Rahul Gandhi में अनुशासन की कमी – राजनीति के लायक नहीं Congress के नजदीकी रहे इतिहासकार की जुबानी

राहुल गांधी पर, रामचंद्र गुहा जो इतिहासकार हैं और कांग्रेस के नजदीकी हैं। उनका असेसमेंट तीखा आया है, उन्होंने राहुल गांधी के बारे में अपने कालम में कहा कि वो पॉलिटिकल कैपेबिलिटी लैक करते हैं। उनमें राजनीतिक क्षमता का अभाव है। बहुत डिसेंट व्यवहार है। बहुत डिसेंसी उनके बात हालांकि यह भी कंट्राडिक्टरी है। जो आदमी प्रधानमंत्री के बारे में अनापशनाप बोलता है वो डिसेंट कैसे हो सकता है पर कॉलम में उन्हे वेल मैनर्ड भी कहा गया।पर उनकी आलोचना की है कि वो डिसिप्लिन नहीं है। उनमें डिसिप्लिन का अभाव है। उसके अलावा ग्रेविटास मन मतलब गंभीरता जो एक पर्सनालिटी होनी चाहिए भारत में राजनीति करने वाली वाले व्यक्तियों की वो लायक करते हैं। इसके अलावा जो एक राजनीति का एक क्यूरिकलम होता है मतलब एक राजनीति का एक ढर्रा होता है। आपको उस हिसाब से काम करना होता है। वो आप लाइक करते हैं राहुल गांधी और कम से कम प्रधानमंत्री जिस व्यक्ति जो अपने आप को या जिस पार्टी के लोग ये दावा करते हैं कि राहुल गांधी प्राइम मिनिस्टर इन द वेटिंग है उस व्यक्ति के हिसाब से ये जो सारी क्वालिटीज हैं वो लैक करती हैं। इसके अलावा उन पर इस बात का जो है बोझ भी है कि वो एक डायनेस्टी से आते हैं तो सीधे तौर पर एक बड़ा वर्ग जो है वो उनसे दूरी बना लेता है इन सब के अलावा एक जो है मसला वो है सस्टेन फोकस। मतलब भारत की राजनीति पर उनका ध्यान पूरी तरह से केंद्रित होना ऐसा नहीं है। जब चुनाव होते रहते हैं तो विदेश यात्रा पर निकल जाते हैं। जब पार्टी को मजबूत करने की दिक्कत जरूरत होती है तब आप दूसरे देश में नजर आते हैं। जब आपको संसद में विपक्ष के नेता के रूप में या संसद में विपक्ष के सांसद के रूप में घेरने की जरूरत होती है तब आप यूरोप की यात्रा पर होते हैं तो आप अपॉर्चुनिटी लैक करते हैं। अपॉर्चुनिटी जो है आप उसको इसका इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं। पर उन्होंने बाद में कि कहा कि देखा जाए तो भारत जोड़ो यात्रा के समय जो उन्होंने उपलब्धि हासिल की वही उनकी अब तक की सबसे बड़ी राजनीति उपलब्धि है उसको भी अब धीरे-धीरे वो खोने लगे हैं।

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हालांकि ममता बनर्जी औरउनका राजनीतिक दल जो है वह अभी इस बात पर ज्यादा सुर्खियों में है कि अभिषेक बनर्जी की को पीटा गया। उन पर अंडे बरसाए गए। टीएमसी का आरोप है कि ये बीजेपी के लोगों ने किया। फिर कल्याण बनर्जी पर भी इसी तरह की घटनाएं। लेकिन इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण खबर यह है या कि क्या ममता बनर्जी अब अपने लोगों को एक साथ रख पा रही हैं? इसलिए कि उन्होंने एक विधायकों की बैठक बुलाई थी और उस बैठक में 80 में से सिर्फ 20 विधायक पहुंचे। इस कारण ममता बनर्जी को जो विधायकों की बैठक थी उसको कैंसिल करनी पड़ी। जिस तरह से जहांगीर खान ने अपने आप को विड्रॉ कर लिया था। अपना कैंडिडेचर विड्रॉ कर लिया था। तो उन उसके सिलेक्शन को लेकर के भी लोगों ने विरोध किया और पूरी की पूरी ममता बनर्जी की राजनीति है अब वह बहुत खराब दौर में गुजर रही है। क्या ममता बनर्जी का अपनी पार्टी से पकड़ खत्म हो गया है इसलिए कि जनता ने उनका साथ छोड़ दिया है। ये एक बहुत बड़ा फैक्टर है। जनता ने इस निश्चित तौर पर उनका साथ छोड़ दिया है। पूरे चुनाव को आप अगर दो अह भागों में देखें। एक जब लगभग सारे चुनाव हुए और एक जो एक विधानसभा का बाद में चुनाव हुआ 23 तारीख को इस महीने की पिछले महीने की 23 तारीख को और उस चुनाव में 109000 वोटों से तृणमूल भारतीय जनता पार्टी जीती ये स्पष्ट तौर पर बताता है कि किस तरह से ममता बनर्जी या बाकी राजनीतिक दल वहां पर हासिये पर आ चुके हैं और भारतीय जनता पार्टी ने ये बताया है कि क्या-क्या पश्चिम बंगाल के लोगों ने झेला है। अब अटैक पर भी यही है कि जो ज्यादातर अटैक हो रहे हैं वो अपने जो उनसे कट मनी मांगी गई थी वो मांग रहे हैं। ऐसे लोगों के समर्थन में अभिषेक बनर्जी मिलने जाते हैं या उनसे बातचीत करते हैं जो लोग एक्सटॉशन के और इन सब चीजों के आरोपी रहे हैं। तो ये ये अब बैकलैश हो रहा है। लेकिन हिंसा को रोकने की पश्चिम बंगाल सरकार की जिम्मेदारी है और उसको किसी भी सूरत में रोका जाना चाहिए तब जब इलेक्टेड मेंबर्स पर दो लोकसभा सांसदों पर हमले की बात कही जा रही है। हालांकि जो कल्याण बनर्जी वाला वीडियो है वो तो पूरी तरह से फेक लग रहा है। वो नाटक से ज्यादा कुछ नहीं दिख रहा है। इसलिए कि उस वीडियो में स्पष्ट है कहीं उनको चोट लगती नहीं दिख रही है। वो सड़क पर लेट गए। अह कल्याण बनर्जी दो दिन पहले तक अह अमित शाह को और सबको धमका रहे थे कि तुम आप आ करके दिखाओ अह पश्चिम बंगाल में।

