1990 यानी मंडल कमीशन के समय क्षेत्रीय दलों की बजती थी तूती
क्या देश में क्षेत्रीय दल खत्म होने की कगार पर पड़े हैं। वही क्षेत्रीय दल है जिनकी साल 1990 के आसपास खासतौर पर मंडल कमीशन के बाद भारतीय राजनीति में तूती बोलती थी, क्षेत्रीय नेताओं की पॉलिटिक्स में बहुत ज्यादा पकड़ थी, नाम लेना चाहे तो लिस्ट काफी लंबी है – लालू प्रसाद यादव ,मुलायम सिंह यादव जय ललिता ,करुणानिधि, प्रकाश सिंह बादल , ममता बनर्जी मायावती , राजशेखर रेड्डी , चंद्रशेखर राव और हाल फिलहाल में सामने आए केजरीवाल, पर धीरे-धीरे ये राजनीतिक क्षेत्रीय दल खत्म होने के कगार पर खड़ें हैं। खासतौर पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में जो कुछ हुआ उससे लग रहा है कि क्षेत्रीय दलों की राजनीती हाशिए पर पहुंच गई है, पिछले 30-३५ सालों में क्षेत्रीय दल अपने राज्यों के राजा होते थे, यही नहीं नेशनल लेवल पर जो सरकार बनाने के लिए, क्षेत्रीय दलों से ही समझौता करना पड़ता था,
2014 के बाद से हाशिए पर पहुंच रहे क्षेत्रीय दल—70 फीसदी जगह हुआ भगवाकरण
केंद्र में अब तक जितनी सरकारें बनी है उसमें ज्यादातर में क्षेत्रीय दलों की अहम भूमिका रही है और सबसे ज्यादा चर्चा में रही थी अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार देखें, 11 क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर सरकार चला रहे थे और ये बात एक मजाक में भी कही जाती है थी। अटल बिहारी वाजपेयी का ज्यादातर समय तीन देवियों को मनाने में लग जाता है। वो देवियां जो जुड़ी हुई थी उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में ममता बनर्जी, मायावती और जय ललिता। क्योंकि उस समय क्षेत्रीय दलों का पूरा रौब रहता था, वैसे अगर हम करंट सरकार भी देखें यानी वो भी मोदी सरकार वो भी दो दलों के सहयोग से खड़ी है और इससे पहले upa भी क्षेत्रीय दलों के साथ ही चल रही थी, पर अब अंतर ये है कि ना तो इन दलों का इतना दबदबा है ना ही नीती निर्धारण में कोई सलाह भी मानी जाती हो। इनका वजूद ही धीरे धीरे खत्म हो रहा है और पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव के बाद तो एक क्लियर मैसेज सामने आ गया कि क्षेत्रीय दल अब खत्म होने के कगार पर है। इसकी शुरूआत मोदी के केंद्र में आने के बाद से ही होनी शुरू हो गई थी, 2014 के बाद जब से मोदी केंद्र में आए हैं तब से देखा गया है कि मोदी ने ना केवल केंद्र में बल्कि राज्य सरकारों में भी बड़े-बड़े नेताओं को शिकस्त दी है और वहां पर अपनी सरकार बनानी शुरू कर दी है। और इस समय माना जाता है कि देश में लगभग 70% राज्यों – केंद्र शासित प्रदेश हैं वहां पर बीजेपी की डोमिनेंस है। मतलब भगवाकरण देश के 70% भाग में हो गया और क्षेत्रीय दल है अपने आप में सिमटते जा रहे हैं
2014 यानी मोदी की आगमन और क्षेत्रीय दलों की धीरे-धीरे विदाई
इन सालों में बीजेपी ने बहुत से राज्यों में टेकओवर कर लिया है। बिहार से ही शुरुआत करते हैं क्योंकि बिहार में भी अभी हाल हीमें चुनाव हुए हैं कि वहां पे जेडीयू को किस तरह से बीजेपी ने सफाई से रिप्लेस कर दिया और अपना मुख्यमंत्री बीजेपी का बन गया। सालों साल वहां नीतीश कुमार का राज था। नीतीश गए तो जेडीयू में इतना वो कहते है ना ताकत नहीं रही है और इतना कुछ उसमें दमखम नहीं रहा है क्योंकि बीजेपी ने वहां पे किसी ना किसी तरह से रिप्लेस कर दिया। उसके बाद हरियाणा की बात करें। हुड्डा और चौटाला का वहां पे बोलबाला तू ही बोलती थी लेकिन वहां पर भी बीजेपी घुस गई है पूरी तरह से और डोमिनेंस जो है बीजेपी की हो गई है। इसी तरह से अगर हम दिल्ली की बात करें तो बीजेपी ने केजरीवाल को हराया , एक ऐसा दल जो बहुत बड़ा दल बन कर उभर रहा था।