अखिलेश PDA पिछड़ा कैसे बन गया पंडित —क्या चले BJP की राह

पिछले काफी समय से देश में ZENG का आरक्षण विरोधी आंदोलन, जनसभाएं, सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ छेड़ी जंग ने ना केवल बीजेपी बल्कि कईं और दलों की नींदे हराम कर दी है, कारण साफ है अभी तक दलित -पिछडो़ं की राजनीती के जरिए हर दल इन बड़ी संख्या में मौजूद वोटर्स को अपनी तरफ लुभाने की पूरी कोशिश करता रहा है, पर पिछले कुछ समय से देश की राजनीति ने जिस तरह से पलटा खाया है और आरक्षण विरोधी लहर लगातार बढ़ती जा रही है उससे हर दल में चिंता बढ़ रही है , आज बात कर रहे हैं बीजेपी और समाजवादी पार्टी की, क्योंकि यूपी में जल्दी ही चुनाव होंने वाले हैं और इन दोनों दलों की राजनीती काफी हद तक पिछड़ों के वोट बैंक पर टिकी हुई है, लेकिन अगर तुलना की जाए तो आरक्षण विरोधी लहर का सबसे ज्यादा असर समाजवादी पर पड़ता दिख रहा है क्योंकि पार्टी अभी तक pda यानी पिछड़ा -दलित, अल्पसंख्यक के नारें पर यूपी में काम कर रही है और इसी नारे की बदौलत ही अखिलेश ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को अच्छी पटखनी दे डाली थी, पर जिस तरह से देशभर में युवा से लेकर महिलाएं भी आगे बढ़कर आरक्षण विरोधी अभियान का हिस्सा बन गई हैं, उससे अखिलेश का राजनितिक समीकरण सबसे ज्यादा बिगड़ा देख रहा है। जी हां जिस तरह से उनकी पार्टी अब pda नारे को पंडित-दलित अल्पसंख्यक नारे के रूप में पेश कर रही है उससे साफ लग रहा है कि यूपी चुनावों में इस बार सवर्णों यानी बाह्राणों को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है,

BJP भी हैरान अखिलेश की बदलती राह से-निकाला नया तोड़


पर बीजेपी PDA के बदले नारे से सबसे ज्यादा परेशान है क्योंकि यूपी में उसका सिर्फ और सिर्फ अखिलेश से मुकाबला है, और यही कारण है कि यूपी में योगी से लेकर रहा तमाम बीजेपी नेता अखिलेश पर तंज कसने में पीछे नहीं रह रहे हैं, यह तक कहा जा रहा है कि समाजवादी की PDA कहीं पाकिस्तान-दलित अल्पसंख्यक ना बन जाए, एक तरफ बीजेपी अखिलेश पर मानसिक Pressure बना रही है और दूसरी तरफ इसका तोड़ निकालने के लिए बीजेपी अपनी पूरी रणनीती बना रही है, बीजेपी नेताओं की पूरी नजर सवर्ण समाज पर बनी हुई है। हाल ही में पार्टी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के प्रतिनिधियों से मुलाकात करके यह साबित भी कर दिया की बीजेपी अपने स्वर्ण वोटरों को किसी कीमत पर अखिलेश की झोली में नहीं जाने देगी, यूपी में सवर्ण मतदाता करीब 20 पर्सेट है और किसी भी पार्टी की हार जीत के लिए बड़ा मत है।

अखिलेश का बदला नारा आने वाले चुनाव में BJP को कितनी टक्कर देगा

पर सवाल उठ रहे हैं कि अखिलेश के नारे के बदले रूप पर क्या बीजेपी दोधारी तलवार पर अपनी बिसात बिछा रही है, क्या वो आरक्षण ख्तम करने के पक्ष में है, जो संभव नहीं लगता है तो फिर इस तरह की बातचीत का राजनीतिक अर्थ क्या निकल सकता है? साफ लग रहा है कि यूपी चुनाव से पहले बीजेपी एक एक कदम बहुत ही सोचसमझकर उठा रही है, बीजेपी किसी भी कीमत पर सवर्णों को नाराज नहीं करना चाहती पर साथ ही भी ओबीसी-दलित सामाज के लोगों पर भी अपना दांव बनाए रखना चाहती है, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण का नैरेटिव BJP के खिलाफ गया था और उसकी काफी सीट चली गई थी।पार्टी इस अनुभव को कतई नजरअंदाज नहीं करेगी, बस अब देखना यही है अखिलेश जो खुद भी अपने PDA नारे में बदलाव करके इस रणनीती को अपना रहे हैं बीजेपी को आने वाले चुनाव में कितनी टक्कर दे सकते हैं।