New Delhi: Congress leaders Rahul Gandhi and Priyanka Gandhi Vadra gather to pay their respects as the mortal remains of late former Prime Minister Manmohan Singh arrive at the All India Congress Committee (AICC) headquarters on Saturday, December 28, 2024. (Photo: IANS)

राहुल गांधी के हाथ से बात निकली अब किया प्रियंका को आगे

कर्नाटक में चीजें उलझती जा रही हैं, उसको देखकर के यह लग रहा है कि अब वहां की समस्या का समाधान प्रियंका गांधी के बस का ही है और प्रियंका गांधी ही वहां की समस्या का समाधान करेंगी। दोनों नेताओं को दिल्ली बुला लिया गया है। पहले सिद्धारमैया को बुलाया गया था। उसके बाद अब डीके शिव कुमार को बुलाया गया है। समस्या का समाधान सिर्फ किसी न किसी बदलाव से होगा अब इस पूरी दौड़ में मुख्यमंत्री के पद के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम भी आ गया है और एक कॉम्प्रोमाइज कैंडिडेट के रूप में उनका नाम भी चलाया जा रहा है। लेकिन क्या उस कॉम्प्रोमाइज कैंडिडेट को डीके शिवकुमार स्वीकार करेंगे? यह एक बड़ी बात है। डीके शिवकुमार लगातार दबाव बनाए
हुए हैं केंद्रीय नेतृत्व पर और इस पूरे दबाव को अब तक किसी तरह से टाला गया था। लेकिन जब से प्रियंका गांधी के इंटरवेंशन के बाद से केरल में मुख्यमंत्री का फैसला हो गया और वि डी सतीशन के नाम पर सहमति बनी और उसमें प्रियंका गांधी की बड़ी भूमिका थी तो ऐसा कहा जा रहा है और ऐसा माना जा रहा है कि कर्नाटक की गु्थी सुलझाने में भी प्रियंका की बड़ी भूमिका हो सकती है और वो इस पूरे मामले को सुलझाने के लिए आगे आएंगी और उनके प्रपोजल को शायद ना कर पाना दोनों ग्रुपों के लिए मुश्किल होगा और एक सहमति बनेगी। हालांकि अगर इसमें कोई बदलाव नहीं होता है मतलब अगर डी के शिवकुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है तो अगले चुनाव में हर तरह से कर्नाटक में कांग्रेस को मुश्किल होने वाली है और इन सबके मद्देनजर ऐसा ही लगता है कि डी के शिव कुमार को वहां पर उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा जैसा वह दावा करते हैं कि जब चुनाव हुए थे पिछले तो ऐसी सहमति बनी थी कि उनको आधे टर्म के बाद मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी दी जाएगी और वह लगातार यही बात दोहरा रहे हैं। तो क्या प्रियंका गांधी के इंटरवेंशन से ऐसा हो पाएगा? देखने देखते हैं लेकिन दोनों नेता अपने अपने स्टैंड पर कायम है।

