100 पार्षदो ने छोड़ा साथ बहुत से सांसद -विधायक लाइन में

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का बहुत ही बुरा हाल है और उनको झटके पे झटका मिल रहा है। चुनाव खत्म हुए ममता को जो हार मिली है उसको सिर्फ तीन हफ्ते ही बीते हैं और लग रहा है कि ममता के तमाम नेता उन्हें छोड़ छोड़कर भाग रहे हैं। सांसद भी शामिल है। विधायक भी शामिल है और पार्षद भी शामिल है। और एक झटका लग गया जब उत्तर और दक्षिण के पारागन की सात महापालिकाओं के 100 पार्षदों ने एक साथ इस्तीफा दे दिया है और दूसरी तरफ सांसद काकोली घोष ने अपने कई जो पद थे उससे इस्तीफा दे दिया। वो tmc महिला विंग की अध्यक्ष थी और कई अन्य पद भी उनके पास थे स जिसमें से काकोली घोष ने इस्तीफा दे दिया है। बताया जा रहा है कि काकोली घोष के इस कदम के पीछे उनका गुस्सा है और गुस्सा इसलिए है कि कुछ ही समय पहले काकोली घोष अपने छह विधायकों के साथ शुभेंदु अधिकारी जो नए मुख्यमंत्री हैं बीजेपी के उनकी प्रशासनिक बैठक में भाग लिया था। उसी से गुस्सा होकर उन्हें जो संसदीय दल का मुख्य सचेतक होता है, उस हटा दिया गया और शायद यही गुस्सा था कि काकोली घोष ने तमाम पदों से इस्तीफा दे दिया। हालांकि उन्होंने कहा है कि वे सांसद के तौर पर अपना काम जारी रखेंगी लेकिन इसके पीछे भी एक पेच है। किसी भी समय कुछ भी हो सकता है।

चाणक्य चाह रहे TMC के 20 सांसद BJP आएं इसलिए हो रहा खेला


चर्चाएं ये चल रही है कि टीएमसी के 12 से ज्यादा सांसद बिल्कुल तैयार बैठे हैं बीजेपी में आने के लिए। जी हां। और काकोली घोष का यह कदम कहीं ना कहीं इशारा कर रहा है कि अंदर हीअंदर कुछ बड़ा खेला चल रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी आलाकमान और खासतौर पर चाणक्य इसमें कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहते हैं। 12 सांसद तैयार है। लेकिन चाणक्य की रणनीति है। बीजेपी आलाकमान की नीति है कि स्लो एंड स्टडी एंड विन द रेस। कि धीरे-धीरे चलो और जीत मिलेगी। इंतजार हो रहा है कि 12 के बदले जो सांसद है उनकी संख्या 20 हो जाए। अब 20 क्यों हो जाए? क्योंकि 29 सांसद है टीएमसी के और ऐसे में अगर 20 सांसद टूट कर निकलते हैं और दूसरी पार्टी ज्वाइन करते हैं तो उन पर दल बदलू कानून लागू नहीं होगा और बीजेपी को तभी उनका फायदा होगा। अगर लोकसभा में 20 सांसद बीजेपी में शामिल हो जाते हैं तो जाहिर सी बात है कि जो डिपेंडेंसी है सरकार चलाने के लिए jdu पर चंद्रबाबू नायडू पर और चिराग पासवान जो उनके तीनों पार्टनर है उनके ऊपर जो डिपेंडेंसी है वो थोड़ी कम होगी तो ये रणनीति अंदर ही अंदर
चल रही है खेला चल रहा है

ममता के विधायक उनके साथ कोर्ट जाने को भी नहीं तैयार


छन छन कर सामने आ रही है कि ममता दीदी को उनके जो विधायक हैं वो भी छोड़कर जाने के मूड में है और इससे इसका पता कैसे चल रहा है? ममता दीदी ने जब चुनाव हारने के बाद पहली विधायक दल की बैठक की तो बहुत से विधायक उसमें से गायब थे। इसके अलावा ममता दीदी मतगणना में गड़बड़ी , चुनाव आयोग ने काम नहीं किया है। केंद्रों में ईवीएम में गड़बड़ी हुई , इसको लेकर जो कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की पूरी तैयारी कर रही है। लेकिन हारे हुए बहुत से उम्मीदवार टीएमसी के ममता का साथ देने को तैयार नहीं है। यानी वो कोर्ट जाने को तैयार नहीं है। यह लड़ाई लड़ने को ममता का साथ देने को तैयार नहीं है। उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सांसद तो क्या, विधायक तो क्या, पार्षद तो
क्या सभी ममता दीदी का साथ छोड़कर जाने की तैयारी में है उम्मीद की जा रही है।

ममता और केजरीवाल हाल एक जैसा

तो अब ममता दीदी का हाल अरविंद केजरीवाल की पार्टी आम आदमी पार्टी जैसा ना हो जाए? जी हां, उनके भी एक साथ इतने सारे सांसद निकल कर चले गए थे, उन पे दल बदलू कानून भी लागू नहीं हुआ था क्योंकि संख्या पूरी थी। तो क्या ममता दीदी का हाल अरविंद केजरीवाल की तरह होने वाला है? जिसकी चर्चाएं होने लगी है कि एक साथ ही यदि उसके सांसद उसको छोड़कर चले जाते हैं तो केंद्र में जो उनकी पकड़ है 29 सांसद जो टीएमसी के बैठे हुए हैं लोकसभा में वो उनकी पकड़ कम होगी। तो देखिए एक तरफ क्या हो रहा है ममता दीदी जो पूरे सक्सेसफुल उन्होंने इतने सालों तक बंगाल पर राज किया और जब उनका पतन हुआ तो पतन ऐसा सामने आ रहा है कि सारे नेता छोटे से लेकर बड़े नेता उनको छोड़ छोड़ कर जा रहे हैं।

