man cutting trees using an electrical chainsaw and professional tools

जिस तरह से दिनोदिन हम विकास के नाम पर प्राक़ृतिक से बिना सोचे समझे छेड़खानी कर रहे हैं उसका खामियाजा भी हमें भुगतना ही पड़ रहा है, कईं जबरदस्त गर्मी, कहीं ठंड का प्रकोप , कहीं सूखा, कहीं बाढ़ से तबाही, आपमें में से कम ही लोग ये जानते होंगे कि कुछ साल पहले केदारनाथ में बाढ़ के कारण जो जबरदस्त तबाही मची थी, वो गलेशियर पिघलने के कारण उससे पैदा हुई एक झील के कारण हुआ था और आपको ये जानकर डरना भी चाहिए कि जलवायु परिवर्तन के कारण लगातार ग्लेशियर पिघलने से हिमालयन रेंज में 5000 से ज्यादा झीले बन चुकी हैं जो, कहीं भी किसी भी जगह पर तबाही का कारण बन सकती हैं। कुदरत की तरफ से बहुत बड़ी चेतावनी बनी इन झीलों के कारण पूरे हिमालय का कृषि क्षेत्र खतरे में पड़ गया है। इससे हिमाचल में हो रही सेबों की खेती पर मौसम के बदलाव से बहुत बुरा असर पड़ा है।

 

Extreme मौसम बन रहा तबाही का कारण

हिमालय में हाइड्रो पावर प्लांट बनाने मैं सभी सरकार है सभी नियमों को तक पर रखकर इस काम को जारी रखे हुए हैं अभी तक 46850 मेगावाट कैपेसिटी वाले हाइड्रो पावर प्लांट बिजली बना रहे हैं और सरकार का लक्ष्य है इसे 111500 मेगावाट तक ले जाना जाना है यह जानते हुए भी की अभी तक उत्तराखंड के चमोली में 13.2 मेगावाट के ऋषभ गंगा हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और 520 मेगावाट का अंतिम पीसी का हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट तपोवन के डोली गंगा रिवर पर एवलांच से तबाह हो गए थे और 200 लोग इसमें मर भी गए थे। टिहरी डैम इतनी ऊंचाई पर बनने वाला विश्व का सबसे दूसरा दम है और इतनी तबाही ला सकता है कि जितनी आप सोच भी नहीं आपकी सोच से भी बाहर होगीभारत की हिमालयन रेंज में 13 स्टेटस आते हैं जैसे अरुणाचल प्रदेश असम हिमाचल मणिपुर मेघालय मिजोरम नागालैंड सिक्किम त्रिपुरा उत्तराखंड वेस्ट बेंगल और जम्मू कश्मीर लद्दाख इत्यादि। 2022 से 2025 तक इन प्रदेशों में एक्सट्रीम वेदर कंडीशन देखने को मिला कुल मिलाकर अति भयंकर जलवायु कंडीशन की घटनाएं 822 से 1186 दिनों तक रही। इसमें 2865 लोग मृत्यु को प्राप्त हुए और पूरे विश्व में लैंडस्लाइड से भारत तीसरे स्थान पर रहा। भारत और नेपाल सबसे ज्यादा रिस्क कौन देश में आते हैं

पहाड़ कट रहे हैं और बढ़ रही हैं landslide की समस्याएं

लैंडस्लाइड एटलस ऑफ़ इंडिया के अनुसार 1988 से 2022 तक मिजोरम ने सबसे ज्यादा 12385 लैंडस्लाइड घटनाएं देखी। और उत्तराखंड में 11219 इसी तरह त्रिपुरा में 870 घटनाएं और बाकी राज्यों में भी यही हाल लगभग यही स्थिति रही। सड़कों का जाल हिमालय राज्यों में इस तरह से बिछाया जा रहा है जैसे मैदाने में में होता है चार धाम यात्रा प्रोजेक्ट बिना किसी स्टडी के शुरू किया गया पर्यावरण वेदों साइंस दोनों और भूगोल के जानकारी और भूकंप की स्टडी करने वाले तमाम ईदारों ने इस पर रोक लगाने की कोशिश की सरकार का ध्यान इस और खींच पर सरकार ने ना तो काम ही रोका और ना ही किसी की सलाह मानी। इसी का नतीजा है कि पहाड़ों में भूस्खलन की घटनाओं का बढ़ना हिमालय के हिमाचल और उत्तराखंड के इलाके का खास तौर पर बहुत बुरा हाल हुआ है हर साल आने वाली बाढ़ से पूरे पूरे गांव पानी में समा रहे हैं इकोलॉजिकल सिस्टम पूरी तरह से तबाह हो चुका है अब तो स्थानीय निवासी भी इस सब के विरोध में खड़े होकर धरना प्रदर्शन कर रहे हैं पर यह सब किसी काम नहीं आ रहा और कोई काम रुक नहीं रहा पहाड़ों और जंगलों की कटाई अंधाधुन जारी है कई विकास के नाम पर तो कभी लालच में। भारी से और भारी से भारी होने वाली बारिश का प्रिडिक्शन नॉर्थ ईस्ट इंडिया स्पेशली अरुणाचल प्रदेश और उसके साथ लगे बेस्ट कोर्स में जिसमें केरल कर्नाटक और तमिलनाडु का हिस्सा भी आता है है नॉर्थ एंड ईस्ट इंडिया में भी भारी बिजली गिरने बादल फटने की घटनाओं का प्रेडिक्शन है जिसमें बिहार छत्तीसगढ़ उत्तराखंड हिमालयन रीजन वेस्ट बंगाल सिक्कम भी शामिल है फोन विराम आज की तारीख में जो आईएमडी की रिपोर्ट है वह भी पिछले साल की एक्सट्रीम वेदर घटनाओं से कुछ अलग नहीं दिख रही है बल्कि पिछले साल के सारे रिकॉर्ड फिर से टूटने की आशंका है इसलिए इस साल सफर करने वाले यात्रियों के लिए भी वार्निंग जारी की जा रही है यह सब अब रुकने का नाम नहीं ले रहा और वैज्ञानिकों के अनुसार स्थिति को रोकर रोकने का समय भी निकलता जा रहा है और ना तो कोई देश और ना विश्व में कोई संगठन इसके लिए कोई सार्थक कदम उठा पा रहे हैं

कब संभलेंगे हम लोग-कब जागेगी हमारी सरकार

 

हिमालय राज्यों में सड़कों का जाल इस तरह से बिछाया जा रहा है जैसे मैदाने में में होता है इसी का नतीजा है कि पहाड़ों में लैंडस्लाइड की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। हिमालय के हिमाचल और उत्तराखंड के इलाकों में खास तौर पर बहुत बुरा असर हो रहा है। हर साल आने वाली बाढ़ से पूरे पूरे गांव पानी में समा रहे हैं , सवाल यही है कि कब तक हम प्रकृति से खिलवाड होता रहेगा और कब तक इसका शिकार बेबस लोग, मासूम जानवर, हमारे पेड़ पौधे, पहाड़ बनते रहेंगे

 

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