत चौधरी अपना चुनाव नहीं जीत पाए। उनके पिता अपना चुनाव मुजफ्फरनगर से नहीं जीत पाए। वह मथुरा से नहीं जीत पाए। हेमा मालिनी से लगातार हारे। तो यह दावा करना कि वह जाटों के नेता हैं और भारतीय जनता पार्टी को मदद करेंगे वैसी स्थिति नहीं है। इसलिए उनको दो टूक जवाब मिल गया है कि 10 से 15 सीटे अगर उनको स्वीकार हैं तो ठीक है। और अब उनकी ऐसी स्थिति भी नहीं है कि वो इधर-उधर ज्यादा पाला बदलने की स्थिति में रहें हैं। समाजवादी पार्टी भी उन पर कितना भरोसा करेगी, कितना नहीं भरोसा करेगी यह महत्वपूर्ण है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *