क्या BIHAR से होना कोई गुनाह है —अजब हाल Congress का
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री केसीआर पर आरोप लगाया है और इस बार आरोप के दो पक्ष हैं। पहला उन पर भ्रष्टाचार का आरोप, दूसरा वो बिहार के लोगों को लेकर के जो उनके मन में या जो वो बातें कहते रहे हैं पहले भी उसको एक बार फिर मैनिफेस्ट किया है। जैसा कि केसीआर पर भ्रष्टाचार के आरोप और जमीन हड़पने के आरोप के तहत एक इंक्वायरी सेटअप की है रेवंत रेड्डी ने ,उसी के तहत बातचीत के दौरान यह बात निकल कर के आई कि केसीआर फैमिली में उनकी पत्नी शोभा और वो मिलाकर के लगभग 67 एकड़ जमीन है सिद्धिपेट में और उसके अलावा कुल मिलाकर के यह कहा गया है अलग-अलग रिपोर्ट में कि उनके पास लगभग 440 एकड़ जमीन के आसपास जो उनकी एक्सटेंडेड फैमिली है उसके पास है। फिर अब पूछा जा रहा है कि केसीओर वह किस गांव के हैं? उनको इस बात का प्रमाण देना चाहिए, बताना चाहिए कि तेलंगाना या आंध्र प्रदेश के किस गांव से हैं। जो आरोप है लगा वो यह कि वो बिहार से यहां आए हैं और आकर के यहां पर उन्होंने कब्जा करके रखा है। ये एक महत्वपूर्ण बात है कि जिस व्यक्ति ने तेलंगाना की लड़ाई लड़ी है। उसके बारे में इस तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। तो आरोप कोई और व्यक्ति नहीं है बल्कि जो मुख्यमंत्री है वो ये कह रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री जो है वो बिहार के माइग्रेंट हैं। अब इसमें हालांकि कोई विवादित बात नहीं है। कोई भी व्यक्ति कहीं भी माइग्रेंट हो के 200 साल 400 साल पहले आ जाता है। बहुत सारे लोग जो हैं वो साउथ से नॉर्थ आ गए हैं। नॉर्थ से साउथ आ गए हैं। केरल में बहुत सारी सिख फैमिली रहती है। तमिलनाडु में सिख फैमिली रहती है। तो, यह आरोप थोड़ा विवादित हैं। और विवादित इसलिए भी हैं, कि वह तेलंगाना के मुख्यमंत्री बिहार के लोगों के बारे में हमेशा से इस तरह की बयानबाजी करते रहे। और इसीलिए बिहार चुनाव के दौरान जो है वो मसला भी उठा था जब तेलंगाना के मुख्यमंत्री प्रचार के लिए कांग्रेस के प्रचार के लिए बिहार गए थे। अब इसका जवाब जो है वो मांगा जाएगा। कांग्रेस के बड़े नेताओं को भी इसका जवाब देना पड़ेगा।
BJP अध्यक्ष बड़े नेताओं की छत्रछाया से बाहर निकलकर काम करें
भारतीय जनता पार्टी के नए पार्टी अध्यक्ष हैं नितिन नवीन, उनका कद इस तरह का नहीं था कि उनको राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी जाए। केंद्रीय नेतृत्व के का बहुत ज्यादा अनुभव नहीं था या केंद्र में काम करने का बहुत ज्यादा अनुभव नहीं था। युवा मोर्चा के तौर पर जो भी अनुभव रहा हो लेकिन सब ने यही कहा कि नितिन नवीन को काम मतलब जो आलोचक हैं वो ये कहें कि नितिन नवीन को काम तो करना नहीं है। काम तो असली बड़े नेता जो टॉप पर हैं वो करेंगे। नाम इनका रहेगा। लेकिन अभी जो अंदर से खबरें निकल कर के आ रही हैं कि अब जो व्यवस्था स्थापित एक करनी थी पार्टी का संगठन बन गया। एक दो जगह के चुनाव हो गए। अब संगठन उनसे ये उम्मीद कर रही है कि वो अपनी टीम के साथ इंडिपेंडेंटली निर्णय लेना शुरू करें और इंडिपेंडेंटली काम करें। इस