एक बार फिर अखिलेश यादव को उनकी पत्नी की बेज्जइती पर चुप रहने के लिए घेरा -किसने ?

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर और योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री उन्होंने अखिलेश यादव पर आजकल लगातार हमलावर बोल रखा है। अब वह चाहे जाति के नाम पर जिस तरह की बातें अखिलेश यादव कहते हैं उसके बारे में बोला है कि अखिलेश यादव को अब जाति के नाम पर बंटवारा बंद करना चाहिए और जाति के नाम पर जैसे ही चुनाव नजदीक आता है वह जातियों की बात करने लगते हैं और जाति के नाम पर वोट मांगने की कवायद शुरू कर देते हैं। महिलाओं को लेकर के भी उन्होंने बहुत जोरदार हमला किया। उन्होंने बोला कि जो व्यक्ति अपनी पत्नी के रिस्पेक्ट या पत्नी की इज्जत पर अगर जिस तरह से उनके ऊपर हमला बोला था एक मुस्लिम नेता ने, जब वो पार्लियामेंट के सामने की एक मस्जिद में गई थी तो उनके कपड़े पर किसी मौलाना ने कमेंट किया था उसको बचाने या डिफेंड करने की बजाय, राजभर ने कहा कि जब वो अपनी पत्नी के पर हुए हमले उनके बारे में की गई गलत बयानी के बारे में कोई जवाब नहीं दे पाए तो वो सामान्य महिला के हित की उनके अस्मिता की उनके इज्जत के लिए कब बोलेंगे और कैसे बोलेंगे ये एक डाउटफुल मामला उनको लगा कि ये अखिलेश यादव के बस का नहीं है और इस बीच योगी आदित्यनाथ तो लगातार हमलावर हैं ही लेकिन लेकिन जो एक ओबीसी नेता के नाते एक जो छवि है ओम प्रकाश राजभर की विशेष रूप से जो गोंडा बहराइच के आसपास वाला इलाका है वहां पर अच्छी खासी साख है अच्छी खासी पैठ है ओम प्रकाश राजभर की तो उस दृष्टि से अगर वो लगातार हमलावर रहेंगे अखिलेश पर तो अखिलेश का जो पी पीडीए का जो फंडा है हालांकि उस पीडीए पर ही अब ओबीसी के नेता ही हमला कर रहे हैं। इसलिए कि पीडीए की डेफिनेशन हर रोज अखिलेश बदलते हैं। उसमें पिछड़ा को कभी पंडित बना देते हैं। पिछड़ा को कभी और कुछ बना देते हैं। योगी आदित्यनाथ ने तो बोला कि पंडित भी उन्होंने बना दिया है । तो अब वो उन्होंने बोला कि कुछ दिन बाद इसको पाकिस्तान भी बना देंगे। तो यह एक बड़ा मसला है जिसको जिसको लेकर के अखिलेश पर ओम प्रकाश राजभर हमला और अगर ओबीसी के नेता मतलब पिछड़े नेताओं के बीच में अगर इस तरह की का मैसेज पिछड़े नेताओं के माध्यम से ही जाएगा तो अखिलेश यादव के लिए 2027 का चुनाव मुश्किल होने वाला है।

IAS दिव्या मित्तल का त्यादपत्र और राहुल गांधी से मुलाकात ?

यूपी में ही 2013 बैच की आईएएस दिव्या मित्तल, त्यागपत्र दे दिया है। अब त्यागपत्र के बाद जिस तरह की इमोशनल बात की उन्होंने तो कयास यही लगाए गए कि वह चुनाव लड़ेंगी। चुनाव कहां से लड़ेंग यह लेकर के भी बहुत संदेह था। इसलिए कि वह हैं हरियाणा की। अब उत्तर प्रदेश में किस विधानसभा से वह चुनाव लड़ना चाह रही हैं। लेकिन जिस तरह से मां विंधवासनी के बारे में उन्होंने लगातार बातें कही उससे यह लगा कि शायद वो मिर्जापुर से चुनाव लड़ना चाह रही हैं। अब मां विंधवासनी की के बारे में बात करना अपना वो मतलब एक सॉफ्ट स्टैंड दिखाना तो लगा शायद वो भाजपा से चुनाव लड़े और चुनाव से पहले उनका त्यागपत्र देना उसी दृष्टि से माना जा रहा है। लेकिन इस बीच पूरे मामले में दूध में नींबू डालने वाला काम हो गया। जब उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता जो प्रशांत उमराव हैं उन्होंने सोशल मीडिया पर इनकी खिंचाई कर दी। उसमें इन्होंने सीधे तौर पर यह कहा कि जो दिव्या मित्तल हैं वो लगातार पावर में बने रहना चाहती हैं और इसीलिए उन्होंने त्यागपत्र दिया और चुनाव त्यागपत्र से एक दिन पहले उनकी गुपचुप जो है वो राहुल गांधी से मुलाकात होती है और वो राहुल गांधी का एजेंडा फैलाने के लिए और राहुल गांधी की बात करने के लिए इस्तीफा दिया और जो भी चाहे केंद्र के फ्लैट फ्लैकशिप प्रोजेक्ट हो चाहे उत्तर प्रदेश सरकार का फ्लैकशिप प्रोजेक्ट हो। विशेष रूप से हर घर नल वाला मामला उसमें एक घर में मिर्जापुर के एक गांव में पानी की समस्या के कारण वहां लगभग 1500 1200 के आसपास ऐसे लोग थे जो जिनका जिनकी शादी तक नहीं हो पाई। ये खबर उत्तर प्रदेश की सरकार की उपलब्धि की बजाय दिव्या मित्तल की उपलब्धि के रूप पर और यही आरोप है उमराव का कि इनके पति जो हैं जिन जो पहले वो भी सिविल सर्विज में थे उन्होंने त्यागपत्र दे दिया और अब एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं और वहां से पैसे बना करके ये एक पीआर का काम कर रहे हैं अपनी पत्नी के लिए और अब एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा या राहुल गांधी के एजेंडे को फैलाने के लिए ये सब किया जा रहा है। अब उन्होंने यह भी कहा कि डीएम के बाद यह शायद कमिश्नर बनना चाहती थी इसलिए इन्होंने जॉइंट सेक्रेटरी का पद अस्वीकार कर दिया। अब यह सारी बहुत सारी चीज़ें हैं। लेकिन निश्चित तौर पर जो एक सामान्य त्यागपत्र वाली थी जहां आजकल ब्यूरोक्रेट्स बहुत सारे त्यागपत्र दे रहे हैं।

