सरकार झुकी, प्रधान का त्यागपत्र लेकिन क्या आंदोलन हाईजैक हुआ

नीट परिक्षाओं में हुई गड़बड़ियों के विरोध में दिल्ली के जंतर मंतर और संसद मार्ग पर चल रहा प्रदर्शन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र और दो अन्य मांगो के पूरा होने के साथ ही समाप्त हो गया। सरकार ने इसे छात्रों के प्रति संवेदनशीलता कहा और छात्रों ने कहा की उन्होंने सरकार को झुका दिया। जो मामला कॉकरोच जनता पार्टी ने शुरू किया था वह मामला धीरे धीरे राजनीतिक हांथो में भी चला गया था, हालाँकि परीक्षा देने वाले छात्र इस विरोध प्रदर्शन का हिस्सा कह ही थे। महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉकरोच वाला कमेंट सरकार का नहीं बल्कि उच्चयतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का था लेकिन बहुत चतुराई के साथ इसे सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करने में इस्तेमाल कर लिया गया। मुख्या न्यायाधीश का कमेंट नीट छात्रों पर तो बिलकुल ही नहीं था। हालाँकि NEET परीक्षा में हुई गड़बड़ियों पर आँख बंद नहीं किया जा सकता और प्रधान की जवाबदेही तो थी ही इस मामले में। अमेरिका में बैठे 30 वर्षीय अभिजीत दीपके को भारत में परीक्षा में गडबडियों को सुधारने की प्रेरणा आई और वे भारत पहुंच गए आंदोलन करने।

सोनम वांगचुक की वजह से क्या आंदोलन आगे बढ़ा

उनके समर्थन में लदाख से सोनम वांगचुक भी आ गए जो लगातार इस तलाश में थे कि कोई विषय मिले विरोध प्रदर्शन का और बैठे बिठाये उन्हें कॉकरोच जनता पार्टी के द्वारा शुरू किये गए आंदोलन में छात्रों का मसीहा बताते हुए आगे कर दिया गया। वांगचुक भूख हड़ताल पर थे और जब सरकार ने उन्हें जंतर मंतर से उठाकर सफदरजंग अस्पताल में रखा तो कैटल क्लास पसंद नहीं आया और उनकी पत्नी गीतांजलि आगमों अदालत पहुंच गई कि उन्हें पंचसितारा मेदांता में रखा जाना चाहिए। अदालत ने इसे स्वीकार भी कर लिया और पांच सितारा अस्पताल में भी भूख हड़ताल कुछ दिन जारी रही।इस बीच संसद का मानसून सत्र शुरू हो गया और सभी राजनितिक दल के सांसद दिल्ली पहुंच गए और विरोध प्रदर्शन को ताकत मिली जो लगभग मृतप्राय पड़ा हुआ था। लेकिन इन परिस्थियों ने इस आंदोलन को जो ताकत दी, क्या कोई राजनितिक दल किसी दुसरे संगठन को इस तरह से मजबूत करना चाहेगा। आम आदमी पार्टी का उदय इसका उदाहरण है जिसने कांग्रेस को दिल्ली और पंजाब में सबसे ज्यादा नुकसान किया। इसी कारण कांग्रेस नेता राहुल गाँधी जंतर मंतर जाने से बचते रहे।

डिंपल यादव पहुंची तो पूरा विपक्ष पर जैसे credit लेने की होड़ मची


लेकिन जब समाजवादी पार्टी की डिम्पल यादव विरोध प्रदर्शन स्थल पर पहुंची तब से राजनितिक दलों के नेताओं में होड़ लग गई और सबका दावा एक ही था कि वे ही छात्रों के असली शुभचिंतक हैं। आम आदमी पार्टी लगातार जंतर मंतर पर पहुंच रही थी और इस प्रदर्शन को समर्थन कर रही थी लेकिन इस मामले में वे कांग्रेस और भाजपा की मिली भगत बता रहे थे। ऐसा ही कांग्रेस का आम आदमी पार्टी के बारे में विचार था। सोनम वांगचुक की पत्नी ने तो राहुल गाँधी पर इस आंदोलन के माध्यम से अपना राजनितिक हित साधने का आरोप तक लगा दिया था। उनका कहना है कि अगर राहुल गाँधी छात्रों के साथ है तो उन्हें जंतर मंतर पर प्रदर्शन करना चाहिए था न की प्रधानमंत्री आवास के बाहर। अगले ही दिन सोनम वांगचुक ने अपना 26 दिन लम्बा अनशन केंद्रीय स्वास्थ मंत्री जगत प्रकाश नड्डा और प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जीतेन्द्र सिंह की उपस्थिति में सशर्त समाप्त कर दिया। हिंसा ने भी इस आंदोलन की छवि को नुकसान पहुंचाया क्योंकि अब तक 120 से ज्यादा पुलिस वाले घायल हो चुके है लेकिन लाठी चार्ज में 80 प्रदर्शनकारियों के घायल होने की खबर है जिसमे 2 के ICU में होने की भी सूचना थी। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि कुछ राजनेता इस हिंसा को या तो सीधे तौर पर या छिपे तौर पर समर्थन करते नजर आये। प्रदर्शनकारियों के द्वारा की गई हिंसा पर न केवल चुप्पी साधी बल्कि उन्हें बचाने के लिए उनके खिलाफ किसी कार्यवाई का विरोध किया और उनसे सरकार से की जाने वाली मांगो में शामिल किया है।

