क्या UP की लड़ाई बाबर – बजरंगबली के नाम पर होने वाली है

दो प्रमुख विषय हैं भारतीय जनता पार्टी के पास उसमें लॉ एंड ऑर्डर एक बड़ा मसला है। दूसरा महत्वपूर्ण मसला है कि जो हिंदू अस्मिता या हिंदू मंदिर हैं उनकी बात करना और योगी आदित्यनाथ लगातार बात करते रहे और इसी बातचीत के दौरान उनके नितिन नवीन के कार्यक्रम के दौरान ही उन्होंने प्रश्न उठाया मोहम्मद गजवी का, मोहम्मद गौरी का, इब्राहिम लोदी का, बाबर का औरंगजेब का। अब ये सारी सारे मसले तब आते हैं जब मसला उठता है मंदिरों का। अब अयोध्या जो बाबरी मस्जिद से जुड़ा हुआ मसला था वो सेटल हो गया। लेकिन एक और इंपॉर्टेंट दो और इंपॉर्टेंट मसले उत्तर प्रदेश में ही है। वो है काशी और मथुरा के और मथुरा और काशी दोनों के लिए लगातार योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि इसको मुसलमानों को हिंदुओं को सुपुर्द कर देना चाहिए। यह उनके आराध्य के एक का जन्म स्थान है, एक की कर्मस्थली है और इस पर लेकिन ना अदालत में ना कहीं कोई बात इस तरह से निकल कर के नहीं आती जहां पर कोई समझौते पर बात पहुंचती हुई दिखे। लेकिन योगी आदित्यनाथ इस तरह की बात करते हैं। तो जब इस तरह की चर्चा हुई तब उन्होंने बोला कि जो बाबर के समर्थक हैं वो उनको बजरंगबली के समर्थकों का जवाब मिलेगा देना चाहिए। तब उत्तर प्रदेश में लगता है 2027 के चुनाव बाबर वर्सेस बजरंगबली पर होने की पूरी संभावना है और ऐसा होगा तो निश्चित तौर पर पोलराइजेशन दोनों तरफ होगा। हालांकि एक बात बहुत साफ है कि अगर आज की स्थिति देखें तो योगी आदित्यनाथ बहुत मजबूत स्थिति में है। चाहे जिन सर्वे की बात करें या ग्राउंड रिपोर्ट की बात करें। बावजूद इसके कि भाजपा सच की बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। लेकिन योगी आदित्यनाथ अपना प्रभाव बनाए हुए हैं।

क्या अखिलेश यादव का समाजवादी पार्टी से Control खत्म हो रहा है

समाजवादी पार्टी चुनावों की तैयारियों में है उत्तर प्रदेश में विधानसभा के और उन तैयारियों में लगभग हर वो प्रयास कर रही है जो किया जाना चाहिए। उसी प्रयास के तहत या उसी मुहिम के तहत बहुत सारी बैठकें भी हो रही और ऐसी ही एक बैठक में कुछ ऐसा हुआ जो चुनाव के लिहाज से अच्छा नहीं था। एक कार्यकर्ताओं की लगभग 200 250 के आसपास वरिष्ठ पदाधिकारियों की एक बैठक एटा और कासगंज में बुलाई गई थी। जिसमें जो समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं अखिलेश यादव वह भी मौजूद थे। लेकिन सारी बैठक में चर्चा के दौरान चुनावी तैयारियों की बात के दौरान दो बड़े नेताओं की आपस में पहले तो बहस हुई और बहस ने गाली गलौज का रूप ले लिया। अब यह बैठकों में बहस होती है। इसमें कोई दो राय नहीं है। जो समाजवादी पार्टी की रणनीति है, वह लगातार अपनी रणनीति पर काम कर रहे हैं। भाजपा के खिलाफ तैयारियों में वो लगे हुए हैं। अपने लोगों को इकट्ठा कर रहे हैं। पीडीए के अलग-अलग परिभाषाएं दे रहे हैं। अपर कास्ट के लोगों को भी जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। वो सारी चीजें हो रही है। लेकिन यह जो एक मुश्किल है आपस में लड़ाई क्योंकि इस तरह के डिसिप्लिन का मामला जो होता था वह जब तक मुलायम सिंह यादव जीवित थे तब तक शिवपाल संभाल लेते थे। लेकिन मुलायम सिंह यादव के जाने के बाद पार्टी का सारा का सारा जो जिम्मा है वो अखिलेश ने खुद संभाल रखा है। अब अखिलेश कितना चीजों को मैनेज कर पाते हैं नहीं कर पाते हैं ये अलग प्रश्न है। इसलिए कि बहुत सारी उनकी बातें ही विवादित होती हैं और बहुत सारी चीजों पर उनकी चुप्पी जो है वो पार्टी को नुकसान पहुंचाती है। लेकिन इस मामले में उन्होंने जो दो बातें कही वो महत्वपूर्ण है। पहली बात ये उन्होंने ये बात स्वीकार किया कि ये जो बैठकें हैं उसमें इस तरह की चीजें संभव है। कोई मुश्किल बात नहीं है। लेकिन दूसरी महत्वपूर्ण बात ये उन्होंने कही कि लोगों के पास जब पैसा आ जाता है तो इस तरह की भाषा या इस तरह की बात करने लगते हैं। तो इसका मतलब ये कि इनडिसिप्लिन की बात उन्होंने स्वीकारी। ये जो मसला हुआ था जोगेंद्र सिंह यादव और मजीत यादव को लेकर के हुआ था जिसमें कुछ बातों पर आपत्ति जताई गई थी और जब मामला गाली गलौज पर आ गया तब फिर ज्यादा बिगड़ा मामला उसके बाद ये जो दोनों झगड़े कर झगड़ा कर रहे थे नेता ये दोनों बाहर चले गए और उसके बाद मामला जब संज्ञान में आया तो अखिलेश यादव ने अपनी बात रखी। लेकिन 2027 के चुनाव से पहले इस तरह की लड़ाई जो है वह निश्चित तौर पर नुकसान पहुंचा सके सकती है। जितने भी हालांकि ऐसी स्थिति बहुत अच्छी समाजवादी पार्टी की अभी भी नहीं है जहां पर वो इस तरह का दिखे कि वो चुनाव जीत पाने की स्थिति में हो।