तरह के मैसेज उनको दिए जा रहे हैं। अब ये मैसेज के मायने क्या हैं? क्या ऐसा लगता है कि वह हर चीज के लिए केंद्रीय नेतृत्व की तरफ देख रहे हैं। उनसे उम्मीद कर रहे हैं कि वो हर उस पर उनको कम से कम अगर फैसला नहीं सुना है तो गाइड करें कि ये किया जाना चाहिए। इस चीज को ऐसा किया जाना चाहिए। उसमें जो दिक्कत बताई जा रही है वो ये हो रही है कि बहुत सारी चीजों में मामला डिले हो रहा है। अब जो पार्टी को करना चाहिए पार्टी अध्यक्ष को या पार्टी की जो संवैधान बाक़ी संवैधानिक संस्थाएं हैं पार्लियामेंट्री बोर्ड है या और भी जो है जो महासचिवों का मामला है या पार्टी का जो पूरा का पूरा अमला है वो फैसला करें लेकिन ऐसा नहीं होता दिख रहा है और इसीलिए केंद्रीय नेतृत्व बोला कि नहीं अब यह जिम्मेदारी जो है वो पार्टी अध्यक्ष ही है उनके पास एक पूरी पूरी टीम है और इस बार की जो टीम है वह नई है। उसमें अच्छा काम किए हुए लोग हैं युवा मोर्चा से लेकर के। अब बहुत सारे तो ऐसे महासचिव हैं जो राष्ट्रीय अध्यक्ष से ज्यादा अनुभव है उनको संगठन में काम करने का। तो उनकी मदद से या उनके सहयोग से या उनके साथ तालमेल बिठा करके नितिन नवीन को अब इंडिपेंडेंटली बहुत सारी काम को आगे बढ़ाना पड़ेगा। और यह इस तरह का मैसेज उनको दिया जा चुका है।
भगवा T-Shirt पर राजनीति शुरू
पश्चिम बंगाल में इस बात को लेकर के विवाद हो गया है। जब कोलकाता पुलिस ने एक टेंडर फ्लोट किया है। जिसमें जो वॉलंटियर्स के लिए ऑरेंज कलर कह लीजिए या जिसको कुछ लोग कहेंगे कि ये सैफरन कलर है और मुस्लिम कहेंगे कि ये जाफरान है तो उस फुल स्लीव की टीशर्ट को लेकर के एक कॉन्ट्रैक्ट जो है वो फ्लोट टेंडर फ्लोट किया गया है। इसको लेकर के विवाद खड़ा हो गया है। पुलिस ये जो है जो टेंपरेरी वालंटियर्स हैं दुर्गा पूजा में उनको उपलब्ध कराना चाह रही है। अब ये लगभग इस पर 90 लाख के आसपास खर्च होना है। सीनियर पुलिस मतलब ये पुलिस वालों का कहना है और ये जो है ड्रेस जो है इसमें एक पीक कैप भी है इस पूरे उसमें टीशर्ट के साथ-साथ एक कैप भी है। तो हां पीक कैप तो अब ये मामला जब जैसे ही सैफरन का आया वैसे विवाद उठेगा। अब ये जो है 10 दिन तक एनजीओस को कैडेट्स को और बाकी जो स्काउट्स हैं, स्टूडेंट्स हैं जो भी वालंटियर का काम करेगा भीड़ मैनेज करने के लिए प्रमुख रोड पर जो पुलिस की मदद के लिए ये किया जाएगा। तो लगभग 20,000 वालंटियर्स डिप्लॉय किए जाएंगे और ये हर साल का काम है। हर साल ये सब किया जाता है। दुर्गा पूजा पश्चिम बंगाल में बहुत जोर शोर से मनाया जाता है। तो यह होना ही था। लेकिन असली मसला यह है कि रंग पर आपत्ति है। रंग पर हमेशा आपत्ति होती है। जब भारत के टीम का भारतीय टीम का कभी ड्रेस मान लीजिए कुछ सैफरन से मिलताजुलता हो गया तो उसको भगवाकरण कहने की बात करते हैं। हालांकि अब तो पश्चिम बंगाल में भगवा की सरकार है। तो भगवा की सरकार ग्रीन या और बाकी रंग भी ले आएगी और भगवा भी ले आएगी। तो इसमें इसमें कोई वो नहीं है। लेकिन अब कांग्रेस के नेता तृणमूल कांग्रेस के नेता कुणाल घोष सौम्या राय इस तरह के और जो मुस्लिम पार्टीज हैं वो तो ऑब्जेक्शन करेंगे ही लेकिन ये जो है ऐसा है। अब लेकिन बीजेपी के नेताओं का भी अपना तर्क है। उसमें से राहुल सिन्हा जो बीजेपी के नेता है उन्होंने कह दिया कि जो भारत का पहला ध्वज प्लान हुआ था वो सैफरन था। खैर ये ये विवाद कभी नहीं खत्म होने वाले हैं