Mamta बंगाल में दाल नहीं गल रही गठबंधन में फेस बनने की कोशिश


ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में बुरी तरह से हारी हैं। अब पश्चिम बंगाल में वो विधायक भी नहीं है। कोई काम नहीं है करने के लिए वहां पर और विरोध की अभी बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं है। एक हफ्ते से कम हुए हैं सरकार को बने हुए। तो उसके बाद ऐसा लग रहा है कि वहां पर तो अब वह कुछ राजनीति नहीं करेंगी लेकिन केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो सकती हैं और इसीलिए वो लगातार जो कांग्रेस के अलावा जो अलग और राजनीतिक दल हैं चाहे डीएम के हो समाजवादी पार्टी हो या और जो राजनीतिक घटक हैं उनको अपने साथ मिला करके एक अलग गुट बना के भाजपा के खिलाफ एक कैंपेन करने की तैयारी में है। अब वह कैंपेन करने की तैयारी में है। लेकिन जिस तरह से उनका व्यवहार होता है, जितनी मरक्यूरियलराजनीति वो करती हैं। उन परिस्थितियों में क्या उनको कोई स्वीकार करेगा? और दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस जो है वह अभी भी लोकसभा में सबसे बड़ा दल है 99 सीट्स के साथ। तो क्या कोई 99 सीट वाले दल को छोड़ के एक ऐसे राजनीतिक दल को के नेतृत्व में आगे आएगा या उस पर सहमति बनेगी जो खुद सबको लेकर के चलने में असहज रहती है और दूसरा ये कि बहुत प्रिडिक्टेबल है क्या और इसके अलावा महत्वपूर्ण बात ये है कि ममता बनर्जी का जो बेस है, जो मजबूत जो आधार था, वह पश्चिम बंगाल था, वहीं से वह अपरूप हो गई हैं। अब उनके पास वहीं पर कुछ नहीं बचा हुआ है और वो बुरी तरह से वहां पर हारी हैं। उसके बाद भी उनके नेतृत्व को कोई स्वीकार करेगा और क्यों स्वीकार करेगा और वो भी कांग्रेस की कॉस्ट पर। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस से जिस तरह से डीएमके नाराज हुआ है। उदयनिधि स्टालिन ने तो कांग्रेस को जोक तक कह दिया मतलब लीच मतलब जो पैरासाइट है दूसरों पर पलता है, उसके बाद और भी बहुत सारे राजनीतिक दल हैं। समाजवादी पार्टी ने भी आलोचना की है। कांग्रेस की बसपा पहले से ही आलोचना करती रही है। आंध्रा का जो विपक्ष है वो भी उसके अलावा उड़ीसा का जो विपक्ष है वो लगातार उनसे दूरी बना करके ही रखते हैं कांग्रेस से।

 

अन्नामलाई की बात सुनते तो तमिलनाडू में BJP को मुंह की ना खानी पड़ती


तमिलनाडु में जिस तरह से जो दोनों द्रविड़ राजनीतिक दल हैं जो जिनकी राजनीति का केंद्र द्रविड़ पॉलिटिक्स है द्रविड़ मुनेत्रगम और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्रगम इनकी दोनों की चुनावी हार हुई है और बहुत बुरी चुनावी हार हुई है। अब इसके बाद जिस तरह से डीएमके है वह सत्ता में दो बार रहने के बावजूद तीसरी बार जो है वो दूसरे नंबर पर आई मतलब विपक्ष के नेता विपक्ष के दल के रूप में जबकि एआईडीएम के तीसरे स्थान पर आई और वो लंबे समय से सत्ता में दूर है। उसके अलावा सत्ता में दूर होने के साथ-साथ उनका कोई केंद्रीय ऐसा नेतृत्व या कोई ऐसा केंद्रीय आधार नहीं है जिसके कारण पूरा का पूरा राजनीतिक संगठन एक साथ जुड़ा रहे। जो नेता हैं उनके चाहे पलनी स्वामी हो या बाकी और कोई नेता हो उनकी उस तरह की अपील नहीं है ना पार्टी में ना प्रदेश में। तो सारे लोगों को बांध करके रखना यह एक बड़ी चुनौती है और उसका परिणाम यह हो रहा है कि किसी न किसी बहाने एआईएडीएमके के बहुत सारे विधायक ना केवल सपोर्ट करते हुए नजर आ रहे हैं को विजय को बल्कि बहुत सारे लोग इस फिराक में हैं कि किसी तरह से वह साइट स्विच कर जाए और उनमें से तीन ने किया भी है। अब यह तो तब है जब तुरंत चुनाव हुए हैं। क्या इस तरह से अगर चलता रहा तो जो सारे के सारे नेता हैं या सारे के सारे विधायक हैं इनको होल्ड कर पाएगी एआईएडीएमके या एआईएडीएमके जो है वो अपना जो आधार है वो धीरे-धीरे खो देगी। यह एक बड़ी चुनौती है। अब क्या डीएमके एक नया राजनीतिक समीकरण उभरेगा या इन नेताओं को इन लोगों को भारतीय जनता पार्टी अपने तरफ मोड़ पाएगी। इसलिए कि अन्नामलाई लगातार यही कहते रहे हैं कि हमको अपना एक आधार बनाना होगा और अपने आधार में बिना किसी उसके हिंदुत्व की राजनीति करते हुए सनातन की राजनीति करते हुए अपने एक आधार पर चुनाव लड़ना होगा। हम एक चुनाव हारे, दो चुनाव हारे। लेकिन हमको अपनी आईडियोलॉजी से कंप्रोमाइज नहीं करना चाहिए। अगर हमको तमिलनाडु में अपने आप को मजबूत करना है और चुनावी राजनीति में अह अपनी पकड़ बनानी है। ये एक बहुत फ्लूइड सिचुएशन है तमिलनाडु में। और ये डेवलपमें धीरे-धीरे नजर आएंगे। कहां किस तरफ रुख होता है।

