Bihar के बाद अब यूपी में अखिलेश और Congress के वोट काटने की तैयारी
याद कीजिए बिहार के चुनाव जब असुद्दीन ओवैसी ने बिहार में जाकर के कांग्रेस और आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव और तेजस्वी यादव से कहा था कि उसे भी विपक्ष के गठबंधन में शामिल किया जाए और दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। लेकिन दोनों ने ही उसे नकार दिया क्योंकि दोनों ही जानते थे कि अगर ओवैसी गठबंधन में शामिल होते हैं तो उनके अपने जो वोट है मुस्लिम वोट वो कहीं ना कहीं ओवैसी के पाले में जा सकते हैं और दोनों ने ही उसकी दोस्ती को नकार दिया था और ओवैसी ने उसके बाद बदला लिया, इन दोनों को दलों को लताड़ा और जिस तरह से कन्वेंसिंग करी प्रचार प्रसार किया अपनी पार्टी का पांच सीटें जीती और साथ-साथ जो नारा दिया ,जिसके बलबूते पर ओवैसी वोट काटने में सफल हो गए। उन्होंने हर चुनाव सभा में कहा कि यादव जितने हैं वहां पर बिहार में उतने ही या थोड़े कम मुस्लिम पापुलेशन है , लेकिन हमेशा यादव मुख्यमंत्री ही क्यों बनता है या किसी और जाति का मुख्यमंत्री क्यों बनता है? हमारी अल्पसंख्यक का कोई जो है मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनता जबकि वोट के लिए हर कोई हमें इस्तेमाल करता है, वोट भी चाहता है लेकिन ना कोई मंत्री बनाता है ज्यादा और ना ही हमको मुख्यमंत्री बनाया जाता है। इस तरह से प्रचार प्रसार किया और उसका फायदा ओवैसी को मिला। कांग्रेस के काफी हद तक वोट कटे, आरजेडी के वोट कटे और ओवैसी पांच सीटें जीतने में कामयाब हो गए।
अब्दुल सिर्फ दरी बिछाए-वोट दे चला जाए——बयान के जरिए कड़ा तंज
अब बिहार जैसा खेला अब यूपी में शुरू हो चुका है। एआईएमआईएम के जो प्रमुख ओवैसी उन्होंने लगातार समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया और कहा कि वो उनको अपने गठबंधन में शामिल कर ले। लेकिन बार-बार ठुकराया गया। ना अखिलेश यादव चाहते हैं क्योंकि उनका अपना पीडीए का जो फार्मूला है पिछला दलित अल्पसंख्यक वह ओवैसी के आने से फ्लॉप हो जाएगा और ना कांग्रेस चाहती है कि जो उसके अपने वोटर्स हैं वो ओवैसी की तरह जाए। तो दोनों ही ने ही ओवैसी को एक तरह से नकार दिया है और दोस्ती का हाथ जो ओवैसी ने बढ़ाया था वो हाथ जो है दोस्ती का छिटक दिया है और अब वही खेला ओवैसी ने बिहार में जो खेला था यूपी में खेलना शुरू कर दिया है। यूपी में हाल ही में ओवैसी ने तंज कसने वाला नारा दिया और एक तरह से एक मैसेज देने का काम किया है अपनी कम्युनिटी के लोगों को। उनका जो नारा है वो ये कहते हैं कि जो विपक्ष है जो विपक्ष पार्टी यहां पर वो समाजवादी पार्टी बहुजन समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की बात करते हैं। उसके गठबंधन की बात करते हैं कि वो क्या कहते हैं कि अब्दुल सिर्फ दरी बिछाए वोट दे और चला जाए। यह ओवैसी अब यूपी में बोल रहे हैं। मतलब वही है कि हर पार्टी वो ये कहना चाह रहे हैं अपने समुदाय के लोगों को कि हर पार्टी उनका इस्तेमाल करती है लेकिन राजनीति में जब भागीदारी की बात आती है तो हर कोई हाथ छिटक देता है। तो इस तरह का नारा उन्होंने यूपी में दिया और यूपी में ओवैसी ने अब जब उनको लगने लगा है कि अब उनको