UP -अखिलेश को समझ आ गया राहुल के बिना गुजारा नहीं
जब कांग्रेस औरसमाजवादी पार्टी के प्यादे आपस में लड़ते हुए दिख रहे थे। उस बीच कांग्रेस के लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और लोकसभा में ही समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव की एक गुपचुप मीटिंग हुई और वो मीटिंग जिस दिन राहुल गांधी प्रधानमंत्री के आवास का घेराव करने वाले थे उसके एक दिन पहले हुई राहुल गांधी के आवास पर। उस बैठक में प्रियंका गांधी भी मौजूद थी और उस बैठक में मोटे तौर पर यह निश्चित हो गया कि जो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का अलायंस है वो किस तरह से लोकसभा का विधानसभा का चुनाव उत्तर प्रदेश में लड़ने वाला है। मोटे तौर पर समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव को फ्री हैंड दिया गया है और उनसे जो मजबूत और बेहतर सीटें हैं उनको पहले लिस्ट करने के लिए किया कहा मतलब लिस्ट करने की जिम्मेदारी उनको सौंपी गई है और उसके बाद फिर कैंडिडेट्स पर चर्चा होगी और फाइनललाइज होगा और इस बात की भी जिम्मेदारी या इस बात का भी कमिटमेंट दोनों नेताओं की बातचीत में हुआ है कि समाजवादी पार्टी कांग्रेस के लिए एक रिस्पेक्टफुल सीटें छोड़ेगी जिससे कि विधानसभा का चुनाव जीता जा सके। अब एक और महत्वपूर्ण बात है जो निकल कर के आई वो ये कि इस चर्चा के दौरान यह भी बात निकल कर के आई और दोनों नेताओं ने मोटे तौर पर स्वीकृत किया कि बावजूद इसके zen g का प्रदर्शन हुआ या और बहुत तरह से सरकार को केंद्र सरकार को घेरा जा रहा है। लेकिन उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी कमजोर होती हुई नहीं दिख रही और यही अखिलेश यादव और राहुल गांधी की चिंता का विषय है और इसी कारण से दोनों नेता साथ आकर के चुनाव लड़ने के लिए आए हैं ,पहले दोनों नेताओं के दोनों पार्टियों के नेता आपस में झगड़ते हुए नजर आए और एक और बात जो इस बैठक में निकल कर के आई दोनों पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस बात पर सहमति बताई जताई कि दोनों दल अपने-अपने जो प्रवक्ता आउट ऑफ टर्न या जिनकी जिम्मेदारी भी नहीं है, वह जाकर के बयानबाजी कर रहे हैं। जिससे जिससे जो अलायंस है या पार्टी है उसकी छवि खराब हो रही है और एक ये मैसेज जा रहा खराब जा रहा है कि ये दोनों दल आपस में लड़ते हुए नजर आ रहे हैं। जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है कम से कम तब जब 2027 के चुनाव की तैयारी में दोनों राजनीतिक दल लग गए हो। लेकिन यह जो सीट को लेकर के सहमति बनती हुई नजर आ रही यह एक बड़ा कदम है दोनों राजनीतिक दलों की दृष्टि से।
धर्मेंद्र प्रधान क्या UP की कमान संभालने वाले

धर्मेंद्र प्रधान को सीजेपी जो कॉकरोच जनता पार्टी का विरोध प्रदर्शन था उस विरोध प्रदर्शन के बाद उनको त्यागपत्र देना पड़ा। उन्होंने बहुत हाई मोरल ग्राउंड लेने की बात की। लेकिन शिक्षा मंत्रालय का हाल सबसे खराब मंत्रालयों के उसमें आंका जा रहा था और ऐसा नहीं था कि हाल फिलहाल धर्मेंद्र प्रधान को जिम्मेदारी दी गई है। अभी बहुत सारे मामले हैं जो खुले भी नहीं है जिन पर बाद में चर्चा होगी शायद कभी और लेकिन बहुत सारे ऐसे मामले थे जिस पर नाराजगी थी और केवल बाहर के या विपक्षी दलों की नाराजगी नहीं थी। बहुत सारे संघ के कार्यकर्ता जो छोटे थे जिनकी पहुंच ऊपर नहीं थी उनको नजरअंदाज किया जा रहा था। लेकिन धर्मेंद्र प्रधान कद्दावर नेता हैं। मंत्री बनने से पहले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं। उड़ीसा से आते हैं। उड़ीसा में