यूपी की बात करें तो योगी ने मायावती को तो पहले ही खत्म कर दिया और जो छोटे-छोटे क्षेत्रीय दल थे वो योगी के साथ ही टिके हुए हैं। उनका कोई वजूद नहीं है। थोड़ा बहुत अखिलेश यादव वहां पे चल रहे हैं लेकिन उनका भी किला धीरे-धीरे ध्वस्त होता नजर आ रहा है। इसके साथ नॉर्थ ईस्ट के कई ऐसे राज्य हैं जहां पर सिर्फ क्षेत्रीय दल ही राज करते थे। लेकिन अब वहां पर बीजेपी की सरकार है। असम में अगर हम देख तो कई क्षेत्रीय दल है उनका सूपड़ा साफ हो चुका है। वहां पे बीजेपी ने टेकओवर कर लिया है और तीसरी बार वहां पे बीजेपी के मुख्यमंत्री बन रहे हैं। बहुत बड़ी बात है ये। इसके बाद हम साउथ की अगर बात करें तो आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू ठीक है मुख्यमंत्री हैं। लेकिन उससे पहले जो राजशेखर रेड्डी थे उसके बाद जगन रेड्डी ने वहां पे सरकारें चलाई। क्षेत्रीय दल बहुत स्ट्रांग था। लेकिन बीजेपी ने वहां के क्षेत्रीय दल की मदद से यानी चंद्रबाबू नायडू की पार्टी की मदद से उसको भी रिप्लेस कर दिया। इसके बाद अगर हम तेलंगाना चलें तो वहां पर चंद्रशेखर राव की जो सरकार थी ,उनको चाहे बीजेपी ने नहीं पर कांग्रेस ने रिप्लेस कर दिया। उड़ीसा में इतने सालों साल से क्षेत्रीय दल चल रहा था बीजू पटनायक उसके बाद नवीन पटनायक उसको भी बीजेपी ने उखाड़ फेंका तो तमाम राज्यों में बीजेपी सबको रिप्लेस करती जा रही है और या कहिए उनको खत्म करती जा रही है।
परिवारवाद बना एक बड़ा काऱण दलों के हाशिए पर पहुंचने का
अब यह बात अलग है कि इसके पीछे मोदी गवर्नमेंट की मोदी सरकार की अपना एक विज़न है। अपनी एक पॉलिसी है। अपनी एक विकास की उनकी नीति है। लोग उनसे खुश हैं, और बड़ी वजह है , जो विषय विशेषज्ञ मानते हैं कि ये क्षेत्रीय दल खत्म हो रहे हैं? लेकिन दूसरी इसकी एक बड़ी वजह मानी जा रही है परिवारवाद , जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल खत्म हो रहे हैं वहां परिवारवाद एक बड़ा कारण है जो जनता के साथ उनके अपने कार्यकर्ताओं, नेताओं को उन्हें छोड़ने पर मजबूर कर रहा है। यहां राजनीति घर की पॉलिटिक्स बन गई है एक बिज़नेस बना लिया गया है कि बाप के बाद बेटा और फिर आगे उसका बेटा, मतलब बाहर के पढ़े लिखे काबिल नेताओं की पार्टी के सुप्रीम पद के लिए कोई जगह नहीं है। शुरुआत अगर हम पंजाब पंजाब से करें तो शेरोमणि अकाली दल है प्रकाश सिंह बादल के बाद उनका बेटा मुलायम सिंह यादव की बात करें तोअखिलेश यादव वहां आ गए। बिहार की बात करें तो लालू यादव के तेजस्वी यादव यहां आ गए हैं। हरियाणा में बात करें तो चौटाला फैमिली चली जा रही है। हुड्डा फैमिली चली जा रही है। उड़ीसा का एग्जांपल बहुत बड़ा है बीजू पटना उसके बाद नवीन पटनायक , बंगाल में माना जा रहा है कि ममता बनर्जी ने जब से अभिषेक बनर्जी को सामने लाया तो सबसे पहले जो शुभेंदु अधिकारी ने वहां बगावत की उसकी एक बड़ी वजह अभिषेक बनर्जी थे तो कि क्योंकि शुभेंदु अधिकारी ने खुलकर अभिषेक का विरोध किया था कि परिवार के लोग को क्यों लाया जा रहा है जो जेन्युइन लोग पार्टी में है उनको नेता क्यों नहीं बनाया जा रहा । तेलांगना में चंद्रशेखर राव की पार्टी ने तो परिवारवाद में सबको पीछे छोड़ दिया, बेटों, बहूओं, दामाद से लेकर अपने भाईयों उनके परिवारों को भी सरकार में घुसा दिया। उसी तरह से राजशेखर रेड्डी के बाद उनके बेटे जगन रेड्डी आ गए। तमिलनाडु की बात करें। करुणानिधि और एम रामचंद्र के परिवारों के आसपास ही राजनीती दल बनते रहे। तो क्षेत्रीय पार्टी कम हुई और इसकी एक बड़ी वजह जो मानी जा रही है वो परिवारवाद है क्योंकि कहीं ना कहीं जो प्रोमिनेंट लीडर्स हैं जो
पार्टी के लिए बरसों से काम कर रहे हैं उन्होंने भी पार्टी को इसी कारण छोड़ा या अंदर ही अंदर उनका विरोध पनपा क्योंकि उनको मौका नहीं दिया गया और अंदर ही अंदर कहते हैं ना कि जब कार्यकर्ता नाराज होंगे आपके अच्छे नेता नाराज होंगे तो धीरे-धीरे पार्टी धीरे-धीरे नीचे गिरनी शुरू हो जाती है।
सिर्फ तीन जगह क्षेत्रीय दलों की सरकारें
इस समय देखा जाए तो क्षेत्रीय दलों की तीन जगह सरकारें हैं पंजाब, झारखंड और तमिलनाडु । और अगर हम केरल की भी बात करें, तो वहां भी कांग्रेस ही है जो एक क्षेत्रीय दल के सपोर्ट के साथ हैअब तमिलनाडू में भी dmk और aiadmk की जबरदस्त हार के बाद एक और क्षेत्रीय दल सामने आया है देखना है कि वो किस तरह कैसे काम करता है कि जनता की पसंद बनें।।
