Gujrat —बीजेपी के दो कद्दावर नेताओं के बीच क्यों छिड़ी जंग

गुजरात जहां , प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या अमित शाह जैसा चाहते हैं वैसा ही होता है। लेकिन अभी जिस तरह से वहां के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल और उप मुख्यमंत्री जो पहले गृह राज्य मंत्री थे प्रदेश के ही बाद में उनको प्रमोट करके उप मुख्यमंत्री बना दिया गया। इन दोनों के बीच रस्साकशी चल रही है और दो चीजें हो रही है। पहला यह जो हर्षसांघवी उप मुख्यमंत्री हैं उन्होंने अपने आप को असर्ट करना शुरू कर दिया है हर मामले में और दूसरा लोगों का भी यह मानना है कि वो अगले मुख्यमंत्री होने वाले हैं। अब एक तो हर्षसांघवी एसर्ट कर रहे हैं, दूसरा ये कि जो प्राइमा फेसी नजर आ रहा है कि वो एसर्ट तभी कर पा रहे हैं जब केंद्रीय नेतृत्व का उनको समर्थन है। तीसरा ये कि जो बीजेपी का आइडियोलॉजिकल वो है जिस तरह से गृह मंत्रालय को काम करना चाहिए वो बहुत एग्रेसिवली उस तरह से काम कर रहे हैं और जगह जगह वो आपको ऐसा करते हुए नजर आ रहे हैं। लेकिन ये सारी चीजें उनके पास पोर्टफोलियोस क्या है? होम है, सिविल एिएशन है, लॉ है, टूरिज्म है, एमएसएमई है और इंडस्ट्री सारे जो क्रीम मंत्रालय हैं वो सब उनके पास है। लेकिन ये सारी चीजें जो भी हो वो मुख्यमंत्री को रास नहीं आ रही है। और मुख्यमंत्री मामला यहां तक पहुंच गया कि मुख्यमंत्री को इस सब बात को कहने के लिए अपना दुखड़ा रोने के लिए दिल्ली भागना पड़ा और दिल्ली में उन्होंने अपने मन का हाल केंद्रीय नेतृत्व को बताया। अब केंद्रीय नेतृत्व ने उनकी कितनी बात सुनी, क्या हुआ, क्या आगे होगा, यह नहीं अभी स्पष्ट नही है। लेकिन गुजरात में चीजें बहुत स्मूथ नहीं है। हालांकि वहां चीजें स्मूथ या खराब या विद्रोह जैसा स्थित नहीं होगा। अचानक कोई बदलाव हो जाएगा और शायद यह भी हो सकता है ।

Maharashtra——एकनाथ शिंदे अब CM बनकर ही मानेंगे क्या

Eknath Shinde | PTI

 

