क्यों होंने लगी है RAHUL GANDHI और SONIA की लगातार उपेक्षा

 

कमजोर हो रहा कांग्रेस का हाईकमांड अब अपने रीजनल नेताओं पर कोई कंट्रोल नहीं रख पा रहा है और इसीलिए बहुत सारे चीजों में डिसीजन लेने में उसको सफलता नहीं मिलती है या उसको टालना पड़ता है। चाहे वह कर्नाटक में मुख्यमंत्री को लेकर डी के शिव कुमार और सीधा रमैया के बीच टकराव हो या केरल में मुख्यमंत्री पद के नाम की घोषणा में हुई डिले। वैसे फाइनली वी डी सतीशन का नाम तो घोषित हुआ लेकिन जिन पांच प्रदेशों के चुनाव हुए थे उनके परिणाम घोषित हो गए थे 4 तारीख को। चार प्रदेशों में शपथ ग्रहण हो गई। तीन प्रदेश और एक यूनियन टेरिटरी और एक ऐसा प्रदेश था जहां पर हंग असेंबली थी। कोई निश्चित परिणाम नहीं थे। वहां भी शपथ हो गया। लेकिन जहां पर क्लियर कट मैंडेट यूडीएफ को आया था वहां पर सरकार बनाने में इतना देर लग गया। तो उसके पीछे सीधे से कारण सीधे सा कारण है कि जो कांग्रेस का नेतृत्व है केंद्रीय नेतृत्व वो अपने छोटे नेताओं को या सेकंड रन लीडरशिप को दबाव नहीं बना पाता इसलिए कि उनको मालूम है कि केंद्रीय नेतृत्व को इस बात की पूरी तरह से जानकारी है कि उनकी निर्भरता इन्हीं नेताओं पर है। केंद्रीय नेतृत्व ना अपने दम दम पर लोकसभा के चुनाव जीता सकता है ना विधानसभा के चुनाव जीता सकता है। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव इन्हीं नेताओं की बदौलत जीते जाते हैं। तो आप जिनके भरोसे चुनाव जीतते हैं उन पर हुकुम नहीं चला सकते हैं। यह तो बहुत स्पष्ट बात है और वैसा ही होता हुआ दिख रहा है। और ये केवल कर्नाटक या केरल की बात नहीं है। ऐसा ही हिमाचल प्रदेश में है। ऐसा ही राजस्थान में है। ऐसा ही पंजाब में है। ऐसा जहां-जहां भी कांग्रेस थोड़ी सी मजबूत है और किसी पर निर्भरता नहीं है। कई मामलों में तो किसी पर निर्भरता है। जैसे तमिलनाडु में डीएमके पर निर्भरता थी फिर भी फैक्शलिज्म है। वैसे ही झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा पर निर्भरता है। फिर भी आपस में फूट है। तो यह उसके पीछे सिर्फ केंद्रीय नेतृत्व का कमजोर होना निर्णय ना ले पाने का बड़ा कारण है।

Education Minister मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पूरा का पूरा मंत्रालय ही राम भरोसे चल रहा