BJP से बाहर निकलते ही क्यों बदला इस नेता का Stand

तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई जिन्होंने कभी यह प्रॉमिस किया था कि मंदिरों के बाहर तमिलनाडु में मंदिरों के बाहर जो भी पेरियार की मूर्तियां लगी हुई हैं उनको डिमोलिश करेंगे अगर वह सत्ता में आते हैं। अब सत्ता में आने का तो वहां ख्वाब टूट गया जब बीजेपी वहां बहुत बुरे खराब प्रदर्शन की लेकिन अचानक जो है अन्ना मलाई जो है वह पेरियार के बारे में बात करने लगे। पेरियार के समर्थन की बात करने लगे। अब यह जो पेरियार के समर्थन की बात हो रही है इस क्या ये जो अपनी नई पार्टी बनाने के तरफ आगे बढ़ रहे हैं या उनको लगता है कि बिना पेरियार के की बात करे तमिलनाडु में कोई सर्वाइव नहीं कर सकता। कम से कम पॉलिटिकली नहीं सर्वाइव कर सकता। हालांकि उस मामले में अन्नामलाई ने क्लेरिफिकेशन दिया कि मैं उनके सिर्फ सामाजिक जो सोशल रिफॉर्म है, सामाजिक सुधार हैं उनको समर्थन करता हूं।लेकिन सनातन के बारे में जो उनके दृष्टिकोण हैया जो ब्राह्मणिज्म के बारे में उनके दृष्टिकोण है उससे उनकी पूरी असहमति है या पूरी पूरा विरोध है। तो ये एक बड़ा प्रश्न है। अबकि तमिलनाडु की पूरी की पूरी राजनीति एंटी ब्राह्मणिज्म पर ही होती है। वहां ब्राह्मण या सनातन को गाली देकर के ही आप आगे बढ़ सकते हैं। राजनीति कर सकते हैं। वह कास्ट के डिस्क्रिमिनेशन के नाम पर यह राजनीति वहां लंबे समय से चलती रही है। हालांकि इसके पीछे जो मूल में क्रिश्चियन मिशनरीज की बड़ी भूमिका है। लेकिन उसको आप बहुत सारी चीजों को बहुत कैसे कहेंगे कैसे कह पाएंगे। इसलिए कि क्रिश्चियन मिशनरीज के रोल को आप मानते तो हैं लेकिन उसको शायद पॉलिटिकली प्रूडेंट डिसीजन नहीं होता है। इसलिए पॉलिटिकल पार्टीज वो सीधे तौर पर कहने से बचते हैं। लेकिन जो बाकी बैठकें होती हैं वहां इस तरह की बात करते हुए नजर आते हैं। अब ये प्रश्न हो गया। क्या अन्नामलाई कोई एक दूसरी लाइन लेने के फिराक में है और उसकी शुरुआत उन्होंने ई रामास्वामी नायकर या पेरियार की तारीफ से कर दी या वो जो कह रहे थे पहले कि वो सुधारों के लिए तो नायकर का सपोर्ट करते हैं लेकिन हिंदुत्व के नाम पर या सनातन के नाम पर वो उनके खिलाफ है उनकी बात नहीं करते हैं और वो अपने अपने उसी उस बयान पर अभी भी कायम है। जब उन्होंने यह कहा था कि अगर उनकी सरकार बनी तो वो बाहर उनकी मूर्तियों को डिमोलिश करेंगे।