बीजेपी के मुख्यमंत्री की बात हो रही है। महाराष्ट्र में अलायंस पार्टनर सब अपने मुख्यमंत्री पद को एक बार फिर मांगने लगे हैं। शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी में चुनाव के बाद से ही इस बात को लेकर के लगातार विवाद कह लीजिए, रस्साकशी कह लीजिए, मनमुटाव कह लीजिए। जारी है कि एकनाथ शिंद को मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया और देवेंद्र फडनवीस मुख्यमंत्री बन गए। पिछले टेन्योर में देवेंद्र फडनवीस उप मुख्यमंत्री थे और एकनाथ शिंद शिवसेना के मुख्यमंत्री थे। लेकिन इसको उल्टा कर दिया गया। लेकिन जब से इसको बदलाव किया गया बेमन से शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंद ने इसको स्वीकार तो कर लिया बेमन से या दबाव से लेकिन अब वो अपने आप को असर्ट करने लगे हैं या उनकी पार्टी असर्ट करने लगी है। उसके पीछे कारण कई सारे हैं। कारण यह है कि शिवसेना शिंदे का महाराष्ट्र में प्रभाव है बढ़ा ही है। उसके अलावा लेजिस्लेचर मतलब संसद में भी उनके एमएलए बढ़ गए हैं। सात जो है उनके अपने जीत के आए थे 2024 के उसमें और छह जो शिवसेना उद्धव बाला साहब ठाकरे थे उसके अब इनके साथ जाइन कर लिए हैं। तो 13 सांसद इनके हो गए हैं संसद में , और लगभग 20 के आसपास 19 या 20 के आसपास विधायक जो हैं वह संपर्क में हैं शिवसेना के साथ और वो भी साइड बदलना चाहते हैं। तो कुल मिलाकर के जो स्थिति है उससे यह है कि क्योंकि शिवसेना और मजबूत हो गई है तो वह अब यह चाह रही है कि उसको उसका जो पुराना स्थान है वो दिया जाए। शिवसेना को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी दी जाए और शिवसेना के नेताओं का यह कहना है कि देवेंद्र फडनवीस को जब रीसफल हो तो उसमें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया जाए और उनके लायक उपयुक्त जो भी मंत्रालय है उनको दिया जाए। मतलब यह कि शिवसेना भारतीय जनता पार्टी के किसी बड़े नेता का महाराष्ट्र में इंटरफेरेंस भी नहीं चाहती है। और क्योंकि एकनाथ शिंद का केंद्रीय नेतृत्व के साथ विशेष रूप से प्रधानमंत्री के साथ इक्वेशन ठीक है और इस तरह की मांग लगातार हो रही है। अब इस पर सहमति बनेगी कि नहीं बनेगी इसलिए कि देवेंद्र फडनवीस जो है वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ब्लू आउट आई बॉय हैं और वो उनको रिप्लेस नहीं करना चाहती है। तो यह एक स्थिति बनी रहेगी।

चुनाव आयुक्त किया अपनी बेटी की वजह से ज्यादा फंसे

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार लगातार मुश्किल में हैं। जब से उनके विभाग के बारे में खबर आई कि लगभग 10 महीने में 14 मामलों पर असहमति दो अलग जो चुनाव आयुक्त हैं संधू साहब और विवेक जोशी साहब इन्हने असहमति जताई लेकिन उसके बाद भी निर्णय हुआ। हालांकि इस मामले में जो चुनाव आयोग है उसने अपनी एक सहमति उसने अपनी एक प्रेस ब्रीफिंग में बता दिया कि जितने भी निर्णय हुए हैं असहमतियों के बावजूद सारे के सारे निर्णय यूनानिमस हुए हैं। एक मत से हुए हैं। तो यह विवाद खड़ा करना कि चुनाव आयोग में कोई डिफरेंसेस हैं। कोई मामला ऐसा है जो है लेकिन इन सब मामले को लेकर के उनको लगातार घेरा जा रहा है। अब अलग-अलग राजनीतिक दल कोई कह रहा है कि उनकी गिरफ्तारी होनी चाहिए। कोई कह रहा है कि उनकी वो हटाया जाना चाहिए। कोई कह रहा है कि जितने चुनाव पिछले दिनों हुए हैं वो सबको कैंसिल करके फिर से कराए जाने चाहिए पुराने एसआईआर पर। एसआईआर प्रक्रिया को लेकर के है। अब मैंने बहुत सारी चीजें कही है कि एसआईआर प्रक्रिया में अगर दिक्कत है तो केवल बीजेपी क्यों जीती? तमिलनाडु के रिजल्ट्स कुछ और हैं। उसके अलावा बहुत सारे और प्रदेशों के रिजल्ट भी अलग हैं। तमिल, केरल के रिजल्ट्स कांग्रेस के पक्ष में गए हैं। तो ये दूसरा प्रश्न है। लेकिन बहुत सारी चीजें हैं जिसको लेकर के लगातार ज्ञानेश कुमार जो है वो घेर रहे हैं और इस तरह का मौका विपक्ष को चाहिए भी होता है और सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ इस तरह की बात कही है जहां पर ये कहा है कि सुप्रीम कोर्ट सरकार को कहा है कि सरकार जो है वो अपने अंपायर अंपायर खुद नहीं चुन सकती क्रिकेट की भाषा में बताने की कोशिश की है। लेकिन दूसरी तरफ ज्ञानेश कुमार की जो बेटी हैं यूपी कैडर की आईएएस हैं और अभी गौतम बुध नगर की जिलाधारी हैं। उनको सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली जो हाई कोर्ट ने उनको एक प्रोटेस्ट मामले में उनकी सैलरी से 5 ₹ लाख काटने की बात कही थी। उसको सुप्रीम कोर्ट ने स्टे कर दिया है। अब ये दो स्थितियां ऐसी हैंजहां पर परिवार जो है वो मुश्किल में नजर आ रहा है। ज्ञानेश कुमार पर लगातार हमले किए जा रहे हैं और उन पर पक्षपात का आरोप लग रहा है। तो और यह मामला अभी लंबा खींचने वाला है। दोनों मामला लेकिन एक में फरी तौर पर राहत मिली है। दूसरे में मामला एस्केलेट करता हुआ दिख रहा है।