पहली बार विधानसभा में सरकार आई है। प्रदेश में पहली बार सरकार आई है। अलायंस के साथ अच्छी सीटें जीतते रहे हैं। इस बार अकेले दम पर अच्छी सीटें जीती हैं। तो अचानक धर्मेंद्र प्रधान को दूध की मक्खी की तरह से निकाल देना भी उचित नहीं होगा। ओबीसी वर्ग को रिप्रेजेंट करते हैं। तो निश्चित तौर पर धर्मेंद्र प्रधान का रिहबिलिटेशन तो होना तय है। अब रिहबिलिटेशन सरकार में तो निश्चित तौर पर नहीं होगा। इसलिए कि सरकार में होगा तो फिर विरोध प्रदर्शन शुरू हो सकते हैं और सरकार को भी मोरल तौर पर ऐसा करने पर लोग आईना दिखा सकते हैं। तो वैसा नहीं हो होगा तो होगा क्या? क्या जिम्मेदारी दी जा सकती है? संगठन में उनको भेजा जा सकता है। महासचिव थे। फिर उनको महासचिव बनाया जा सकता है। महत्वपूर्ण चुनावी प्रदेशों में जैसे उत्तर प्रदेश। उत्तर प्रदेश में उन्होंने बहुत अच्छा पिछली बार जब जिम्मेदारी दी गई थी किया गया था तो इस बार फिर उनको उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी जा सकती है। पांच प्रदेशों के चुनाव 2027 में होने हैं। पंजाब भी उसमें है। हालांकि पंजाब में भारतीय जनता पार्टी की हालत बहुत पतली है। धर्मेंद्र प्रधान या कोई वहां क्या कर पाएगा ये तो मतलब डिबेट का मामला है। लेकिन उत्तर प्रदेश में सेवाएं दी जा सकती है। महासचिव बनाया जाना भी इतना मुश्किल काम इसलिए भी नहीं है कि अभी नितिन नवीन की टीम जो है वह घोषित होनी है और नितिन नवीन का परफॉर्मेंस इस तरह का नहीं है कि उनके दम पर चले तो सारा काम अलग-अलग जो महासचिव हैं उन्हीं के माध्यम से कराया जाएगा।
Modi के सामने क्या है इस बार संसद में बड़ी चुनौती

सरकार किसी भी कीमत पर डीलिमिटेशन बिल पास कराना चाहती है। अबकि डीलिमिटेशन बिल और बाकी जो वुमेन रिजर्वेशन बिल है ये पिछली लोकसभा में ही पास हो गए थे। लेकिन वह इस तरह से उनका स्ट्रक्चर था कि चुनाव जो बढ़ी हुई लोकसभा में वह 2034 से पहले नहीं हो पाएंगे। मतलब जो वुमेन रिजर्वेशन है वो 34 के लोकसभा चुनाव से पहले लागू नहीं हो पाएगा। इसको लेकर के भी सरकार की आलोचना हुई और सरकार को भी लगा कि ये मामला बहुत दूर तक जा रहा है तो उससे पहले ही इसका समाधान किया जाना चाहिए और इसीलिए डीलिमिटेशन बिल को पास कराने के लिए सरकार लगातार प्रयत्नशील है वो इसलिए कि डीलिमिटेशन बिल पिछली बार जब प्रेस किया गया तो वो गिर गया। समर्थन नहीं था क्योंकि संविधान संशोधन बिल है इसलिए 3/4 बहुमत चाहिए। राज्यसभा में किसी तरह से वो मैनेज हो जाएगा। लेकिन लोकसभा में कैसे मैनेज होगा ये एक बड़ी समस्या है। अब उसके लिए लगातार कोशिश सरकार की तरफ से की जा रही थी। चाहे वो तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों को मिलाने की बात हो। जो शिवसेना उद्धव बाला साहब ठाकरे हैं उनके छह सांसदों का शिवसेना में आ जाना। इसके अलावा जो समाजवादी पार्टी के कुछ सांसदों के साथ सरकार के जो फायर फाइटर्स हैं उनका संपर्क में होना। इसके अलावा जो डीएमके के सांसद हैं उनसे समर्थन मांगना अगर वो समर्थन नहीं करते हैं तो एस्टेन का जैसी स्थिति आना। तो कुल मिलाकर के कोशिश ये है कि 366 जो रिक्वायर्ड नंबर है उसको मीट किया जाए और अगर वो नहीं हो पाता है तो ऐसी स्थिति बनाई जाए जहां बहुत सारे लोग बड़ी संख्या में अबस्टेन हो जाए जिसके कारण जो नंबर संख्या है 366 वाला ये नीचे आ जाए और वो जो टू थर्ड मतलब दो तिहाई बहुमत का मामला होता है वो किसी तरह से पूरा हो जाए और यह बिल पास हो जाए। सरकार किसी भी कीमत पर इस बिल को पास करा करके और जो बढ़े हुए आरक्षण के साथ और बढ़ी हुई सीटों के साथ 2029 का चुनाव लोकसभा का कराना चाह रही है। 