पानी से जूझती दुनिया पर एक लीटर बियर बनाने में 160 लीटर तक पानी लगने वाला धंधा फलफूल रहा
दुनिया भर में पानी का संकट बढता जा रहा है, और अगर यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं कि पीने के पानी के स्रोत ही कम पड़ जाएंगे और दुनिया में पेट्रेल से भी ज्यादा महंगा बिकने लगेगा पानी, लेकिन इन सब हालातों के बीच कुछ जानकरियां हैरान भी करती हैं और परेशान भी, जी हाँ आजकल आधुनिक लाइफ स्टाइल में जहां बीयर का सेवन एक फैशन बन गया है और युवा वर्ग का हाल ये है की बियर के बिना उनकी कोई पार्टी नहीं होती, पर बीयर को पीने में जहां एक मिनट भी नहीं लगता वहीं एक लीटर बियर बनाने में 155 से 160 लीटर तक पानी लग जाता है , सोचिए 160 लीटर पानी कितने प्यासे लोगों की प्यास मिटा सकता है।
मेसोपोटामिया में शुरूआत हुई बियर बनाने की या गोडिन टेपे बस्ती- अब आधुनिक ईरान
वैसे हमारे culture में बियर की जरूरत क्यों पडी। माना जाता है कि बीयर की उत्पत्ति 7,000 साल से भी ज़्यादा पुरानी है और यह उन जगहों, उन समुदाय और समाजों में विकसित की गई जहां शुद्ग पानी पहुंचना मुश्किल था या था ही नहीं। प्राचीन समय में लोग सुरक्षित जल ना मिलने के कारण के बीयर पीते थे। अनाज के प्राकृतिक फर्मेंटेशन से बियर जैसा ऐसा पेय बनाया जो दूषित स्थानीय जल स्रोतों की तुलना में पीने के लिए सुरक्षित था। साथ ही इसका सेवन आनंद भी देता था जिससे यह लोगों का मनपसंद पानी भी बन गया। रिसर्च बताती है कि बीयर का सबसे पहला आनंद प्राचीन मेसोपोटामिया में लिया गया था। एक थ्योरी यह भी बताती है कि कि बियर बनाने का काम गोडिन टेपे बस्ती (जो अब आधुनिक ईरान में है) में 10,000 ईसा पूर्व से ही शुरू हो गया था, इसके नशीले प्रभाव के कारण वे इसे “ दिव्य पेय ” कहते थे।
धान की फसल में लगता अत्याधिक पानी तो उसे बताने के लिए कईं उपाय पर बीयर का करोबार जोरों पर
पर लगता है कि इतिहास वापस आ रहा है और अब लोगों के सामने शुद्ध पानी का संकट फिर खड़ा हो गया है, कारण पानी का अति दोहन और दुरुपयोग , माना जाता है कि बियर में 95 फीसद पानी होता है। 2009 के सर्वेक्षण से पता चला है कि लंदन स्थित SABMiller Brewery एक लीटर बीयर बनाने के लिए 155 लीटर पानी की खपत करती थी। भारत में एक लीटर बीयर बनाने में पानी की कितनी खपत होती है यह आंकड उपलब्घ नहीं है। लेकिन SABMiller Brewery के आंकडे से इसका अनुमान लगाया जा सकता है। इसी तरह आधा लीटर सोडा बनाने में 170 से 310 लीटर या 45 से 82 गैलन पानी लगता है, यह बड़े आश्चर्य की बात है कि अधिक पानी लेने के कारण धान की खेती को नियंत्रित कर फसलों के विविधीकरण की बात हो रही हैं। क्योकि, एक किलो धान पैदा करने में अधिकतम 4000 लीटर पानी लगता है लेकिन जौ और मक्के से भी बनाई जाने वाली बियर का निर्माण कम किया जाए इस तरफ किसी की सोच नहीं जा रही है।, बड़ा सवाल यही है कि अगर पानी की अधिक खपत के कारण धान की फसल को बोने को motivation नहीं मिल रहा तो फिर ऐसा बियर के साथ क्यों नहीं हो रहा , कारण साफ है , बीयर पर प्रतिबंध या निर्माण कम करने का मतलब है सरकार को कमाई में भारी नुकसान।
सरकर को मिलता है भारी मुनाफा
मद्यनिषेध एवं आबकारी विभाग के अनुसार साल 2023-24 में शराब पर टैक्स से सरकार को 45 हजार करोड रुपये से अधिक की कमाई हुई। जो साल 2022-23 से 1,734 हजार करोड़ अधिक है। यह कमाई सिर्फ बीयर पर नहीं है बल्कि, शराब के कुल कारोबार पर वसूला गया टैक्स है। राज्यों को अपने कुल राजस्व का 10 प्रतिशत शराब पर टैक्स से मिलता है। जबकि, किसी भी अन्य फसल की तरह सरकार को धान 2200 रुपये प्रति कुटल की दर से खरीदना पडता है। मतलब, एक तरफ सरकार को कमाई है तो दूसरी तरफ खर्च। तो सरकार बीयर पर प्रतिबंध लगाकर कमाई कैसे छोड सकती है। यहां सरकार यह कह सकती है कि वसूले गए टैक्स से ही तो फसल खरीदी जाती है। तो यहां सवाल यह भी विचारणीय है कि बीयर जरूरी है कि जल। 2022 में भारत में दो अरब लीटर से अधिक बीयर की खपत हुई। अनुमान है कि 2025 तक देश में बीयर की खपत करीब 3.4 अरब लीटर तक पहुँच गई थी, 2017 से 2025 तक बीयर की खपत में करीब तीन प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर का अनुमान लगाया गया है।
