भालू ज्यादा हिंसक हो रहे- नींद नहीं आ रही -कारण चौकाने वाले

आपने वास्तविक जीवन में भालू देखा हो या नहीं, लेकिन बचपन के किस्से-कहानियों में शहद के नशे में मदमस्त भालू के बारे में जरूर पढ़ा और सुना होगा। पर कम ही लोग ये जानते होंगे , कि भालू ना केवल एक जंगली जानवर हैं, बल्कि ये जंगलों के प्राकृतिक माली होते हैं। ये फल खाकर उनके बीजों को दूर-दूर तक फैलाने का काम करते हैं। जब यह मल त्याग करते हैं तो ये बीज जमीन में आसानी से उग जाते हैं। राजस्थान के कुंभलगढ़ और टोडगढ़-रावली अभयारण्यों में भालुओं पर हुए शोध में यह बात साबित हुई है। यही नहीं अंतरराष्ट्रीय पत्रिका बायोट्रॉपिक में प्रकाशित इस शोध ने भालुओं को वनों के भविष्य का निर्माता बताया गया है।
लेकिन जलवायु परिवर्तन की मार ना केवल इंसानों को परेशान कर रही है बल्कि इसने भालुओं की भी नींद छीन ली है। हिमालय क्षेत्र के भालुओं पर किए गए शोध से पता चला है कि भालुओं के आहार में काफी बदलाव आया है। अब वे ज्यादा फल खाने लगे हैं जिससे नई मुसीबत खड़ी हो गई है। इससे उनका बर्ताव आक्रामक होता जा रहा है और शीत निंद्रा का समय घट रहा है। शीत निंद्रा यानी सर्दियों के दौरान बिना खाए-पिये लंबी अवधि तक सोये रहना जो कि ठंड से बचने के लिए भालुओं की एक अनुकूलन प्रक्रिया है। अब जब भालू लंबे समय तक सो नहीं रहे मतलब उनका शीत निंद्रा का समय घट रहा है जिसकी वजह से उत्तराखंड और हिमाचल जैसे राज्यों में इंसानों पर भालुओं के हमले के मामले भी लगातार बढ़ रहे हैं।

 

अत्याधिक कैलोरी वाले भोजन ने बिगाड़ दी भालूओं की जिंदगी

दरअसल हिमालय में जलवायु परिवर्तन की वजह से जंगलों में कंदमूल और शिकार में कमी आई है और इस कारण भालू आबादी वाले इलाकों में जाकर सेब, खुबानी, पपीता और अमरूद जैसे फल खा रहे हैं। इस बात का खुलासा जूलॉजिकल सर्वे और भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिकों के शोध से हुआ है और यही बदलाव इंसानों और जानवरों के बीच संघर्ष के बढ़ने का भी संकेत है। शोध के अनुसार भालू के पारंपरिक भोजन बांज, काफल, हिंसालु आदि में काफी कमी आई है। अब वे जंगलों से निकलकर बागवानी क्षेत्रों और खेतों की ओर बढ़ रहे हैं, जहां अत्याधिक कैलोरी वाले फल उन्हें आसानी से मिल रहे हैं। अत्यधिक उर्जा देने वाले इन फलों से भालुओं की शीतनिंद्रा का क्रम गड़बड़ाया है और अब वह पूरे साल न सोकर इंसानों की बस्तियों में जाकर उत्पात मचा रहे हैं।

प्रदूषण का खतरा ना केवल इंसानों को बल्कि जानवरों को उससे ज्यादा

 

भालुओं की बदलती चाल दरअसल प्रकृति के बिगड़ते हाल की ही कहानी है। वायु प्रदूषण और उसके परिणामस्वरूप होने वाला जलवायु परिवर्तन केवल मौसम या तापमान तक सीमित समस्या नहीं है। इसका असर जंगलों के पारिस्थितिक तंत्र से लेकर वन्यजीवों के व्यवहार और इंसानों की सुरक्षा तक साफ दिखाई दे रहा है। भालुओं की बदलती भोजन-आदतें, सोने के घटते घंटे ,यानी शीतनिंद्रा इसी बदलाव की एक गंभीर चेतावनी हैं। यदि हमने समय रहते प्रकृति के साथ संतुलन बनाना नहीं सीखा, तो इसकी कीमत इंसान और वन्यजीव—दोनों को चुकानी पड़ेगी।