By Ruby Kumari
Crow यानी कौवें सीखने की क्षमता 7 साल के बच्चे जितनी-पर्यावरण सुरक्षा में निभाते अहम रोल

कौवों को कम ही लोग पसंद करते हैं क्योंकि रंग तो काला होता ही है पर साथ ही घर और आसपाक कईं बार अपनी चोंच में भरकर गंदा कूड़ा डाल देते हैं और गंदगी फैलाते हैं पर वास्तव में सच्चाई कुछ और है, कौवे गंदगी फैलाते नहीं बलिक वातावरण में फैली तमाम तरह की गंदगी साफ करने में अहम रोल निभाते हैं और इनके कारण ही पर्यावरण काफी हद तक बचा हुआ है, कौवे का एक ही परिवार एक मौसम में ही वातावरण में फैसे लगभग 40 हजार लार्वा, कीट, आर्मीवार्म कीड़े खाकर हमारी हवा को शुद्द करता है। माना जाता है कि कौआ किसानों का सच्चा मित्र है। हवा में फैले बहुत सारे कीड़े जिन्हें माली और किसान कीट कहते हैं , खेत जोतते समय जब ये कीट और टिडडियां उन्हें खाने के लिए बाहर आती हैं तो कौवे उन्हें पलभर में चट कर जाते हैं और फसलों के नाश से पहले ही उन्हें बचा लेते हैं , इसी तरह घर के आसपास फैली कईं तरह की गंदगी जैसे सड़े गले फल , अनाज, मृत पशु को कौआ अपना भोजन बना कर गंदगी दूर करता है और पर्यावरण साफ रखने में अहम रोल निभाता है। और पक्षियों की तरह कौंवे भी बीजों को इधर-इधर फैलाने का काम करते हैं जिससे नई नई फसले, फूल- फल उगने में काफी मदद मिलती है।
एक देश जहां crow की नियुक्त किया गया सफाई कर्मचारी

यही नहीं कौवों की एक और खासियत जानकर आपको आशचर्य होगा , जी हां कईं research में पाया गया है कि कौवे दुनिया के सबसे बुद्धिमान पक्षियों में से एक हैं और म उनकी सीखने की क्षमता एक 7 साल के बच्चे के बराबर होती है। ये भी देखा गया है कि वे एक-दूसरे को देखकर , नकल करके बहुत जल्दी काम सीख लेते हैं। उनको यह भी अच्छी तरह से समझ में आता है कि किसी काम के बदले उन्हें कुछ मिल रहा है मतलब कौवे लेन-देन या रिवॉर्ड सिस्टम को बहुत अच्छे समझते हैं और आसानी से उसपर काम भी कर लेते हैं, और आपको यही जानकार आश्चर्य होगा कि कौवे के इसी व्यवहार, इसी खासियत के चलते स्वीडन जैसे एडवांस देश ने कौवों को सफाई कर्मचारी बनाया हुआ है, सुनकर आश्चर्य होगा पर ये सच है कि यहा के एक शहर में कौवों को सफाई कर्मचारी की ट्रेनिंग दी हुई है, जिनका काम है सड़क में पड़े सिगरेट के बट और कईं तरह की गंदगी को अपनी चोंच में उठाकर सड़कों पर बनी मशीनों में डालना, और जब वो इसे करते हैं तो बदले में उन्हें मशीन से खाना मिलता है , डस्टबिन की तरह इन मशीनों कौवे सिगरेट के टुकड़े डालते हैं तो उनके लिए मूंगफली बाहर निकल आती है, लेकिन यदि इसकी जगह यदि कौवे पत्थर या पत्तियों जैसा कुछ डस्टबिन में डालते हैं, तो उन्हें कोई इनाम नहीं मिलता।तो यहां पर कौवों की लेनदेन को समझने की intelligence को यूज किया जा रहा है।
घटती आबादी पर्यावरण विनाश का संकेत
पर चिंता की बात यही है कि पर्यावरण की रक्षा में लगे ये सच्चे दोस्त धीरे धीरे लुप्त होते जा रहे हैं, देश में ही विलुप्त हो रही पक्षियों की 73 जातियों में कौए भी शामिल हैं। जानकार मानते हैं कि कौओं की घटती संख्या पर्यावरण विनाश का संकेत है। इसलिए समय रहते कौओं की आबादी को बढ़ाने के उपाय ढूढने होंगे।