अकेले ही चुनाव लड़ना है क्योंकि ना ही समाजवादी पार्टी ना ही कांग्रेस ने कोई इंटरेस्ट दिखाया है उनकी तरफ तो अब उन्होंने जो अल्पसंख्यक वोटर्स हैं उनके बीच जाकर कहना शुरू कर दिया है कि अपना जो हक है उसके लिए आप जागिए। राजनीति में आपको हिस्सेदारी चाहिए। उसके लिए आपको जागना पड़ेगा और एक अपनी एक पार्टी जो है मतलब अपने जो वोटर्स हैं अपने जो अल्पसंख्यक है उसकी एक पार्टी होनी चाहिए। तो अब एक पार्टी कौन सी है? एक पार्टी ओवैसी की ही पार्टी और वो यूपी में चुनाव लड़ना चाह रहे हैं और जोर शोर से उन्होंने उसकी तैयारी शुरू कर दी है। तो यहां पर ओवैसी मुस्लिम मतदाताओं को पूरी तरह से लुभाने का काम कर रहे हैं। जैसा कि उन्होंने बिहार में किया था। तो अगर बिहार के तर्ज पर यहां के वोटर्स भी अल्पसंख्यक वोटर्स भी ओवैसी की बात सुनते हैं और समझते भी हैं। तो बीजेपी को यहां अपना फायदा नजर आ रहा है। अल्पसंख्यक वोट जो है बीजेपी को तो जाते नहीं है तो क्यों ना वोट काटने का काम हो ऐसे करके तो यही बात है उन्होंने ओवैसी को सपोर्ट कर दिया है उनके इस बयान के साथ और यह जो बयान है काफी ज्यादा चर्चा में आ गया है कि अब्दुल को तो सिर्फ दरी बिछाने के लिए और वोट देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। फिर वह अपने घर लौट जाता है। उसके बाद उसका कोई अतापाता नहीं है। राजनीति में कोई हिस्सेदारी नहीं मिलती है। तो जिस तरह से ओवैसी ने इस तरह से चुनाव प्रचार शुरू किया है। लगता है बिहार की तरह यूपी में भी ओवैसी बीजेपी के तो छोड़िए कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के वोट काटने में काफी हद तक सफल होंगे और कोई बड़ी बात नहीं होगी कि ओवैसी की झोली में भी कुछ सीटें बिहार की तरह आ जाए। जिस तरह से उन्होंने वहां के अल्पसंख्यक वोटर्स को अपनी तरह लुभाना शुरू किया है।
Modi मंत्रिमंडल में क्यों नहीं हो रहा बदलाव
पिछले काफी समय से मोदी मंत्रीमंडल में बदलाव की चर्चा तेजी से फैल रही है पर अभी तक सभी को बदलाव का इंतजार है, पर बीजेपी ने जब राज्यसभा चुनाव के लिए 8 नेताओं के नाम की घोषणा की और उसमें घपेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी और सामाजिक न्याय व आधिकारिता मंत्री बीएल वर्मा को राज्यसभा टिकट नहीं मिला तो एक बार फिर मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। इन दोनों मंत्रियों का राज्यसभा का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है, और फिर उसके बाद ये दोनों ही मोदी सरकार से बाहर हो जाएंगे। अब देखा जाए तो इनको मिलाकर मोदी सरकार से पांच मंत्री जा चुके हैं, रवनीति बिट्टू और जार्ज कुरियन का राज्यसभा कार्यकाल जुलाई में खत्म हुआ और वो बाहर हो गए,नीट पेपर लीक के कारण धर्मेंद्र प्रधान को भी मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा। पता चला है कि आने वाले समय में अकाली दल से शायद होने वाले गठबंधन के देखते हुए इसे टाला जा रहा है क्योंकि फिर उनके लिए भी जगह बनानी पड़ेगी। माना जा रहा है मंत्रियों का चुनाव 2027 में यूपी में होने वाले चुनाव और फिर 2029 में लोकसभा चुनावों को देखते हुए की जाएगी, जिसमें महिलाओं और युवाओं को ज्यादा चांस दिया जा सकता है।
