UP  क्या इस बार दो लड़कों की जोड़ी बनने से पहले टूट रही है 

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव हैं उसको लेकर के जो सबसे बड़े अलायंस की वहां बात हो रही है,  समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की पर उसमें लगातार जिस तरह से एक दूसरे के प्रति बयानबाजी हो रही है वो  खतरनाक स्तर पर जा रही है और जो सहमति की बात कही जा रही थी उस सहमति पर पहुंच पाएंगे या नहीं पहुंच पाएंगे ये एक बड़ा प्रश्न है। अभी जो नए प्रभारी राजेंद्र गौतम  हैं वो समाजवादी पार्टी से  कांग्रेस में आए थे , उनको उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है। उन्होंने बराबर सीट की बात की थी। उसके बाद फिर उसका जवाब आया कांग्रेस समाजवादी पार्टी की तरफ से समाजवादी पार्टी ने बताया कि जहां जीत सकते हैं वहां वो सीटों के बारे में बताएं। और  लगातार  मसूद अजहर इमरान बीच-बीच में समाजवादी पार्टी पर टिप्पणी कसते रहते हैं, समाजवादी पार्टी के नेताओं पर विशेष रूप से उनके मुसलमानों के प्रति रवैया को लेकर के चाहे वो मस्जिद मस्जिदों के टूटे जाने पर उनकी चुप्पी है या अयोध्या पर वो बात करते हैं। अब इमरान मसूद ने  एक बार फिर  चुनौती दी है कि समाजवादी पार्टी जो है वो इस मुगालते में ना रहे कि उसको अपने दम पर कुछ मिलने वाला है। कांग्रेस अगर सपोर्ट नहीं की होती, कांग्रेस के साथ अलायंस नहीं होता और अगर मुस्लिम  सपोर्ट नहीं किए होते तो 2022 के चुनाव में 122 सीट भी 120 सीट भी समाजवादी पार्टी को नहीं मिली थी। और वहीं 2024 में उनको 37 सीटें मिली हैं। और अगर कांग्रेस की छोड़ दी जाए तो लगभग 42 43 सीटें हो जाती है। तो ये जो विवाद है यह लगातार चल रहा है और बहुत ज्यादा चुनाव के दूर नहीं है। तो क्या यह जो बवाल चल रहा है यह कहीं से भी सियासी तौर पर कांग्रेस को या समाजवादी पार्टी को फायदा करने वाला है। इसलिए कि अब तक तो सीटों पर बात शुरू होनी चाहिए कि कौन कितनी सीटें लड़ेगा, कहां से कौन सीटें लड़ेगा और उसके बाद उसी हिसाब से फाइनल करके आगे की रणनीति पर काम करना चाहिए।पर ये  जो आपस के झगड़े हैं इसको क्या समेट पाएगी या नहीं समेट पाएगी?

Tamilnadu  में BJP की चोरीछुपे नई रणनीती है  

भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई जो हैं उन्होंने अब भारतीय जनता पार्टी छोड़ दी है और अब उन्होंने अपनी एक पार्टी बनाने का निर्णय किया है। लेकिन अब वह स्वतंत्र रूप से बहुत सारी बातें कह रहे हैं और हिंदुत्व की राजनीति तमिलनाडु में करते हुए दिख रहे हैं। अब उनका जो लेटेस्ट बयान है वो एक कोयंबटूर के एक कार्यक्रम में उन्होंने बोला कि सच्चा हिंदू जो है वो जाति की बात नहीं करता है। और ये बात कह करके उन्होंने जो जाति की राजनीति तमिलनाडु में चलती है या जाति की राजनीति के इर्द-गिर्द ही तमिलनाडु की होती है। विशेष रूप से एंटी ब्राह्मण ब्राह्मणिज्म का बेस बना करके। हालांकि नॉर्थ में याबाकी सब जगहों पर ब्राह्मणिज्म कोहिंदुत्व से जोड़ा जाता है। लेकिन तमिलनाडु की जो राजनीति है वहां पर एंटी ब्राह्मणिज्म बड़ा फैक्टर है। वहां ब्राह्मणों के खिलाफ जो एक बड़ा आंदोलन चलाया गया था जिसके सी नायकर वो थे सी रामास्वामी नायकर जिनको वहां पेरियार जैसे उससे संबोधित किया जाता है। तो अब अन्नामलाई जो है वो यह कह रहे हैं कि हिंदू हर जगह धर्म का ढिंढोरा पीटने या उसको दिखावा करने की जरूरत नहीं है। और हिंदू कभी अपने धर्म का प्रदर्शन नहीं करता है बल्कि हर इंसान को बराबरी के साथ देखता है। अब ये ये जो है ये एक इसको दो तरह से इसको आप हिंदुत्व के दृष्टि से भी इंटरप्रेट कर सकते हैं। और एक दूसरा दृष्टिकोण भी ये हो सकता है कि जो बीजेपी का सनातन वाला है उसमें उसमें एक नया बिंदु जोड़ा गया है जो जिसकी एक्सेप्टेबिलिटी तमिलनाडु में होगी और उस एक्सेप्टेबिलिटी के आधार पर वो अपना बेस आगे बढ़ाने की जुगत में है और इसीलिए वो ऐसी बात करते हैं। अब वो उन्होंने ये भी कहा कि वो अपनी जाति और धर्म को घर के अंदर बात रख के आते हैं। अपनी उन्होंने एक जो नई संस्था बनाई है वी द लीडर करके उसके तरह तहत ये कार्यक्रम हो रहा था। हालांकि कार्यक्रम जो था वो नशाबंदी से संबंधित था। लेकिन जो उन्होंने बात कही वो एक सर्वग्राही सब लोगों को साथ ले चल के एक योजना के तहत किया जा रहा है। हालांकि उनकी पूरी की पूरी राजनीति हिंदुत्व के उस पर हो रही है।