TMC के विद्रोही सांसदों को खतरा साथ ही NDA भी परेशान होगा ही

तृणमूल कांग्रेस के जो रेबल 20 सांसद हैं उनकी मुश्किलें अभी रुकी नहीं है। अभी उनका मामला एक तो दलबदल कानून के कारण अदालत में है। उसके अलावा अभी स्पीकर ने भी इस पर कोई कॉल नहीं लिया है। अब वो उन लोगों ने जो जो पार्टी ज्वाइन की है उसको उसको लेकर के भी बहुत सारे कॉम्प्लिकेशंस हैं। लेकिन क्या स्थिति होगी क्या नहीं होगी इस सब के बीच जो इन इस रेबल गुट की लीडर थी काकोली घोष दास्तेदार उनके बेटे ने एक और पार्टी लांच कर दी है जिसका नाम है बहुजन नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया बी एनसीपीआई ,अब ये अनाउंस तो उन्होंने कर दिया है इसके पीछे पीछे मंशा ये है कि जो ये लोग 20 सांसद जो चले गए थे एक नेशनलिस्ट सिटीजन पार्टी ऑफ इंडिया और एनडीए के साथ जुड़ गए थे। अब ये स्थिति ऐसी है कि इस पूरे मामले से निजात दिला दिलाने के लिए हालांकि इस मामले पर दो जो सांसद हैं उन्होंने विरोध दर्ज किया था कि यह बिना उनको बताए ऐसा क्यों किया गया। लेकिन बाद में उनको समझाया गया कि एक टेक्निकल मामला है और यह सारी कोशिश सदस्यता बचाने के लिए की जा रही है। सुदीप बंदोपाध्याय और शताब्दी रॉय ने इस पर विरोध दर्ज कराया था कि उनको बिना संज्ञान में लिए इस तरह का इस तरह की पार्टी क्यों लांच की गई थी। अब इसमें मसला यह है कि इस बीच में तीन मुस्लिम सांसद हैं। अब ये तीनों मुस्लिम सांसद जो है वो भारतीय जनता पार्टी के साथ किसी भी गठबंधन पर उनको दिक्कत है और एनडीए के साथ वह बैठना भीनहीं चाह रहे हैं। वह किसी एनडीए की मीटिंग में गए भी नहीं। जो तीन मीटिंग इन लोगों की अभी प्रधानमंत्री के साथ हुई है। प्रधानमंत्री जब मिलते रहते हैं, अपने एनडीए के जो समर्थक दल हैं तो ये उनमें गए भी नहीं। इस बीच ये सारा का सारा जो मामला है घूम फिर करके वही आ रहा है। इसलिए कि आज नहीं तो कल अगर अगर अदालत से इनके खिलाफ कोई निर्णय आता है या कोई स्थिति आती है तो इनको बाय इलेक्शन में जाना पड़ेगा। बाय इलेक्शन में अभी तक भाजपा की तरफ से इनका कोई कमिटमेंट है नहीं कि इनको चुनाव में भाजपा टिकट देगी या कैसा हाल  होगा। तो इसलिए अभी कम से कम ये कोशिश की जा रही है कि किसी तरह से इनकी सदस्यता बरकरार रखी जाए। सदस्यता बरकरार रहेगी तभी जो है इनका फायदा है संसद में होने का और ये सारी कवायद उसी दृष्टि से की जा रही है।