अखिलेश यादव की लुटिया उनके अपने नेता ही डूबा रहे हैं
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ताओं ने जिस तरह से अपने आप को टेलीविजन डिबेट्स में कंडक्ट कर रहे हैं उसको देख के अखिलेश यादव की चिंता बढ़ गई है। इसलिए कि ये समाजवादी पार्टी का फायदा पहुंचाने के बजाय नुकसान पहुंचाते हुए नजर आते हैं। इनकी प्रवक्ताओं की सूची है उसमें सबसे प्रमुखता से जो नजर आते हैं वो है राजकुमार भाटी। अब राजकुमार भारती कभी भगवान राम पर, कभी भगवान कृष्ण पर, कभी कुछ और विषयों पर कमेंट करते हुए नजर आते हैं। कभी ब्राह्मणों पर, कभी किसी और जाति पर और वो बड़ा तीखा कमेंट होता है, अपमानजनक कमेंट होता है। इसको लेकर के विरोध भी होता है। बहुत सारी चीजें होती हैं और जिस तरह से वो व्यवहार करते हैं। वो किसी न किसी तरह से एक वर्ग को एलिनेट करता है। अब अगर उत्तर प्रदेश में रहकर के जिस तरह से पीडीए का नारा दे रहे हैं और पीडीए भी एकसाथ समाजवादी पार्टी को नहीं जा रहा है। उस परिस्थिति में लगभग 25% मतदाताओं को मतलब मैं अपर कास्ट मतदाताओं की बात कर रहा हूं। आप अलग कर रहे हैं तो आप 2027 का चुनाव किस बलबूते पर लड़ेंगे? यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। तो केवल राजकुमार भाटी ही नहीं और प्रवक्ता जैसे मनोज यादव। मनोज यादव भी इसी तरह के तीखे और अपने जो डिबेट में उनके साथ प्रवक्ता होते हैं, एंकर होते हैं, उनके साथ बदतमीजी वाली बात करते हैं और ये दूसरा मनोज सिंह काका वो थोड़ा सा सॉफ्ट सोबर दिखते हैं लेकिन भाषा के तौर पर यह जो तरीका है वो भी उसी तरह का होता है। अब फराज किदवई साहब अभी जब बड़ा मंगल आया था तो सबने हनुमान जी को लेकर के सबको शुभकामनाएं दी थी और उसी दिन एक डिबेट में फराज किदई साहब हनुमान चालीसा पढ़ते नजर आए। अब एक तरफ भगवान राम के और बाकी हिंदू देवी देवताओं सिंबल्स को गाली दी जाती है। रामचरितमानस के बारे में भला बुरा कहा जाता है। दूसरी तरफ फराज किदवाई साहब से हनुमान चालीसा का पाठ हो रहा है। तो अब उससे क्या मुस्लिम मतदाता खुश होंगे या हिंदू मतदाता खुश होंगे? क्या स्ट्रेटजी है? क्या करना चाहते हैं? ये नहीं समझ में आ रहा है। और तब जब लगभग एक साल चुनाव के बचे हुए हैं उत्तर प्रदेश में। इस तरह के स्ट्रेटेजिक कहीं से भी समाजवादी पार्टी को फायदा करते हुए नहीं नजर आ रहे हैं। तो अब इस पे समाजवादी पार्टी का अखिलेश का क्या रुख होता है यह तो आने वाला समय बताएगा
एक नारा उठा क्या करेगा योगी जी को परेशान
पीआईएल मैन के नाम से जानने जाने जाने वाले अश्विनी उपाध्याय ने तीन चार दिन पहले एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने यह बात कही थी कि उत्तर प्रदेश का जो बुंदेलखंड इलाका है वो और मध्य प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका है वह मिलाकर के एक बुंदेलखंड प्रांत बनाए जाने की जरूरत है। अगर उस क्षेत्र को उस क्षेत्र में विकास पहुंचाना है तो बुंदेलखंड का इलाका सांस्कृतिक सांस्कृतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन आर्थिक रूप से वो बहुत ही पिछड़ा हुआ है। खेती बहुत वहां की समृद्ध नहीं है। उसका कारण यह है कि वहां पर पानी नहीं है। वहां पानी बहुत गहरा है। अभी सरकार ने जो पहली रिवर लिंकिंग योजना को सक्सेसफुली इंप्लीमेंट किया है उसमें केन बेतवा है जो उस क्षेत्र से बहती है। लेकिन केन बेतवा कितना फायदा पहुंचा पा रही हैं। कितने