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सूचनाएं आ रही हैं कि हेमंत सोरेन एनडीए का दामन थाम सकते हैं और जो बातचीत है या जो चर्चा चल रही है वो इस स्टेज में है कि किसी भी समय पाला जो है वो हेमंत सोरेन बदल सकते हैं और उससे जो लैंडस्केप है पूरे पूरे देश का पॉलिटिकल लैंडस्केप है वो बदल जाएगा। कम से कम पूर्व का आप अगर ऐसे देखिए तो बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, आसाम सब में उड़ीसा सब जगह पर भारतीय जनता पार्टी का या एनडीए का शासन हो जाएगा और नॉर्थ ईस्ट के ज्यादातर स्टेट्स में एनडीए का शासन है। एक स्टेट को छोड़कर के। तो ये पॉलिटिकल लैंडस्केप बदल जाएगा और दक्षिण के राज्यों को अगर केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना को आप छोड़ दीजिए और ऊपर हिमाचल प्रदेश को छोड़ दीजिए तो लगभग सब जगह पर भारतीय जनता पार्टी या एनडीए का शासन नजर आएगा। एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर है। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि जो भारतीय जनता पार्टी असल में कोशिश कर रही है घुसपैठियों को लेकर के अपनी जो स्ट्रेटजी है या घुसपैठियों को लेकर के जो उनकी योजना है उस योजना में झारखंड का एनडीए में आना बहुत जरूरी है। झारखंड अगर एनडीए में आता है तो जो बॉर्डर के लाके हैं जहां से घुसपैठ होता है और जो ऑलरेडी घुसपैठ कर चुके हैं इसलिए कि जैसे ही घुसपैठियों के खिलाफ कार्यवाही होती है वो अगल-बगल यहां वहां पहुंच जाते हैं जैसे वो बिहार में होगी तो उत्तर प्रदेश में भाग आएंगे। उत्तर प्रदेश में होगी तो बिहार में भाग आएंगे। झारखंड में होगा तो बिहार में भाग आएंगे। पश्चिम बंगाल में होगा तो झारखंड भाग आएंगे। आसाम में होगा तो पश्चिम बंगाल भाग आएंगे। हालांकि अब इसमें परिवर्तन हुआ है। आसाम में होगा, पश्चिम बंगाल में आएंगे तो वहां भी पकड़े जाएंगे। अह बिहार में आएंगे तो पकड़े जाएंगे। उसी तरह से झारखंड महत्वपूर्ण हो जाता है। तो इस दृष्टि से भी और लैंडस्केप बड़ा हो जाएगा उस दृष्टि से और दूसरा यह कि अब हेमंत सोरेन को भी शायद यह लगने लगा है कि केंद्र से झगड़ा करके या केंद्र के उससे रह के और कम से कम कांग्रेस के साथ कोई फायदा होने वाला नहीं है। कांग्रेस जो है वह पिछलग्गू है। कांग्रेस जो है वह पैरासाइट है। वो आपको मदद नहीं करती है। वो आपको कॉम्प्लीमेंट नहीं करती। आपका मतलब जेएमसी को कॉम्प्लीमेंट नहीं करती है। तो उस दृष्टि से यह बदलाव संभव है।

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