by ruby Singh
सावधान धंस सकती है दिल्ली की धरती-कारण जानोगे तो चौक जाओगे
कल्पना कीजिए… जिस जमीन पर आज दिल्ली खड़ी है, वही धीरे-धीरे नीचे धंसने लगे। यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों की चेतावनी है। इसकी सबसे बड़ी वजह है—तेजी से घटता भूजल यानी भूमि के नीच मौजूद पानी, जी हां बढ़ती आबादी, भूमि से लगातार जल का निकालना, तेजी से होता शहरीकरण और जलवायु परिवर्तन ने धरती के भीतर छिपे इस अनमोल जल भंडार को संकट में डाल दिया है। आज दिल्ली उसी संकट के मुहाने पर खड़ी है…लेकिन सवाल है… आखिर दिल्ली में ऐसा हो क्यों रहा है? इसका जवाब केंद्रीय भूजल प्राधिकरण और जल शक्ति मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय हरित अधिकरण के सामने पेश की गई एक रिपोर्ट से मिलता है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2025 में दिल्ली में भूजल दोहन का स्तर लगभग 92 प्रतिशत तक पहुँच चुका है और आपको बता दें कि जल प्रबंधन की दृष्टि से इसे बेहद गंभीर स्थिति माना जाता है।
बड़ा सवाल भूजल खत्म होने से जमीन कैसे धंस सकती है
अब आपको बताएं कि इसका मतलब क्या है? सरल शब्दों में कहें तो प्रकृति जितना पानी वर्षा और अन्य प्राकृतिक प्रक्रियाओं के जरिए जमीन के भीतर पहुंचा रही है, हम उसका लगभग पूरा हिस्सा, बल्कि कई क्षेत्रों में उससे भी अधिक निकाल रहे हैं। यही असंतुलन धीरे-धीरे भूजल भंडारों को खाली करता जा रहा है। *अब सवाल यही है कि भूजल खत्म होने से जमीन कैसे धंस सकती है? इसे आसान भाषा में समझते हैं। जमीन के नीचे रेत, बजरी और चट्टानों की छिद्रयुक्त परतें होती हैं, जो प्राकृतिक पानी की टंकी की तरह काम करती हैं। इन्हें जलभृत या एक्विफर कहा जाता है। यही हमारे भूजल का सबसे बड़ा भंडार हैं।
प्राकृतिक टंकी लगातार खाली हो रही लेकिन दोबारा भरने का पर्याप्त मौका ही नहीं मिल रहा
दिल्ली की जमीन का बड़ा हिस्सा यमुना नदी द्वारा बहा कर लाई गई मिट्टी, रेत, गाद और कंकड़ों से बना है, जिसमें वर्षा का पानी धीरे-धीरे रिसकर इन जलभृतों को भरता है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब इस प्राकृतिक टंकी से लगातार पानी निकाला जाए और उसे दोबारा भरने का पर्याप्त मौका ही न मिले। ऐसी स्थिति में जमीन के नीचे मौजूद पानी कम होने लगता है। मिट्टी और चट्टानों के बीच की खाली जगह सिकुड़ने लगती है। धीरे-धीरे जमीन अपना सहारा खोने लगती है और धंसने लगती है। इसका असर इमारतों की नींव, सड़कों, सीवर लाइनों और अन्य बुनियादी ढांचों पर पड़ सकता है। दुनिया के कई बड़े शहर इस समस्या का सामना कर चुके हैं और अब दिल्ली भी उसी दिशा में बढ़ती दिखाई दे रही है।
शहर का भूजल पीने के पानी का स्रोत नहीं, बल्कि पूरे शहर की नींव
रिपोर्ट के अनुसार नई दिल्ली, उत्तर-पूर्वी दिल्ली, शाहदरा और दक्षिणी दिल्ली के कई इलाको में भूजल जितना प्राकृतिक रूप से जमीन के भीतर जमा हो रहा है, उससे कहीं अधिक मात्रा में निकाला जा रहा है। तो क्या इस संकट का कोई समाधान है?* विशेषज्ञों के अनुसार, यमुना का बाढ़ क्षेत्र और दिल्ली रिज राजधानी के सबसे महत्वपूर्ण भूजल पुनर्भरण क्षेत्र हैं। ये प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करते हैं और वर्षा के पानी को जमीन के भीतर पहुँचाने में मदद करते हैं। लेकिन अतिक्रमण, अवैज्ञानिक निर्माण और बढ़ते पर्यावरणीय दबाव के कारण इन क्षेत्रों की क्षमता लगातार घट रही है। यदि इन प्राकृतिक पुनर्भरण क्षेत्रों की रक्षा नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में दिल्ली का भूजल संकट और गहरा सकता है। याद रखिए*….दिल्ली या किसी भी शहर का भूजल केवल पीने के पानी का स्रोत नहीं, बल्कि पूरे शहर की नींव है। जमीन के नीचे का यह अदृश्य जल भंडार ही हमारे घरों, सड़कों और शहरों को स्थिरता देता है। अगर हमने आज भूजल का संरक्षण नहीं किया तो भविष्य में संकट केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं रहेगा। जमीन धंसने, इमारतों की नींव कमजोर होने और शहरी ढांचे को नुकसान पहुंचने जैसी गंभीर समस्याएं भी सामने आएंगीं। इसलिए भूजल संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि हमारे शहरों, हमारी सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल है।
मॉडल बनाना बहुत जरूरी है। अपनाया जाए।
गंगा को आज केवल प्रदूषण से ही नहीं, बल्कि बढ़ती गर्मी से भी बचाने की आवश्यकता है। यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की जीवनरेखा, आस्था का केंद्र और समृद्ध जैव विविधता का आधार है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो गंगा का पारिस्थितिक संतुलन और उस पर निर्भर असंख्य जीवों तथा समुदायों का भविष्य गंभीर संकट में पड़ सकता है। इसलिए गंगा को बचाना केवल एक नदी को बचाना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन, संस्कृति और प्रकृति की उस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखना है, जो सदियों से भारत की पहचान रही है।
गंगा तेरा पानी अमृत, झर-झर बहता जाए, युग-युग से इस देश की धरती तुझसे जीवन पाए”— साहिर लुधियानवी की ये पंक्तियां गंगा के उस स्वरूप को रेखांकित करती हैं, जिसने सदियों से भारत की सभ्यता, संस्कृति और जीवन को पोषित किया है।
