Tamilnadu —- क्या कारण जो रजनीकांत, कमल हासन जैसे स्टार नहीं कर पाए- विजय ने कर दिखाया
तमिलनाडु में बड़ा उलटफेर हुआ है और केरल में तीन सीटें भारतीय जनता पार्टी जीत करके आई है। तमिलनाडू में विजय ने 108 सीटें जीतकर चुनाव अपने पक्ष में कर लिया है और सरकार बनाने की स्थिति में है। कुछ समर्थन की जरूरत होगी। उसकी कोशिश जारी है। लेकिन पहली बार चुनाव विजय लड़ रहे थे और कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है। उनके कैंडिडेट्स का नहीं कोई अनुभव है।यहां तक कि उन उन्होंने अपने ड्राइवर के लड़के को मैदान में उतारा। वो भी चुनाव जीत गया। इससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि स्टालिन जैसा धुरंधर मुख्यमंत्री अपनी सीट से हार गए हैं। भारतीय जनता पार्टी की भी कम किरकिरी नहीं हुई है। उनका अलायंस बुरी तरह से औंधे मुंह गिरा है। चाहे एआईएडीएम के हो उस उसकी सीट में भी कमी हुई है। लेकिन केरल के तमिलनाडु के परिणाम ये कई दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जो उसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है वो ये कि जो एक द्रविडियन राजनीति थी वो द्रविड़ियन राजनीति दोनों राजनीतिक दल करते हैं। चाहे डीएम के हो, चाहे एआईए, डीएमके हो। उस राजनीति को नकारता हुआ तमिलनाडु नजर आ रहा है और एक ऐसा राजनीतिक दल जिसको द्रविड़ राजनीति से सीधे तौर पर कोई मतलब या कोई लेना देना नहीं है वो राजनीति करती नजर आ रही है। अब जो उनके वोटर्स हैं जिन्होंने उनके स्टारडम के कारण उनको वोट किया है। हालांकि तमिलनाडु में स्टारडम के कारण चीजें डिसाइड होती हैं। चाहे वो जय ललिता हो, चाहे एमजी रामचंद्रन हो, उनके स्टारडम ने ही उनको मुख्यमंत्री बनने में मदद की है। विजय को भी उनके स्टारडम ने ही वहां तक पहुंचाया है। लेकिन अंतर है। अंतर ये है कि एम चाहे एम जी रामचंद्रन हो चाहे वो जयललिता हो। इनकी राजनीति जो है वो द्रविड़ राजनीति के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। लेकिन विजय ने वैसी बात नहीं की है और जो विजय के समर्थक हैं वह भी यह कह रहे हैं कि जो एक मेन स्ट्रीम नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स है उस तरह का विजय के नेतृत्व में तमिलनाडु में उस दिशा में बढ़ना चाहिए और उस तरह की राजनीति करनी चाहिए जो एक तमिल सेंट्रिक और एक इमोशनल राजनीति होती है वो नहीं और वही जो है डेवलपमेंट को एक्सपोडाइट कर सकता है, तेज कर सकता है तमिलनाडु में। तो एक यह बदलाव दिख रहा है। तो क्या यहां से कोई ऐसी राजनीति है जो भारतीय जनता पार्टी जिसको पकड़ती हुई नजर आ रही है? अब महत्वपूर्ण बात यही है कि द्रविडियन पॉलिटिक्स इसमें रजनीकांत और कमल हसन जो विजय से बड़े स्टार हैं वो सफल नहीं हुए उनकी राजनीति हालांकि कमल हसन राज्यसभा में हैं। रजनीकां बीजेपी के आसपास नजर आते हैं। तो तमिलनाडु में ये डेवलपमेंट्स नजर आ रहे हैं।
BJP को किसी का पिछलग्गू बन कर राजनीति नहीं करनी चाहिए
अब इसमें एक और महत्वपूर्ण बात है। वह महत्वपूर्ण बात यह है कि जो बात भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अन्ना मलाई कहते रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी को अपनी राजनीति करनी चाहिए। किसी का पिछलग्गू बन करके अगर वह राजनीति करेंगे तो उनका ग्रोथ तमिलनाडु में संभव नहीं है। और जो साबित होता हुआ दिख रहा है। तो क्या इस चुनाव के बाद तमिलनाडु की बागडोर एक बार फिर अन्ना मलाई के पास होगी? यह तो आने वाला समय बताएगा।
BJP के लिए बदलाव की संभावना इन दोनों प्रदेशों में अभी कोसों दूर
