UP अभी से बीजेपी की जबरदस्त तैयारी क्या विपक्ष की सीटे लेने की भी कवायद

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में तो होने हैं लेकिन फरवरी मार्च में होंगे या मई तक टाले जाएंगे। यह अभी संशय है लेकिन ज्यादा संभावना यह है कि फरवरीमार्च में बाकी चार प्रदेशों के साथ चुनाव हो जाए। लेकिन अहम मसला यह है कि भारतीय जनता पार्टी हालांकि हमेशा चुनाव मोड में रहती है। लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव में अभी से ही बीएएल संतोष का दौरा शुरू हो गया है और उन्होंने जो पार्टी की स्ट्रेटजी बूथ की कैडर मोबिलाइजेशन को लेकर काम करने के लिए वो लखनऊ पहुंच गए हैं और लखनऊ में वह इस सब पर स्ट्रेटजी बनाएंगे। हालांकि उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी कमजोर स्थिति में नहीं है। बावजूद इसके कि वह तीसरी बार मैंडेट खोज रहे होंगे। लेकिन योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर वोट मिलने की संभावना लगातार है और सारे सर्वे यही इशारा कर रहे हैं कि अभी कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन आसपास भी नहीं है। लेकिन फिर भी कॉम्प्लेक्सिटी ना आए उसको लेकर के संगठन महामंत्री बीएल संतोष जो हैं वह लखनऊ में बहुत सारी बैठकों को का निरीक्षण या बैठकों की अध्यक्षता करेंगे जिसमें सभी मोर्चा के कोर कमेटी के रीजनल जो हेड्स हैं इन सब से बात करेंगेऔर स्ट्रेटजी बताएंगे कि किस तरह से चुनाव को आगे ले जाना है और इस सब के बीच जो इंचार्ज हैं उत्तर प्रदेश में भाजपा के विनोद तावड़े महासचिव वो लंबे समय से वहां डेरा डाले हुए हैं और जो भी समस्याएं दिख रही हैं या समस्याएं सामने आ रही हैं उनके समाधान को विशेष रूप सेनेताओं के आपसी तालमेल का कुछ कास्ट इक्वेशंस जो इधर इधर-उधर हो रहे हैं या संगठन और सरकार के बीच जो तालमेल का अगर कोई इशू है उन सारी चीजों को एड्रेस कर रहे हैं और उनका समाधान कर रहे हैं। अब ये कुल मिलाकर के अगर यह देखा जाए तो लगभग छ महीने पहले इस तरह की बैठक जो है वह बहुत महत्वपूर्ण है। तब जब चुनाव को एक बिना किसी अह अड़चन के और स्मूथली कंडक्ट करा पाए बीजेपी इसलिए कि अगर बीजेपी स्मूथली सब कुछ करा ले जाती है बिना किसी आखरी समय के विवाद के तो वह एक मजबूत स्थिति में उत्तर प्रदेश में नजरआ रही है और उसके सारे नेता सक्रिय हो गए हैं।

जम्मू- कश्मीर में एक बार फिर बढ़ता डर कैसे निपटेगी सरकार

 

एक बार फिर जम्मू कश्मीर में थोड़ी सी खराब होती दिख रही है। 1990 में जब रालिब गालिब चालिप का नारा दिया गया था कि कन्वर्ट हो भाग जाओ या मारे जाओगे। वह वैसा ही थ्रेट आ रहा है लगातार कश्मीरी पंडितों को। हालांकि ज्यादातर कश्मीरी पंडित तो वैली छोड़ के पहले से ही विस्थापितों वाली जिंदगी जी रहे हैं। कुछ जम्मू में है, कुछ दिल्ली में है, कुछ विदेशों में हैं। बहुत कम कश्मीरी पंडित बचे हुए हैं। लेकिन जो बचे हुए हैं वो सरकारी सेवाओं वाले हैं। जिनकी मजबूरी है और जिनको सुरक्षा देने की लगातार बात हो रही है और उनमें बहुत सारे लोगों पर हमला हुआ है। जिस तरह से राहुल पंडित को राहुल एक जो कश्मीरी पंडित था उसको मारा गया था। उसके बाद टीचर जो कश्मीरी पंडित है उनको मारा गया है। उसको लेकर के लगातार जो है वहां पर स्थिति जो है ठीक नहीं है और कहा ये जा रहा है कि कश्मीरी पंडितों को जो चिट्ठियां धमकी भरे आ रही है वो ये कि आप अपनी नौकरी छोड़ो और यहां से जाओ और यह लश्कर तयबा का जो आतंकी संगठन है यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल उसकी तरफ से आ रहा है। हालांकि घाटी में अब ज्यादातर जो आतंकवादी संगठन है उनकी कमर सुरक्षा बलों ने तोड़ दी है। उनके पास कुछ ज्यादा नहीं है सिवाय कुछ छुटपुट अटैक के और वो टारगेटेड अटैक कि किसी को किसी व्यक्ति को टारगेट किया जाए। अब और सबसे आसान इनको मजदूर लगते हैं इन आतंकवादियों को तो ये उनको उन पर हमला कर रहे हैं। जो नौकरी पेशा लोग हैं उन पर हमला कर रहे हैं। तो दो तरह की बात हो रही है। एक तो ये कि जो कश्मीरी पंडितों का संगठन है, सरकारी जो मुलाजिम है उनका है। उन्होंने सुरक्षा बढ़ाने की बात की है। एक बार और प्लस ये जो आतंकवादी धमकी दे रहे हैं इनको पता लगाने की जरूरत है और इनको आयरन हैंड से डील करने की जरूरत है और लगभग 7000 कश्मीरी पंडित जो है वो उनको ये इस तरह की धमकी दी जा रही है और उनसे बोला जा रहा है कि वो नौकरी छोड़े और नौकरी भी छोड़ छोड़ें और नौकरी छोड़ के वैली छोड़ के जाए। अब क्या 90 वाली स्थिति होगी? 90 वाली स्थिति रिपीट होने दे वैसा तो नहीं हो रहा है। इसलिए कि अगर उस तरह का एक भी घटना होगा तो इस बार भारत सरकार बहुत डिसाइसिवली इससे निपटेगी। लेकिन जो खतरा है वह तो लगातार बना ही रहता है। खैर जो भी होगा लेकिन सरकार इसके सामने झुकने वाली नहीं है।