इलाकों में और क्या जरूरतें हैं। उसके मद्देनजर वहां के लोगों की यह मांग है या लोगों को यह लगता है कि जब तक इस प्रदेश को जब तक इस क्षेत्र को एक प्रदेश के रूप में विकसित नहीं किया जाएगा तब तक यहां पर डेवलपमेंट संभव नहीं है। और उसके लिए गाहे बगाहे वहां डिमांड उठती रही है। लेकिन अब एक ऐसे व्यक्ति के तरफ से इस तरह की मांग उठना जो संघ की तरफ से जो संघ का काफी नजदीकी है और भारतीय जनता पार्टी में ठीक-ठाक पहुंच है, वो प्रदेश प्रवक्ता भी रह चुका है और एक के बाद एक पीआईएल डाले जाने के लिए मशहूर है और उस पीआई उन पीआईएल में बहुत सारे परिणाम भी आए हैं। एसआईआर के पीआईएल की बात कर लें। आप 370 के पीआईएल की बात कर लें। जनसंख्या को लेकर के उनका पीआईएल है। वक्त को लेकर के उनका पीआईएल लगभग 250 100 से 300 तक पीआईएल उन्होंने फाइल किया है। काफी और इस नाते ही उनको जाना जाता है। उनका ट्वीट करना अपने आप में एक महत्वपूर्ण बात है। अब क्या इसके कारण लखनऊ में जो है माहौल, उसमें थोड़ा सा चौकन्नापन आएगा या योगी जी इसको किस तरह से देखेंगे यह अलग मसला है। लेकिन अगर आप इस विषय की बात करें तो यह विषय निश्चित तौर पर महत्वपूर्ण है और इस पर सरकारों को संज्ञान लेने की जरूरत है।वैसे भी भारतीय जनता पार्टी हमेशा से छोटे प्रदेशों के पक्ष में रही है और इसीलिए उन्होंने झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों का और उत्तराखंड जैसे राज्यों का निर्माण भी किया था। बुंदेलखंड भी उनके प्रॉमिससेस में था। यहां तक कि मायावती भी इसको समर्थन करती रही हैं। अब आगे देखते हैं इस पर क्या मामला फंसता है।
क्या राहुल गांधी के बयान पर ताली बजाने वाले उनहें जिता सकते हैं
प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमला करना राहुल गांधी की फितरत बनती जा रही है। अनगिनत ऐसे मामले हैं जहां वह प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले करते हैं। अब यह जो नया मामला आया है प्रधानमंत्री गद्दार हैं। अब प्रधानमंत्री गद्दार के लिए किस दृष्टि से हैं? क्या उन्होंने देश के साथ गद्दारी की है? यह तो राहुल जाने। लेकिन राहुल क्यों ऐसा करते हैं? राहुल को शायद यह मालूम है कि जो चुनावी स्ट्रेटजी है, जो चुनावी प्रबंधन है, चुनावी प्रबंधन में , इस प्रबंधन में बुरी तरह से एक्सपोज होते हुए नजर आ रहे हैं। कहीं पर भी दूर-दूर तक सफाया होता जा रहा है। अब राहुल गांधी को शायद लगता है कि उनकी जो स्ट्रेटजी चुनाव वो इस तरह से नहीं जीत सकते हैं। तो किसी तरह से प्रधानमंत्री के बारे में लोगों के मन में शंका पैदा करो। अब लोगों के मन में शंका पैदा करके अगर चुनाव जीत पाते तो कब का चुनाव जीत गए होते? राहुल गांधी को एक और कंफ्यूजन है कि उनके प्रधानमंत्री के बारे में जब इस तरह के वो बयान देते हैं तो तालियां बजती हैं। तो उन सबको मालूम है कि एक विशेष मतलब एक ग्रुप जो है वो निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं पसंद करता है तो उन बातों पर वो तालियां बजाता है। तो क्या उतनी तालियां चुनाव जीतने के लिए या उनकी राजनीति के लिए काफी है? इस पर बहुत ध्यान से कांग्रेस को चिंतन मनन करने की जरूरत है। कि क्या और यह वो इसमें से बड़ा वर्ग जो है वो 80 70 से 80% जो है वो जिसको आप माइनॉरिटी वोटर्स कह लीजिए जो मोदी से घृणा करता है वो तालियां बजाता है। लेकिन क्या उतने से कांग्रेस का काम चल जाएगा? महत्वपूर्ण प्रश्न है।
