पंजाब Punjab —क्यों हो रही है मनीष तिवारी की उपेक्षा-क्या राहुल का इशारा
पंजाब कांग्रेस में चुनाव से पहले लगातार उठापटक जारी रहती है। पिछला चुनाव से पहले नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर सिंह के बीच रस्साकशी चल रही थी। अभी अमरिंदर सिंह राजा वाडिंग और पूर्व मुख्यमंत्री हैं चरणजीत सिंह चन्नी इनके बीच रस्साकसी चल रही है और शो ऑफ स्ट्रेंथ लग रहा है। लेकिन इस बीच चंडीगढ़ के सांसद और पूर्व आईएनबी मिनिस्टर मनीष तिवारी भी पार्टी से ना केवल नाराज हैं बल्कि इस बात से भी कि पार्टी ने उनको पंजाब चुनाव में पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है। उनकी नाखुशी है कि पंजाब के चुनाव में उनको कुछ ना कुछ महत्वपूर्ण भूमिका दी जानी चाहिए थी, जो नहीं दी गई, अगर उनको अध्यक्ष नहीं बनाते या और कोई महत्वपूर्ण पद नहीं देते तो कम से कम चुनाव के संचालन में उनकी कुछ ना कुछ भूमिका हो सकती थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि सारी जटिलताओं कठिनता के बावजूद कांग्रेस ने जब भी उनको जिस भी लोकसभा सीट पर उतारा या उन पर विश्वास जताया उन्होंने वो डिलीवर करके दिया। कोई यह उम्मीद नहीं कर रहा था कि चंडीगढ़ से भारतीय जनता पार्टी का कैंडिडेट हार जाएगा और मनीष तिवारी ने ऐसा करके दिखाया। इसके पहले लुधियाना वो जीतते रहे हैं या और कोई भी सीट जहां भी उनको उन पर दांव आजमाया गया। एनएसयूआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन उन्होंने जब छात्र राजनीति में अपना राजनीतिक भविष्य आगे बढ़ाया तब से वह कांग्रेस के लिए बेहतर करते रहे हैं, अब इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि Congress मतलब राहुल गांधी तभी से उनसे नाराज है एक तो ये कि जब ऑपरेशन सिंदूर के समय उनको भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए बुलाया गया था तो वो गए डेलीगेशन के साथ। उसके अलावा बहुत सारी मोदी की जो पॉलिसीज हैं वह अगर जरूरी नहीं है कि उसकी आलोचना ही की जाए तो वो अपनी पार्टी के लीक से हटकर के सरकार की तारीफ करने से चूकते नहीं है। तो कांग्रेस में इसके प्रति नाराजगी नजर आती है। तो अगर कांग्रेस में इस कदर नाराजगी नजर आती है तो ऑब्वियसली उनको कोई जिम्मेदारी नहीं मिली है। लेकिन इसका नुकसान हो सकता है। यह बात सबको मालूम है कि मनीष तिवारी पंजाब में एक महत्वपूर्ण प्लेयर हैं।
Modi -शाह का सीधा फंड़ा चर्चा में मौजूद रहने से ज्यादा जरूरी कानून बनाना

ये प्रश्न बार-बार चर्चा में आए जब एंटी पेपर लीक विषय पर चर्चा हो रही थी। इस चर्चा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गृह मंत्री गायब रहे। हालांकि अह रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अह डटे रहे लगातार और जब जरूरत पड़ी तो बोले भी। तो इस पर बड़ा बड़ा प्रश्न किया गया। यहां तक कि राहुल गांधी ने भी प्रश्न किया। राहुल गांधी ने तो यहां तक कह दिया कि वह देश में है ही नहीं। देश के बाहर हैं। हालांकि अगर गृह मंत्री देश के बाहर जाते हैं तो इसकी सूचना होती है और गृह मंत्री के सब कार्यक्रम की सूचना होती है कि वो कहां पर है, किस कार्यक्रम में शिरकत कर रहे हैं। लेकिन ये बात अवश्य है कि क्यों प्रधानमंत्री और गृह मंत्री जब इस पर चर्चा हो रही थी पेपर लीक मसले पर तो क्यों सदन में या चर्चा के दौरान उपस्थित नहीं थे। मोटे तौर पर जो बात समझ में आती है वह यह कि सरकार अपनी प्रतिबद्धता पेपर लीक के प्रति को रोकने के प्रति लगातार दिखाती रही है। चाहे अधिकारियों को बदले जाने की बात हो, चाहे नए अधिकारी नियुक्त करने की बात हो, चाहे कानून में बदलाव की बात हो या और जो भी संभव है इस मामले में एक टास्क फ़ोर्स भी गठित की गई है, नंदल नीलकानी के नेतृत्व में कि ओवरऑल परीक्षा में क्या बदलाव किए जाए कि उसमें लीक की संभावनाओं को नकारा जा सके। ये सारी बातें हो रही हैं, तो प्रधानमंत्री लगातार यह बताने की कोशिश कर रहे थे कि वह इस मामले में ना केवल संजीदा है बल्कि एक्टिवली इसको डील करने के लिए प्रयासरत है। अब ये बात लगातार विपक्ष कह रहा था कि इस मामले में चर्चा होनी चाहिए। चर्चा पहले दिन ही स्वीकार कर ली थी सरकार ने। लेकिन जिद्द ये थी विपक्ष की। हालांकि जिद्द ये सीजेपी की भी थी। का जनता पार्टी की धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र होना चाहिए। त्यागपत्र भी सरकार ने ले लिया। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने सीधे तौर पर यह मैसेज देने की कोशिश की बताने की कोशिश की कि ये विषय उनके लिए महत्वपूर्ण है और महत्वपूर्ण है इसलिए इस पर कार्यवाही की जा रही है। लेकिन चर्चा उतनी महत्वपूर्ण इसलिए नहीं है कि चर्चा जिद्द पर हो रही है। चर्चा ये दिखाने के लिए हो रही है कि हम सरकार को झुका सकते हैं। प्रधानमंत्री को झुका सकते हैं। और उससे कोई आउटकम नहीं निकलने वाला है। अगर उससे कोई आउटकम नहीं निकलने वाला है तो प्रधानमंत्री की उपस्थिति अनुपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता है। दूसरा यह कि प्रधानमंत्री का रहना इसलिए भी अनिवार्य नहीं था कि बिल जिसने प्रेजेंट किया जवाब उसको देना था। ना गृह मंत्री को जवाब देना था ना प्रधानमंत्री को जवाब देना था। और मैसेज स्पष्ट था कि इस चर्चा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि इस पर कार्यवाही की जाए और कार्य एक्शन क्या हो रहा है और वो प्रधानमंत्री करते हुए नजर आए।