 

BJP उड़ीसा में बढ़ता जा रहा है साम्राज्य

उड़ीसा की नवीन पटनायक की के नेतृत्व वाली राजनीतिक दल है। बीजू जनता दल। वो उसमें वो 2024 में चुनाव हार गई अपना विधानसभाका। वहां पर बीजेपी की सरकार बनी। लेकिन बीजेपी की सरकार बनना एक बात है और वहां बीजू जनता दल का लगातार कमजोर होना दूसरी बात है। चुनाव होने के बाद मतलब 2024 के चुनाव के बाद से तीन राज्यसभा सदस्य अपना पाला बदल चुके हैं। सबसे पहले ममता महंता ने राज्यसभा बदला राज्यसभा छोड़ी थी। उसके बाद वो बीजेपी ज्वाइन कर ली। फिर बीजेपी ने उनको राज्यसभा भेज दिया। दूसरे राज्यसभा सदस्य हैं सुजीत कुमार। उन्होंने भी राज्यसभा छोड़ा। अब तीसरे जो सदस्य हैं महत्वपूर्ण हैं देवाशीष सामंत राय। अब देवाशीष सामंत राय ने भी अपना वो राज्यसभा छोड़ दिए मतलब पार्टी की सदस्यता छोड़िए, राज्यसभा छोड़िए। तब उनके पास जो है अह जो बात कही जा रही है कि उनको भारतीय जनता पार्टी में जल्दी ही वह शामिल होंगे और उन्होंने आरोप लगाया कि वो इतना पार्टी के लिए करते हैं लेकिन उनकी बात पार्टी में नहीं सुनी जाती और सबको मालूम है कि किस तरह से वहां पर जो एक ब्यूरोक्रेट थे उन्होंने पार्टी पर कब्जा कर लिया है और उसमें नवीन पटनायक की अब चलती नहीं। इसके कारण भी रिसेंटमेंट है। तो क्या यह रिसेंटमेंट काफी है? क्या इसी कारण से वहां से लोग बदल रहे हैं? या अब लोगों को लग रहा है कि बीजूद जनता दल की राजनीति उड़ीसा में खत्म हो गई है और जिस तरह से बीजेपी ने वहां पर सत्ता पर कब्जा किया है और जिस तरह से वो काम कर रही है उसके बाद से संभावनाएं भारतीय जनता पार्टी की वहां ज्यादा मजबूत हैं बीजू जनता दल के तुलना में। तो इसलिए भी लोग पाला बदल रहे हैं। और दूसरा यह कि स्वास्थ्य कारणों से नवीन पटनायक जो है वह अब पार्टी पर उतनी पकड़ नहीं बना के रख पाए हैं। जब पार्टी पर नहीं पकड़ होगी, जनता पर भी नहीं पकड़ होगी। तो कोई ना कोई अल्टरनेटिव होगा उन परिस्थिति में पार्टी का जो ग्लू वाला फोर्स होता है जो जोड़ने वाला फोर्स होता है जो एडेसिव फिगर होता है अगर वही इनफेक्टिव हो जाता है तो लोग अपना रास्ता खोजने लगते हैं और वैसा ही होता हुआ उड़ीसा में दिख रहा है तो क्या ऐसा लगता है कि बहुत सारे और लोग बड़े नेता तो बीजू जनता दल छोड़ के आएंगे। अभी की परिस्थिति को देखकर तो ऐसा ही लगता है।

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