केरल में बदलाव हुआ है। दो टर्म के बाद लेफ्ट का जो लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट था वो उसको रिप्लेस किया है यूडीएफ ने। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट जिसमें जिसके दो प्रमुख घटक कांग्रेस और,मुस्लिम लीग हैं। मुस्लिम लीग लगभग 24-25 सीट जीत करके आई है वहां पर तो अगर इसको फिर उस दृष्टि से देखना पड़ेगा। 26 सीटें जीती है। मुस्लिम लीग 22 सीटें जीती है। सीपीआईएम 26 सीटें जीती है। कांग्रेस को 63 सीटें मिली है। तो अब अगर आप इसको इस दृष्टि से देखिएगा तो वहां पर जो के मुस्लिम लीग है उसने बहुत कॉम्प्लीमेंट किया है।कि केरल में लगभग 25 से 26% मुसलमान हैं। तो उन्होंने बड़ा कंट्रीब्यूट किया है इस चुनाव में। लेकिन भारतीय जनता पार्टी को जिसके अभी एक लोकसभा सदस्य गोपी जो है वो चुनाव जीत कर गए हैं। अभी तीन विधानसभा सीट जीतकर केरल से भारतीय जनता पार्टी जीत करके आई है। तो ये एक रीअलाइनमेंट हो रहा है। अब ये दोनों साउथ के दक्षिण के दोनों प्रदेशों में अभी भारतीय जनता पार्टी को बहुत काम करना है। बंगाल में जिस तरह का बदलाव हुआ है उस तरह के बदलाव की संभावना से इन दोनों दोनों प्रदेशों में कोसों दूर है। अब अगर आप तमिलनाडु की बात करें तो वहां अगर न्यूमेरिकली देखें तो लगभग 87 88% हिंदू हैं। तो वहां ये सारी चीजें संभव हैं। लेकिन वहां पर अभी हिंदुत्व के नाम पर हिंदू एज यूनिट वोट नहीं करता है। वहां पर द्रविड़ या बाकी और सारे फैक्टर्स काम करते हैं। केरल में कम्युनिस्ट हैं। लेकिन वहां डेमोग्राफिकली जो है भाजपा का जो आईडिया है वो कहीं स्टैंड नहीं करता है। इसलिए कि वहां लगभग 55% के आसपास हिंदू हैं। 18% क्रिश्चियन है। जब तक यह 55 और 18 का गठजोड़ बहुत सॉलिड नहीं होता है तब तक भाजपा की संभावनाएं नहीं बचेंग और मुस्लिम वोट तो भाजपा को नहीं मिलेगा। यह तो तय है जिस बात की संभावना नहीं रहती। तो कुल मिलाकर के यह जो स्थिति है वो उसी तरफ इशारा करती है। तो केरल में भाजपा इस स्थिति में नहीं है अभी कम से कम कि वो सरकार बना पाए। तो जब तक कम से कम हिंदू और क्रिश्चियन वोट एक साथ मिलके नहीं करते हैं तब तक इस तरह की संभावना नहीं दिखती है। लेकिन वहां पर जो वोटिंग पैटर्न है वो बाकी भी ऐसा नहीं है कि बीजेपी वहां कोई संभावनाएं वहां नजर आए। अब तिरुवनंतपुरम का म्युनिसिपल इलेक्शन उन्होंने जीता। वहां पर भारतीय जनता पार्टी का मेयर है। लेकिन तिरुवनंतपुरम ही पूरा केरल नहीं है। तिरुंतपुरम अर्बन है। अर्बन सीट है। वहां पर निश्चित तौर पर संघ का काम है। तो ये एक बात नजर आती है। लेकिन कुल मिलाकर के तमिलनाडु और केरल इन दो प्रदेशों को ये ये दो प्रदेश जो है वो भारतीय जनता पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है। अ कम से कम तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी और केरल में लगभग 22% और 18% के आसपास 12
13% के आसपास वोट बढ़ा पाई हैं। लेकिन अभी भी भारतीय जनता पार्टी को इन दोनों प्रदेशों में बहुत काम करना है और सरकार बनाना अपने दम पर अभी दूर की कौड़ी है। अलायंस के साथ भी क्या कर पाएंगे क्या नहीं कर पाएंगे उसको इसलिए नहीं कहा जा सकता कि अलायंस के बावजूद एआईडीएमके के साथ वो बुरी तरह से फ्लॉप हुआ है पूरा का पूरा एक्सपेरिमें ऐसा है। अब कुल अगर आप इसको देखिए तो केरल और तमिलनाडु बड़ी चुनौती बनकर के उभरे हैं भारतीय जनता पार्टी के लिए जिस पर इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की आगे की क्या रणनीति है? यह समय बताएगा
