Karnatka —जल्दी विवाद नहीं थमा तो Congress के हाथ से जाएगी सत्ता —BJP मौके की तलाश में

 

कर्नाटक से लगातार असंतोष की खबरें चलती रही हैं और सीद्दायरमैया और डीके शिवकुमार के बीच मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर के रस्साकशी चल रही थी, उन सबके बीच एक बार फिर कर्नाटक के लगभग 30 विधायक दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं और वो मंत्रिमंडल में फेरबदल करने की कोशिश कर रहे हैं और जिस तरह की जानकारी है उस हिसाब से वो नेतृत्व परिवर्तन के लिए भी दबाव की बात कर रहे हैं। अब इस मामले को लेकर के बहुत अनिर्णय की स्थिति रही है। प्रदेश राष्ट्रीय अध्यक्ष जो हैं कांग्रेस के मलिकार्जुन खड़गे वो कहते हैं कि ये निर्णय हाई कमांड का होगा। हाई कमांड की मुश्किल यह है कि वो सीद्दयरमैया जो जिस ओबीसी या जो जो जिस तरह का कॉम्बिनेशन उनको सपोर्ट करता है उसको नाराज नहीं करना चाहते हैं। इसलिए कि डीके शिवकुमार का सपोर्ट बेस वो उतना बड़ा नहीं है। मतलब ओबीसी वाला जो जितना बड़ा सीधा रमैया का है

D. शिवकुमार को नाराज करना मतलब पार्टी फंड की तंगी

लेकिन दूसरा पक्ष ये है कि जो फाइनशियल नीड्स हैं या जो फाइनेंशियल सपोर्ट है कांग्रेस को वो सारा कुछ डीके शिवकुमार देखते हैं और इसीलिए डीके शिवकुमार दबाव लगातार बना रहे हैं कि अब उनको ढाई साल से ज्यादा अब तो 3 साल से भी ज्यादा हो गए उनको मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए लेकिन हर बार किसी न किसी तरह से हाईकमांड इस मामले को टालने में या पोस्टपोन करने में कामयाब हो जाती है। इसका नुकसान जो है वो दो तरफ पड़ रहा है। पहला यह कि संगठन के तौर पर संगठन के तौर पर लोग दूर हो रहे हैं। दूसरा यह गवर्नेंस पर फर्क पड़ता है। जो डिलीवर करना चाहिए जो लोगों को मिलना चाहिए वो नहीं मिलता है। तीसरी मुश्किल है कि घूम फिर करके कांग्रेस जो है वो एपीज़मेंट पर आती है। उनको लगता है कि वो अपीज़ करेंगे। मुसलमानों को खुश करेंगे तो उनके लिए चुनाव निकल जाएगा। लेकिन यह जो आंतरिक विरोध है यह जो 30 लोग दिल्ली बैठे हुए हैं कुछ ऐसे लोग भी होंगे उनमें जो दिल्ली नहीं आए हैं। लेकिन वो इस बदलाव के समर्थन में है। तो इसके पहले कई सारी बैठकें हो गई केंद्रीय नेतृत्व के साथ सीद्दय रमैया और डीके शिव कुमार की बात लेकिन कोई समाधान नहीं निकला और अब जो यह है एक मामला फिर जोर पकड़ रहा है। अब देखते हैं इसमें क्या निर्णय होता है सरकार का।

 

क्या सुभाषचंद्र बोस के परपोते का जाना bjp को नुकसान

एक बड़ा डेवलपमेंट हुआ है वेस्ट बंगाल में पश्चिम बंगाल में जहां पर चुनाव 23 और 29 तारीख को है। जब चुनाव अपने बहुत उर शोर पर हैं उसके बीच चंद्र कुमार बोस हैं। ये सुभाष चंद्र बोस के परपोते हैं। मतलब उनके भाई के परिवार से उनके भाई के बच्चों के बच्चे हैं ये। इन्होंने तृणमूल कांग्रेस जाइन कर लिया है। 2023 तक
ये भारतीय जनता पार्टी में थे। 2023 के बाद से इन्होंने भारतीय जनता पार्टी की आलोचना शुरू कर दी और अब वो तृणमूल कांग्रेस ज्वाइन कर लिए। भवानीपुर से इनको चुनाव लड़ाया गया था 21 में ममता बनर्जी के खिलाफ लेकिन ये हार गए। अब यह तृणमूल कांग्रेस में आ गए और जब टिकट का नॉमिनेशन सारा कुछ फाइनल हो गया था उसके बाद आए। अब क्या इस इनके आने से ममता बनर्जी को कोई फायदा होने वाला है? क्या इतनी बड़ी ताकत है चंद्र कुमार बोस की जो माइनॉर जो बंगाली वोटर्स हैं वो एक साथ इकट्ठा हो जाएंगे या सुभाष चंद्र बोस की जो आईडियोलॉजी है उसको किसी तरह से आगे ले जाने का काम करेंगे। इसलिए कि सुभाष चंद्र बोस की आईडियोलॉजी या सुभाष चंद्र बोस का जो पॉलिटिकल पार्टी था वो फॉरवर्ड ब्लॉक था। अब वो खुद फॉरवर्ड ब्लॉक जो है एक-एक वोट के लिए मोहताज है। तो जब फॉरवर्ड ब्लॉक जो जिसकी स्थापना सुभाष चंद्र बोस ने की थी उसका राज वो राजनीतिक हासिए पर है। उसका अपना राजनीतिक भविष्य खत्म हो गया है। तो उनके परिवार का कोई व्यक्ति क्या तृणमूल कांग्रेस को कोई मदद कर पाने की स्थिति में है और कैसे कर पाएगा? एक बड़ा प्रश्न है। क्या इतना मास बेस चंद्र कुमार बोस का है कि पूरे पश्चिम बंगाल में उनके कॉल से कुछ फायदा होता हुआ तृणमूल कांग्रेस को दिखे। अगर आप लोगों से बात करेंगे पश्चिम बंगाल में तो लोग तो स्पष्ट कहेंगे कि नहीं यह सिर्फ ऑप्टिक्स के लिए तो ठीक हो सकता है। इससे आप मैसेजिंग दे दे और एक दिन के लिए हेडलाइन हो सकता है कि सुभाष चंद्र बोस के प्रपोत्र ने तृणमूल कांग्रेस ज्वाइन किया। लेकिन इसके बाद ज्यादा इसकी कोई अहमियत नहीं है। और यह स्पष्ट है और यह स्पष्ट हो भी जाएगा। एक और महत्वपूर्ण बात है कितने दिन क्योंकि अब उन्होंने भाजपा की आलोचना शुरू कर दी थी चंद्र कुमार बोस ने उसके बाद उनका तय था कि वो भाजपा छोड़ के जाएंगे जहां भी जाए तब कोई बाकी ऑप्शन है नहीं एमआईएम में जा नहीं सकते हैं हुमायूं कबीर की पार्टी में जा नहीं सकते हैं कांग्रेस बची नहीं है लेफ्ट बची नहीं है तो यही अकेला ऑप्शन था लेकिन क्या यहां से कुछ और वो कर पाएंगे चाहे उनके लिए तृणमूल कांग्रेस या वो तृणमूल कांग्रेस के ऐसा होता दिखता नहीं है।

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