UP —मायावती का खेला क्या BJP को फायदा पहुंचाने की मुहिम

एक उत्तर प्रदेश की बात करें तो बहुजन समाज पार्टी में लगातार उथल-पुथल वाली स्थिति है। अब सबको मालूम है कि आकाश आनंद को लेकर के या दिव्या जो उनकी भतीजी हैं उसको लेकर के उन्होंने कुछ बातें कही हैं। लेकिन असली मामला ये है। उन्होंने अपना एक आनंद कुमार के बेटे ईशान को अपना उत्तराधिकारी बना दिया है। अ ये जो है जो ये फ्लिप फ्लॉप चल रहा है इस फ्लिप फ्लॉप में अ क्या मतलब मायावती पर ये आरोप लग रहा है अ कि वो इन सब के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी को बेनिफिट करने की कोशिश कर रही है इसलिए कि उनका वोटर अगर एकजुट हो ही नहीं पाएगा तो बात कैसे बनेगी ईशान आनंद को लेकर के जो उन्होंने फैसला किया है उसके बाद ऐसा कहा जा रहा है और यह अंदरखाने चर्चा में है। चाहे वह आप कांग्रेस के किसी अंदर के व्यक्ति से बात कीजिए, समाजवादी पार्टी से या किसी और पार्टी से सबका यह मानना है। सब ये कह रहे हैं कि ये मायावती की मिलीभगत है वोटर्स को डिवाइड रखने की और विशेष रूप से दलित वोटर्स की और एक सेक्शन ऑफ मुस्लिम। इसलिए कि कुछ मुस्लिम वोटर बहुजन समाज पार्टी को वहां पर वोट देंगे जहां पर मुस्लिम कैंडिडेट को खड़ा करेंगी। तो इन परिस्थिति में क्या मायावती की भूमिका केवल मुस्लिम वोटर और दलित वोटर को डिवाइड करके भाजपा को फायदा पहुंचाने की रह गई है। अ कांग्रेस कांग्रेस समाजवादी पार्टी और बाकी और राजनीतिक दलों के आरोप में कितनी सच्चाई है इसका जवाब तो समाजवादी इसका बहुजन समाज पार्टी जब होगा तब देगी और जब कोई सीधे प्रश्न करेगा तो उसका उत्तर भी निकल कर के आएगा लेकिन चुनाव से पहले किसी भी राजनीतिक दल में हालांकि समाजवादी पार्टी में भी बहुत सारे फ्लिप फ्लॉप हो रहे हैं लेकिन संगठन के तौर पर ऐसे निर्णय या ऐसी स्थिति कहीं नहीं नजर आ रही है।