नीट की परीक्षा में लगातार गड़बड़ियां हो रही हैं। और 2 साल पहले भी नीट के पर्चे आउट हुए थे और उसको लेकर के बड़ा विवाद खड़ा हुआ था और इस बार फिर वैसी स्थिति आई है। तो अब यह एक प्रशासनिक मामला है। इसमें सरकार को निर्णय लेना चाहिए। सख्ती से कदम उठाना चाहिए। बच्चों के भविष्य का मामला है। लेकिन सरकार के नाम पर कब तक नरेंद्र मोदी पर ठीकरा फोड़े रहना चाहिए? क्या संबंधित मंत्रालय की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है कि इस मामले में सख्त निर्णय लिया जाए कि यह रिपीट ना हो और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का तो पूरा का पूरा मंत्रालय ही जैसे राम भरोसे चल रहा है। यह कहा जाता है कि प्रधानमंत्री या जो बीजेपी का नेतृत्व है उसने यह मंत्रालय जो है वो छोड़ रखा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और बाकी और इस तरह के व्यवस्थाओं में कि वहां ज्यादा इंटरफेरेंस नहीं होता है। लेकिन इसके मायने क्या हैं? कि यहां पर कुछ इस तरह की गलतियां, कुछ इस तरह की गड़बड़ियां, कुछ इस तरह की चीजें जो गड़बड़ी हो रही है, उसको नजर अंदाज किया जाना चाहिए। प्रशासनिक चीजों को लेकर के क्यों गड़बड़ियां हो रही है? आप आईडियोलॉजी की बात करें। अब इतिहास के लेखन को लेकर के करें। करिकुलम को लेकर के करें या और कोई इस तरह की चीज हो जहां पर कोई ऐसी स्थिति आती है कि आपको थोड़ा चीजों को दूसरों को भी सुनने की जरूरत पड़े। लेकिन जहां पर सीधे-सीधे सख्ती करने की जरूरत है, वहां पर कैसे जो ये पेपर लीक कर रहे हैं, ये कैसा मामला है? इस पर क्यों लगातार नाकामयाब रह रही है सरकार और ये महाराष्ट्र से लेकर के राजस्थान और देश के दूर-दूर हिस्सों तक इस तरह के लोग गड़बड़ करते हुए नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर के इस से यह साफ है कि जिस तरह का परफॉर्मेंस है धर्मेंद्र प्रधान का रीशफल में उनका जाना लगभग तय माना जा रहा है।

CBI Director को मिला एक्सटेंशन—Rahul Gandhi क्यों परेशान

 

सीबीआई डायरेक्टर को एक्सटेंशन मिला है। अब उसमें एक बात यह कही जा रही है कि सीबीआई जो डायरेक्टर हैं उनको क्योंकि राहुल गांधी ने डाइसेंट नोट लिख दिया था इस मामले को लेकर के कि उन उनको नाम नहीं बताया गया। उनको नाम नहीं दिखाया गया और बहुत सारी और चीजें उन्होंने लंबे चौड़े डाइसेंट नोट में लिखी थी और इस कारण से शायद यह मामला टल गया। लेकिन प्रवीण सूद को एक्सटेंशन मिला है। प्रवीण सूद तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नियुक्त किए हुए ही सीबीआई डायरेक्टर हैं। तो क्या ऐसा तो नहीं कि एक बार फिर राहुल गांधी भारतीय जनता पार्टी की ट्रिक में फंस गए।कि क्योंकि आप ध्यान कीजिए संजय मिश्रा जो ईडी के चीफ हुआ करते थे उनको हटाने उनको एक्सटेंशन ना दिया जाए इसको लेकर के विपक्ष सुप्रीम कोर्ट गया और फाइनली सुप्रीम कोर्ट के कहने सुप्रीम कोर्ट के इंटरवीन करने के बाद उनको फर्दर एक्सटेंशन नहीं मिला। अब यहां क्या करेंगे? यहां तो विपक्ष का आदमी कोई कुछ बोल ही नहीं सकता इसलिए कि विपक्षी इस मामले में पूरी तरह से साथ नजर आता है।आपको कोई पसंद नहीं आया तो पद खाली रहा रख नहीं रखा नहीं जा सकता। इसलिए एक्सटेंशन दिया जाएगा और इसीलिए जो प्रवीण सूद है पुराने डायरेक्टर उन्हीं को एक्सटेंशन दे दिया गया है। अब एक्सटेंशन दे दिया गया है। फिर इसलिए कि बीच में सोशल मीडिया में इस बात को लेकर के भी ऑब्जेक्शन आना शुरू कर दिया गया था कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया का होना या ना होना उसके कोई मायने नहीं रख सकते रखते हैं। तो इसका मतलब ये है कि सब कुछ जो है वो पूछकर राहुल से पूछकर करना चाहिए। ये एक बड़ा मसला है।

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