मध्यप्रदेश  में जो चल रहा BJP के खराब हो रहे हालात का Indicator  

जो हिंदुत्व के फायर ब्रांड मध्य प्रदेश के नेता थे और वहां के गृह मंत्री रह चुके हैं। जब शिवराज सिंह चौहान की सरकार थी नरोत्तम मिश्रा को दतिया से टिकट काट दिया गया है। लेकिन नरोत्तम मिश्रा का दतिया से टिकट काटना और उसके पीछे की बड़ी राजनीति है। क्यों ऐसा किया गया है? इसको लेकर के बहुत सारी चर्चा है और उसको लेकर के बहुत सारा नाराजगी थी। लेकिन उन्होंने खुल के नरोत्तम मिश्रा ने बोला कि जो पार्टी का निर्णय है उसको स्वीकार करना चाहिए। सबको स्वीकार करना चाहिए और यह मामला अब शांत तो हुआ है लेकिन जिस तरह के जिस तरह की राजनीति वहां पर हुई और होती रही है उसमें नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटा जाना अपने आप में एक बड़े राजनीतिक बदलाव की की तरफ इशारा करता है। नरोत्तम मिश्रा जो है वह इस कोशिश में थे कि उनको हिंदुत्व की राजनीति करेंगे तो उनको मुख्यमंत्री पद की उनको मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी मिल सकती है।  लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अब वहां पर उनके खिलाफ जो चुनाव लड़ने वाले थे उन्होंने भाजपा के अंदरूनी हालात पर बात की है और यह कहा है कि कांग्रेस के लोग ये कह रहे हैं कि नरोत्तम मिश्रा के चुनाव में हट जाने के बाद उनके लिए जीत आसान हो गई है और नरोत्तम मिश्रा का को टिकट ना दिया जाना भाजपा की आंतरिक लड़ाई है और भाजपा में बहुत फूट है मध्य प्रदेश में और इस फूट की बात वो लगातार कह रहे हैं और यह बात सही भी है  कि नरोत्तम मिश्रा बहुत कम मार्जिन से हारे थे। भाजपा के अंदर के लोगों का ही आरोप यह था कि उनको हराया गया था दतिया से इसलिए कि दतिया से वह बड़े नेता हैं और मध्य प्रदेश की राजनीति में जिस तरह से ओबीसी पूरी पॉलिटिक्स घूम रही है उसमें और नरोत्तम मिश्रा का हालांकि नरोत्तम मिश्रा का रिप्लेसमेंट ब्राह्मण ही है। लेकिन बड़े ब्राह्मण चेहरे को हट टिकट डिनाई करके एक ऐसे नेता को टिकट देना जिसका कोई राजनीतिक वो ना हो तो क्या वो कांग्रेस को चैलेंज कर पाएगा घनश्याम सिंह का दावा है कि वो चुनाव कांग्रेस वहां आसानी से जीत रही है। लेकिन ये एक डेवलपमेंट जो है वो निश्चित तौर पर भारतीय जनता पार्टी के मध्य प्रदेश में खराब हो रहे हालात का इंडिकेटर है।