विपक्षी गठबंधन में भी फेस बनना टेढ़ी खीर

अब ममता बनर्जी क्या करेंगी? ममता दीदी जो सोच रही है जो उनके कदम है चल रहे हैं और जिस तरह से वो विपक्षी गठबंधन पर बात कर रही हैं और चाह रही हैं कि विपक्षी गठबंधन एक हो तो क्या वो विपक्षी विपक्षी गठबंधन का एक चेहरा बनना चाहती है लेकिन चेहरा बनेंग तो उनको अपनाएगा कौन? क्योंकि बंगाल पहले बंगाल की सर्वो सर्वा थी, सुप्रीमो थी और ऐसे में जब ममता दीदी बोलती थी तो कई दल उनके पीछे बोल देते थे। खासतौर पर अरविंद केजरीवाल और समाजवादी पार्टी तो बहुत सटकर उनके साथ खड़ी रहती थी हमेशा। लेकिन अब बंगाल ममता दीदी के हाथ से चला गया और बड़ी बात नहीं है कि उनके जो सांसद है बहुत सारे वो भी चले जाएं तो लोकसभा में उनकी स्थिति क्या होगी? तो ऐसे में यह जो दल है तो क्या वो 99 सीट वाली कांग्रेस को छोड़कर ममता दीदी को गठबंधन का फेस बनाएंगी? एक बड़ा प्रश्न है क्योंकि राजनीति में सब फायदा देखते हैं ,कोई दोस्त और दुश्मन नहीं होता। सिर्फ गद्दी की यारी होती है। तो ममता बनर्जी तब तक मुख्यमंत्री थी। सारे दल उनको फॉलो करते थे। उनकी बात मानते थे। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने तो कई बार चक्कर भी लगाए बंगाल में। केजरीवाल ने खुलकर उनका समर्थन किया। लेकिन अब बंगाल उनके हाथ में नहीं है। तो अब अगर वो चाहती भी है विपक्षी गठबंधन का फेस बनना तो क्या ये सारे दल जो है अपना राजनीतिक फायदा नहीं देखेंगे 99 सीट लेकर के इस समय कांग्रेस कहो तो लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी है तो क्या कांग्रेस को नाराज करेंगे ये दल?

 

Congress से नाराजगी ममता को मिल सकता फायदा

लेकिन थोड़ी बहुत उम्मीद शायद इसलिए हो सकती है ममता बनर्जी का चांस बन सकता है कि हाल फिलहाल में जो कांग्रेस ने किया है उससे कई दल काफी खफा बैठे हैं और डीएमके का उदाहरण आपके सामने है तमिलनाडु में जिस तरह से एक ही झटके में कांग्रेस ने डीएमके को छोड़कर विजय का साथ दे दिया और शपथ में समारोह में शामिल हो गए अपने दो मंत्री भी बनवा लिए तो डीएम को उसको लेकर काफी नाराज है और जिस तरह की टीका टिप्पणी लगातार कर रही है और हाल ही में तो उदयनिधि जो है स्टलिन के बेटे थे। उन्होंने उनको कांग्रेस को लीच तक कह दिया, कह दिया कि कांग्रेस ऐसी है कि दूसरों पर पलती है। दूसरों का खून चूसती है। कहने का मतलब यही है लीच का मतलब यही निकाला जा रहा है। तो काफी खफा है। दूसरा अरविंद केजरीवाल पहले ही किनारा कर चुके हैं कांग्रेस से क्योंकि उसको बहुत बड़ा झटका कांग्रेस ने दिया था दिल्ली में। फिर हरियाणा में उसको झटका मिला। समाजवादी पार्टी के भी संबंध इतने ज्यादा अच्छे नहीं है तो ऐसे में लगता है कि शायद ममता बनर्जी का जो ये दाव है वो जो चाह रही है कि विपक्ष इकट्ठा हो और ये सारा विपक्ष इकट्ठा हो जाए। चाहे उसमें कांग्रेस ना हो लेकिन और दल शामिल हो। तो वो विपक्ष का चेहरा बन सकती है। लेकिन कहते हैं ना ये राजनीति है। हर दल यहां पे अपना फायदा देखता है। किसी को चिंता नहीं है इस समय कि गठबंधन बने या बीजेपी को हराना है। सबको ये है कि किसी तरह से अपनी स्टेट में अपना दबदबा कायम रखा जा सके। सबको इसी बात की चिंता है। और ये सब जानते हैं अंदर ही अंदर। इसलिए कोई भी नेता किसी को आगे बढ़ने का मौका नहीं देता है। चाहे वो कोई भी हो। चेहरा जो है गठबंधन का विपक्ष का जो गठबंधन है उसका चेहरा कोई प्रोमिनेंट इसलिए भी बनकर नहीं आया है क्योंकि हर कोई अपने लीडर को चेहरा बनाना चाहता है और ऐसे में ममता की ये कोशिश जो है कितनी कामयाब होगी कौन उन्हें एक्सेप्ट करेगा जल्दी आने वाला समय बता देगा

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