आंदोलन में गलत लोगों की भी हुई एंट्री


सरकार उन सभी जगहों पर निगरानी बनाये रख रही थी जहाँ से हिंसा की सम्भावनाये थी और उन लोगो पर भी नजर थी जो हिंसा कर सकते थे। लेकिन इस आंदोलन को राजनितिक दलों ने और उनके छात्र विंग ने कब्ज़ा कर लिया था विशेष रूप से बामपंथी छात्र दलों ने जो न केवल छात्रों को उकसा रहे थे बल्कि प्रधानमंत्री के खिलाफ अभद्र भाषा का भी उपयोग कर रहे थे। इसके अलावा इसमें आपराधिक तत्वों ने घुसपैठ कर ली थी जो देश में हिंसा फैलाना चाहते थे। इन सबके बीच राजनितिक दल और अन्य प्रदर्शनकारी अलग-अलग खेमों में बंट गए। अभिजीत दीपके, सोनम वांगचुक, कांग्रेस और आप सब एक दूसरे पर हमलावर थे हालाँकि धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र पर सबकी सहमति रही।
आंदोलन के दौरान दिल्ली के पुलिस आयुक्त को बदलना भी आंदोलन से निपटने की योजना का हिस्सा था क्योंकि व्यापक हिंसा की खबरों कि ख़ुफ़िया जानकारी थी। सरकार का प्रधान से त्यागपत्र लेने के कारणों में प्रमुख रूप से अपने को संवेदनशील दिखाना, राजनितिक दलों को इसका श्रेय न लेने देने, इसे CAA और कृषि आंदोलनों जितना लम्बा खींचने से रोकना और इसमें शामिल उन लोगो को सामने लाना था जो लोग प्रधानमंत्री को प्रदर्शन के दौरान गालियां दी जा रही है और हिंसा फैलाना चाहते थे। जिस तरह के पोस्टर बनाये गए थे उससे साफ़ था कि ये छात्र नहीं है बल्कि असामाजिक तत्व है जो छात्रों के विरोध प्रदर्शन में शामिल है। इन लोगो पर न तो अभिजीत दीपक का नियंत्रण है और न ही सोनम वांगचुक का और ये ही पूरे विरोध प्रदर्शन और आंदोलन को नुक्सान पहुंचा रहे थे। सरकार लगातार इस बात को साफ़ कह रही थी की वह छात्रों के समर्थन में है कि परीक्षा व्यवस्था में सुधार किये जाने की जरुरत है और सरकार इस सम्बन्ध में लगातार कदम उठा रही है।

 

काश सरकार पहले ही गंभीर हो जाती

सरकार ने दोनों केंद्रीय शिक्षा सचिवों को बदल दिया, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी में चार नए अधिकारी पहले ही नियुक्त कर दिए गए थे , कैबिनेट ने एक परीक्षाओं में गड़बड़ी रोकने के लिए सख्त कानून को स्वीकृति दे दी है और 47 लोगों को सेवामुक्त कर दिया है। सरकार यह बताने की कोशिस कर रही है कि वह इस मामले में संवेदनशील है इसे सुधरने का हर संभव प्रयास कर रही है। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से कम पर मानने के लिए तैयार नहीं था। सरकार झुकी और प्रधान ने इस्तीफा दिया और गतिरोध समाप्त हुआ। इन सबके बीच सरकार की इमेज को धक्का तो लगा ही भविष्य का खतरा भी बरक़रार है।