 

ममता बनर्जी क्या अब राजनीती से सन्यास लेने का समय आ गया

 

पांच विधानसभा और एक लोकसभा का जो बाय इलेक्शन घोषित हुआ है उसमें नंदी्राम भी एक सीट है। और नंदी्राम से ममता बनर्जी के चुनाव लड़ने पर संशय है इसलिए कि वहां से वह चुनाव हारी थी। अब नंदीग्राम सीट से शुभेंदु अधिकारी चुनाव लड़े थे और उन्होंने ममता बनर्जी को हराया था। अब उन्होंने नंदी्राम सीट अपनी छोड़ दी है। इस बार दो सीट से वो चुनाव लड़े थे तो नंदीग्राम को इस बार उन्होंने छोड़ दिया है। तो प्रश्न यह उठाए जा रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी इस बात का इस बात का साहस जुटा पाएंगी कि वह नंदीग्राम से चुनाव लड़े और उनके खिलाफ मतलब उन पर व्यंग भी किया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस जो है उनके खिलाफ कैंडिडेट नहीं उतारेगी। मतलब यह कि किसी भी स्थिति में ममता बनर्जी एक ऐसी फाइट में फसेंग जहां पर उनके लिए अपनी साख बचाना वो मुश्किल होगा। इसलिए कि अगर ममता बनर्जी चुनाव लड़ती हैं और उनके खिलाफ कोई तृणमूल कांग्रेस जो अब 60 62 विधायकों वाला दल अलग हो गया है। वो अपना कैंडिडेट उतारता है तृणमूल कांग्रेस के नाम पर। भारतीय जनता पार्टी अपना कैंडिडेट उतारेगी ही। उसके अलावा कांग्रेस भी अपना कैंडिडेट उतारेगी, लेफ्ट भी उतारेगी और मुस्लिम जो एक दो पार्टी हैं वो भी अपना कैंडिडेट उतारेगी। उन परिस्थिति में क्या ममता बनर्जी के लिए उस सीट पर जीतना आसान होगा? एक बड़ी टेढ़ी खीर है और इसको इसका उत्तर तो चुनाव परिणामों के बाद आएगा। लेकिन जो इक्वेशंस हैं और जिस तरह से वहां भारतीय जनता पार्टी बहुत अग्रेसिवली काम कर रही है, डिलीवर करके दिखा रही है। उसके बाद ऐसा लगता नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी की पॉपुलरिटी कुछ कम हो गई है। अचानक यहां कुछ इस तरह की स्थिति है। जिस तरह से दुर्गा पूजा को लेकर के प्रॉमिससेस हो रहे हैं, बातें हो रही हैं। दुर्गा पूजा से पहले चुनाव संपन्न हो जाने हैं। दुर्गा पूजा में बहुत मतलब छोटे पंडाल को ₹1 लाख तक देने की सरकार की घोषणा है और बहुत सारी चीजें हैं। उन सब के मद्देनजर क्या ममता बनर्जी सच में मुकाबले में भी रहेंगी या नहीं मुकाबले में रहेंगी? यह एक बड़ा प्रश्न है। अब लोग लोगों ने उन पर व्यंग करना शुरू कर दिया है कि वो चुनाव लड़े तो तृणमूल कांग्रेस उनके खिलाफ चुनाव में किसी को मैदान में नहीं उतारेगी। अब देखते हैं ममता बनर्जी का निर्णय क्या होता है।