26 है 27 28 29 मतलब अब लगभग ढाई साल का 3 साल का समय मान लीजिए 3 साल से थोड़ा कम का समय बचा हुआ है। तो उसके पहले सरकार ना केवल बिल इसलिए कि बिल केवल पास होना उस समस्या का या उस मामले का समाधान नहीं है। बिल पास होने के बाद उसमें बहुत सारे डिटेल कानून है वह होंगे। वह सब उसको लागू किया जाएगा। मतलब उसमें प्रेसिडेंट की संस्तुति और ये सारी चीजें होंगी और एक-एक डिटेल कैसे कहां क्या कौन से सेक्शन किसके तहत क्या किया जाएगा। वो पूरी डिटेल जैसे 370 या बाकी और सारी चीजों में वक्त को लेकर के सारी डिटेल बनी तो वह सारी चीज़ें होना अभी अह होना होनी है। इसलिए उसमें टाइम लग सकता है। तो बिल का अभी पास होना जरूरी है। तो उस बिल को पास करने के लिए सरकार एक स्पेशल सत्र 16 अगस्त से 18 अगस्त के बीच बुला सकती है और वहीं पर इसको पास करा दिया जाएगा।
सरकार बदली तो राज्यों में अब आ रहा है पैसा और विकास भी
केरल , कर्नाटक , बंगाल में नेतृत्व बदलाव हुए हैं। केरल में जो है लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की सरकार से अब यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार कांग्रेस के नेतृत्व वाली बनी है। कर्नाटक में सीधा रमैया की जगह डी के शिवकुमार मुख्यमंत्री बने हैं। कांग्रेस की सरकार है पहले से जीती हुई पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की जगह भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है। अब यहां पर तीनों प्रदेशों में मुख्यमंत्री नए दो जगह पर पार्टियां भी बदली है। लेकिन इन तीनों जगहों पर इन्वेस्टमेंट का माहौल बेहतर हुआ है। अब इन्वेस्टर्स जो हैं निवेशक जो है यहां इंटरेस्ट दिखा रहे हैं। केरल जो लेफ्ट डेमोक्रेटिक सरकार थी वहां पर कांग्रेस आई है। लेफ्ट की जो सरकारें जहां पर होती हैं वहां पर इन्वेस्टर जाने से बचता है। तो, हालांकि वहां पर आगे क्या होगा कुछ नहीं कह सकते, लेकिन, फिर भी कांग्रेस की सरकार आने के बाद वहां इन्वेस्टर्स ने अपना मन बदलना शुरू कर दिया है। कर्नाटक की बात करते हैं। कर्नाटक में तो कांग्रेस की ही सरकार थी। लेकिन, कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद जिस तरह से लॉ एंड ऑर्डर को लेकर के या जिस तरह की राजनीति सीता रमैया कर रहे थे, वहां पर बड़ी कॉस सी सिचुएशन थी। और कॉस वाली सिचुएशन में भी कोई इन्वेस्टर नहीं जाना चाहता है। इन्वेस्ट नहीं करना चाहता है। डीके शिव कुमार के आने से वो माहौल बदला है। माहौल इस दृष्टि से भी बदला है कि डीके शिवकुमार इन्वेस्टर फ्रेंडली आदमी है। खुद बिजनेसमैन और बाकी बिजनेस को लेकर के उनके जो उनका जो दृष्टिकोण है वो बड़ा पॉजिटिव है। तो ये भी एक बड़ा बदलाव है। तो कर्नाटक में भी इन्वेस्टमेंट आ रहा है। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव पश्चिम बंगाल में है। पश्चिम बंगाल में लंबे समय के बाद पहले लेफ्ट फ्रंट की सरकार उसके बाद तृणमूल कांग्रेस की सरकार लेफ्ट फ्रंट इंडस्ट्री और इन्वेस्टमेंट फ्रेंडली नहीं होती है और तृणमूल सरकार भी लगभग उसी ढर्रे पर चल रही थी और उसमें कोड में खाज वाली स्थिति ये थी कि लॉ एंड ऑर्डर जो है वो तृणमूल कांग्रेस की सरकार में और चौपट हुआ था। उसमें बड़ा ड्रास्टिक चेंज हुआ है जब से शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बने हैं। तो ये पश्चिम बंगाल के लिए बड़ी पॉजिटिव खबर है और लगता है कि पश्चिम बंगाल में निवेश आएगा और पश्चिम बंगाल भी हालात अपने बदलेगा बाकी स्टेट्स की तरह देश में।