अखलेश यादव पूरी कोशिश कुनबा बढ़े
अखिलेश यादव लगातार इस कोशिश में हैं कि किस तरह से अपना कुनबा वहां पर बढ़ाएं। कुनबा इस सेंस में कि अब वो पीडीए की बात करते हैं। पीडीए में जो है पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक फिर पिछड़ा का बहुत सारा डेफिनेशन हुआ। पिछड़ा को पंडित बोला गया। ए का बहुत सारा डेफिनेशन हुआ। अल्पसंख्यक हो गया। ये आदिवासी हो गया। अगला हो गया। इस तरह का बहुत सारा डेफिनेशन आया। लेकिन उनकी समस्या कुछ दूसरी है। समस्या यह है कि कांग्रेस के अकेले दम पर या कांग्रेस की जिस तरह की स्थिति है उस दम पर क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में कुछ कर पाने की स्थिति में हैं? कर पाएंगे। इसको लेकर के लगातार आत्म मंथन चल रहा है जो जरूरी भी है किया भी जाना चाहिए। चुनाव बहुत ज्यादा दिन नहीं है। 6 महीने ज्यादा से ज्यादा मार्च जाएंगे। हालांकि मई में विधानसभा खत्म हो रही है लेकिन इसको पहले ही कर दिया जाएगा बाकी चार प्रदेशों के पंजाब और उत्तराखंड बाकी और जो दो एक नॉर्थ ईस्ट का प्रदेश है ये कर दिया जाए तो इन परिस्थिति में आखिर इसके पास ऑप्शन क्या है? अभी जब माता प्रसाद पांडे से संजय निषाद की मुलाकात हुई थी तो भी बहुत बकेड़ा खड़ा हुआ था कि क्या निषाद पार्टी सरकार से अलग होकर के अखिलेश के साथ जाएगी बाद में जिसका क्लेरिफाई हो गया कि नहीं ये लेकिन लेकिन क्या क्लेरिफिकेशन से बात खत्म हो जाएगी या कुछ इस तरह की स्थिति होगी जहां ये समझने की कोशिश की जाएगी कि क्या कुछ उन एलआई को भापा जा रहा है जो अखिलेश को ज्वाइन कर सकते हैं। निश्चित तौर पर इस तरह के अब ओम प्रकाश राजभर जिस तरह से अखिलेश के खिलाफ लगातार बयानबाजी कर रहे हैं तो उनका जाना तो असंभव सा है। पल्लवी पटेल ने अपनी नाराजगी पहले ही जता दी है। जिस तरह से अखिलेश का व्यवहार है तो पल्लवी पटेल साथ नहीं जाएंगे। लेकिन पूजा पाल जैसे ओबीसी नेता पहले ही अलग हो चुके हैं। लेकिन क्या और ऐसे कोई नेता है क्या मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशंस है? क्या एआई एम एमआईएम जो है वो लगातार कह रहा है कि हमारे साथ अलायंस कीजिए नहीं अलायंस कीजिएगा तो नुकसान होगा। नुकसान होता भी है। मुस्लिम वोट अगर 10 कॉन्स्टिट्यूएंसी में बटेंगे तो प्रभाव भी इसमें पड़ पड़ जाता है। इसलिए कि कुछ जगह जो है जीत और हार का अंतर बहुत छोटा होता है। तो ये अखिलेश लगातार उन दलों को उन नेताओं को देखने की कोशिश कर रहे हैं, समझने की कोशिश कर रहे हैं और फील्डर उनको भेज रहे हैं अलायंस के लिए। क्या होगा, क्या नहीं होगा? अ जल्दी ही मतलब जल्दी क्या महीने दो महीने में स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन पंजाब उत्तर प्रदेश में स्टेक्स बहुत हाई है अखिलेश के लिए इसलिए कि लंबी तीसरी बार अगर ये चुनाव में हारते हैं तो तीसरी बार बाहर होंगे।
